ऋग्वेद

सभी प्राणी बोलते है। अनेक पक्षी साथ-साथ बोलें तो कलरव। बोली अच्छी लगे तो कहते हैं कि पक्षी गीत गा रहे हैं। कोयल को बहुधा गायक कहा जाता है। सही बात कोयल ही जानती होगी कि वह गा रही है या किसी परिस्थितिवश बड़बड़ा रही है। कौवे खूब बोलते हैं। हम उनके प्रवचन को ‘‘कांव कांव’’ कहते हैं। मेढक भी बोलते हैं।

सतत् कर्म का कोई विकल्प नहीं है। प्रकृति की सभी शक्तियां गतिशील हैं। हम पृथ्वी से हैं, पृथ्वी में हैं। पृथ्वी माता है। पृथ्वी सतत् गतिशील है। वह सूर्य की परिक्रमा करते हुए अपनी धुरी पर नृत्य मगन रहती है। माता पृथ्वी के अंतस् में अपनी संतति को सुखी बनाए रखने की अभिलाषा है। इसलिए वह कोई अवकाश नहीं लेती।

वायु दिखाई नहीं पड़ते। ऋग्वेद के ऋषि को उनका ‘घोष’ सुनाई पड़ता है। लेकिन ऋषि उनका रूप नहीं देख पाते।...

नई दिल्ली। तीर्थ भारत की आस्था है। लेकिन भौतिकवादी विवेचकों के लिए आश्चर्य हैं। वैसे इनमें आधुनिक विज्ञान के तत्व...

भारतीय ज्योतिष में सूर्य को आत्मा का कारक माना गया है। सूर्य से सम्बन्धित नक्षत्र कृतिका उत्तराषाढा और उत्तराफ़ाल्गुनी हैं।...

नई दिल्ली। गर्भ सभी प्राणियों का उद्गम है। मां गर्भ धारण करती है। पिता का तेज गर्भ में माँ की...