भारतीय अर्थव्यवस्था

देश की अर्थव्यवस्था वित्त वर्ष 2021 में सिकुड़ सकती है, जबकि वित्त वर्ष 2020 में इसका 4.2 प्रतिशत की दर से विस्तार हुआ था। कैलेंडर वर्ष 2020 के संदर्भ में अर्थव्यवस्था नकारात्मक 4.9 प्रतिशत सिकुड़ सकती है। आईएमएफ ने हालांकि वित्त वर्ष 2021-22 के लिए देश की आर्थिक वृद्धि दर छह प्रतिशत रहने का अनुमान व्यक्त किया है। 

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज, एनएसई के 50 शेयरों पर आधारित प्रमुख संवेदी सूचकांक निफ्टी भी पिछले सत्र से 69.75 अंकों की गिरावट के साथ 10235.55 पर खुला और 10194.50 तक फिसला जबकि बाद में थोड़ी रिकवरी आने पर निफ्टी 10251.60 तक चढ़ा।

कोयला खदानों की नीलामी की बात करते हुए उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया ऐसे समय में शुरू हुई है, जब भारतीय अर्थव्यवस्था फिर से खुल गई है और विकास के रास्ते पर वापस लौटने के संकेत दे रही है।

रेटिंग एजेंसी फिच के अनुसार अगले वित्त वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था फिर रफ्तार पकड़ सकती है।अगले साल भारत की अर्थव्यवस्था 9.5% की रफ्तार से बढ़ सकती है।

मूडीज के सहायक उपाध्यक्ष एवं विश्लेषक देबोराह टैन का कहना है कि कोरोनावायरस महामारी की रोकथाम के लिए जारी बंद की वजह से खपत कम होने और कारोबारी गतिविधियां थमने से चुनौतियों का सामना कर रही घरेलू अर्थव्यवस्था में गिरावट आएगी। इसकी वजह से 2020-21 में भारतीय अर्थव्यवस्था में गिरावट देखने को मिल सकती है। कोरोनावायरस के प्रकोप से पहले ही अर्थव्यवस्था पिछले छह वर्षों में धीमी गति से ही आगे बढ़ रही थी।

मोदी सरकार किसानों को लेकर बेहद संवेदनशील है। वित्तमंत्री के किसान पैकेज में कृषि से जुड़े क्षेत्रों के विस्तार के लिए कम दर पर कर्ज और निवेश संबंधी ऐलान हो सकते हैं।

देश में अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए 1991 में जिस तरह से आर्थिक सुधार हुए थे उसी तरह के आर्थिक सुधारों का इस बार भी प्रयास हो रहा है

केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने शनिवार को कहा कि बैंक यह सुनिश्चित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं कि मौजूदा कोरोनावायरस स्थिति से व्यवसायों के लिए तरलता (नकदी) संकट पैदा न हो।

नरेंद्र मोदी की घोषणा को जमीन पर सफल बनाने के लिए पेट्रोलियम मंत्रालय ने प्रोजेक्ट 511 पर काम करना प्रारंभ कर दिया है।

गोपीनाथ का मानना है कि जिस तरह से कोरोना के जाल में दुनिया के बड़े-बड़े देश फंसे हैं उसको देखते हुए 1930 की आर्थिक महामंदी के बाद ऐसा पहली बार हो सकता है कि विकसित और विकासशील देश दोनों ही मंदी के चक्र में फंस जाएं।