श्राद्ध

रात में भगवान के निकट जागरण करें। इसके पश्चात द्वादशी के दिन प्रात:काल होने पर भगवान का पूजन करके ब्राह्मणों को भोजन कराएं।

श्राद्ध सामान्य अंधविश्वासी कर्मकाण्ड नहीं है। हमारे पूर्वजों ने ही ऐसे सुंदर कर्मकाण्ड को बड़े जतन के साथ गढ़ा है। इस कर्मकाण्ड में स्वयं के भीतर पूर्वजों के प्रवाह का पुनर्सृजन संभव है।

सीता ने तीनों गवाहों द्वारा झूठ बोलने पर उनको क्रोधित होकर श्राप दिया की फल्गु नदी जा तू सिर्फ नाम की रहेगी, तुझमें पानी नहीं रहेगा इसलिए फल्गु नदी गया में आज भी सुखी ही रहती है। गाय को कहा तू पूज्य होकर भी लोगों का झूठा खाएगी और केतकी के फूलों को श्राप दिया कि तुझे पूजा में कभी चढ़ाया नही जाएगा।

यदि उक्त विधि को करना किसी के लिए संभव न हो, तब वह जल को पात्र में काले तिल डालकर दक्षिण दिशा की ओर मुँह करके तर्पण कर सकता है।

किसी दूसरे व्यक्ति के घर या जमीन पर श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए। हालांकि जंगल, पहाड़, मंदिर या पुण्यतीर्थ किसी दूसरे की जमीन के तौर पर नहीं देखे जाते हैं क्योंकि इन जगहों पर किसी का अधिकार नहीं होता है। इसलिए यहां श्राद्ध किया जा सकता है।

भारतीय परंपरा में श्राद्ध का काफी महत्व है। त्रिपिंडी श्राद्ध करने का अधिकार विवाहित पति-पत्नी के जोड़े को होता है। जिसकी पत्नी जीवित नहीं है, उसे भी यह अधिकार है।

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