धर्म

यदि जीवन रेखा, हृदय रेखा और मस्तिष्क रेखा तीनों प्रारंभ में मिली हुई हो तो व्यक्ति भाग्यहीन, दुर्बल और परेशानियों से घिरा होता है।

कुर्मा पुराण के अनुसार कुंभ उत्सव में स्नान करने से सभी पापों का विनाश होता है, और मनोवांछित फल प्राप्त होता है। यहां स्नान से देव लोक भी प्राप्त होता है। भविष्य पुराण के अनुसार कुंभ स्नान से पुण्य स्व स्वरुप मिलता है, और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

प्रतिदिन सुबह जल्दी उठकर नहाने के बाद सूर्य को जल चढ़ाएं। इसके लिए तांबे के लोटे में जल भरें और इसमें चावल, लाल फूल, लाल चंदन भी डालें। पूर्व दिशा की ओर मुंह करके सूर्य देव को अर्घ्य चढ़ाएं। इस दौरान सूर्य मंत्र ‘ऊँ सूर्याय नम:’ का जाप करें।

गीता ने सारी दुनिया को प्रभावित किया। इसका प्रभाव चीन और जापान तक पड़ा। ‘जर्मन धर्म’ के अधिकृत भाष्यकार जे0डब्लू0 होअर ने गीता का महत्वपूर्ण उल्लेख किया। होअर ने लिखा, “यह सब कालों में सब प्रकार के धार्मिक जीवन के लिए प्रामाणिक है।

वर्ष की शुरुआत में 24 जनवरी को शनि का परिवर्तन हो रहा है जो कि आपकी राशि से सुख भाव के मालिक होकर पराक्रम में स्वराशिगत गोचर कर रहे हैं। यह आपके पराक्रम की उन्नति के लिये इसमें वृद्धि के योग बनाते हैं। परन्तु यह स्थान छोटे भाई का स्थान भी है इसलिये छोटे भाई-बहनों के भविष्य को लेकर भी आप चिंतित रह सकते हैं।

मंगल और राहु की शांति के लिए निर्दिष्ट दान के साथ वैदिक मंत्रों के जप ओर दशांश मंत्रों हवन करना लाभकारी होता है। अंगारेश्वर महादेव, उज्जैन पर अधिक प्रभाव मिलेगा।

भारत की देव आस्था निराली हैं, यहां प्रत्येक ग्राम के देवता हैं, कुल देवता हैं, क्षेत्र देवता हैं और वन देवता भी हैं। वैदिक काल के देवता वेदों में हैं। उत्तरवैदिक काल व पुराण काल में भी वैदिक देवों की उपासना व स्तुतियां थीं लेकिन तमाम नए देवनाम भी जुड़े। तैत्तिरीय उपनिषद् में ‘आचार्य देवता है - आचार्य देवो भव। माता पिता भी देवता है - मातृ देवो भव, पितृ देवो भव।

आधुनिक विज्ञान ने अभी तक मात्र शुद्ध एवं एकल 128 तत्वों को पहचानने में सफलता प्राप्त की है। जिसका वर्णन मेंडलीफ की आधुनिक आवर्त सारणी में किया गया है। किन्तु ये एकल तत्व है अर्थात् इनमें किसी दूसरे तत्व या पदार्थ का मिश्रण नहीं प्राप्त होता है।

वैवाहिक जीवन में क्लेश सप्तम भाव, सप्तमेश और द्वितीय भाव पर क्रूर ग्रहों का प्रभाव वैवाहिक जीवन में क्लेश उत्पन्न करता है। लग्न, सप्तम भाव, सप्तमेश की कारक शुक्र, राहु, केतु या मंगल से दृष्टि या युति के फलस्वरूप दाम्पत्य जीवन में क्लेश पैदा होता है।

जब तृतीयेश, यतुर्थेश या दशमेश की उपरोक्त स्थितियां। तृतीयेश व अष्टमेश का संबंध होने पर छोटे भाई बहनों, चतुर्थ के संबंध से माता, एकादश के संबंध से बड़े भाई, दशमेश के संबंध से पिता के कारण पितृ दोष की उत्पत्ति होती है।