Hridya Narayan Dixit

भारतीय ज्ञान परंपरा में शरीर की प्राथमिक या ऊपरी परत को अन्नमय कोष कहा गया है। मनुष्य शरीर का निर्माण अन्न से होता है। उपनिषद् वैदिक साहित्य के दर्शन भाग कहे जाते हैं।

प्रत्येक व्यक्ति का मन होता है। सामूहिक जीवन के प्रभाव में समान मन के कारण समाज का भी मन होता है। तब व्यक्तिगत मन सामूहिक मन का भाग हो जाता है।

राष्ट्र प्राचीन वैदिक धारणा है और नेशन आधुनिक काल का विचार है। राष्ट्र के लिए अंग्रेजी भाषा में कोई समानार्थी शब्द नहीं है। ई0एच0 कार ने नेशन की परिभाषा की है, “सही अर्थो में राष्ट्र्रो या नेशंस का उदय माध्यकाल की समाप्ति पर हुआ।”

काम कामनाओं का बीज है। यह प्रकृति में सर्वव्यापी है। प्राकृतिक है। प्रकृति की सृजनशक्ति है। प्रत्येक शक्ति का नियमन भी होता है। नियमविहीन शक्ति अराजकता में प्रकट होती है। फिर काम को विराट शक्ति जाना गया है।

भूमि और सभी प्राणी परस्पर अन्तर्सम्बन्धित हैं। यह नेह मां और पुत्र जैसा है। वैदिक साहित्य में इस सम्बंध का अनेकशः उल्लेख है। वैदिक ऋषि पृथ्वी को बार-बार नमन करते हैं। अथर्ववेद (भूमि सूक्त, 12.26 व 27) में कहते हैं, “इस भूमि की सतह पर धूलिकण हैं, शिलाखण्ड व पत्थर हैं।

कविता और विज्ञान एक साथ नहीं मिलते। काव्य में भाव अभिव्यक्ति की प्रमुखता होती है और विज्ञान में प्रत्यक्ष सिद्धि की। विज्ञान में पृथ्वी सौर मण्डल का ग्रह है। पृथ्वी पर तमाम वस्तुएं, खनिज, वनस्पतियां और जल पृथ्वी का भाग है।

"वास्तुशास्त्र के अनुसार दक्षिण दिशा में सिर करके सोने से नींद अच्छी आती है"। निद्रा हर प्राणी और वनस्पति के लिए अत्यंत आवश्यक है।

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