RIGVEDA

सविता सूर्य ही हैं। सूर्य किरणें स्वर्णिम होती है। सविता देव का मण्डल 1 सूक्त 35 में स्वर्ण जोड़कर सुंदर मानवीकरण हुआ है। कहते हैं, “सविता देव ‘हिरण्याक्ष’ स्वर्ण आखों - दृष्टि वाले हैं।

श्राद्ध सामान्य अंधविश्वासी कर्मकाण्ड नहीं है। हमारे पूर्वजों ने ही ऐसे सुंदर कर्मकाण्ड को बड़े जतन के साथ गढ़ा है। इस कर्मकाण्ड में स्वयं के भीतर पूर्वजों के प्रवाह का पुनर्सृजन संभव है।

ऋग्वेद के अधिकांश देवता प्रकृति की शक्ति हैं। सूर्य, पृथ्वी, जल, वायु, मरूत, नदी आदि देव प्रकृति में प्रत्यक्ष हैं। लेकिन इन्द्र प्रकृति की प्रत्यक्ष शक्ति नहीं हैं। ऋग्वेद में सभी देवों की तुलना में इन्द्र की सबसे ज्यादा स्तुतियां हैं।

पूर्वज अनुभूति में पृथ्वी सजीव है। यह निर्जीव नहीं है। लाखों जीवों की धारक है। इसी में उगना उदय और अस्त होना प्रत्येक प्राणी की नियति है। यह जननी है। पृथ्वी को माता कहने वाले यह ऋषि अंधविश्वासी नहीं हैं।

भरत का उद्देश्य सांस्कृतिक है। तत्व बोध इतिहास बोध के रास्ते समाज के अंतर्मन का संस्कार है। ऋग्वेद के रचनाकार ऋषि प्रकृति के सत्य, शिव और सुंदर को ही काव्य मंत्री द्वारा पुनर्सृजित कर रहे थे।

ऋग्वेद में मनुष्य और देवों की प्रीति अनूठी है। वैदिक अभिजन सभी अवसरों पर देवों का स्मरण करते हैं। वे दुखी होते हैं तो देवों की स्तुतियां करते हैं और जब सुखी होते हैं तब भी लेकिन आनंद और उत्सव के समय वे देवों को ज्यादा याद करते हैं।

ऋग्वेद अतिप्राचीन असाधारण काव्य रचना है। इसके भीतर ऋग्वेद से भी पूर्व के वैदिक समाज के विवरण हैं। ऋग्वेद की भाषा व्यवस्थित है। इस स्तर की भाषा के विकास के लिए हजार दो हजार वर्ष का समय पर्याप्त नहीं है।

ऋग्वेद की इस अनुभूति का विस्तार अथर्ववेद में भूमि सूक्त है। यहां पृथ्वी हमारी माता है हम सब इसके पुत्र हैं - पुत्रो अहम् पृथित्याः। ऋग्वेद की इसी प्रेरणा से गंगा यमुना आदि नदियां माता हैं।

ऋग्वेद में दर्शन के बीज हैं। वे पौध बनने को आकुल व्याकुल हैं। अदिति और पुरूष जेसे प्रतीकों में वेदांत दर्शन का जन्म दिखाई पड़ता है। मन सम्बंधी प्रश्नों में परवर्ती योग दर्शन के सूत्र हैं। सांख्य वैशेषिक दर्शन व मीमांसा के भी सूत्र ऋग्वेद में हैं।

अग्नि ऋग्वेद के प्रतिष्ठित देवता हैं। ऋग्वेद के मंत्रोदय के पहले से ही भारत के लोग अग्नि उपयोग व तत्वदर्शन से सुपरिचित थे। वैदिक ऋषियों ने अग्नि की सर्वव्यापकता और सर्वसमुपस्थिति का साक्षात्कार किया था।