RIGVEDA

प्रधानमंत्री ने कोरोना महामारी को लेकर राष्ट्र को सावधान किया है। उन्होंने अपने 25 मिनट के भावुक सम्बोधन में प्रत्येक नागरिक से सजगता की अपील की है। उन्होंने इस महामारी से निश्चिंत होकर घूमने को उचित नहीं बताया है।

आदिमकाल में राजा या राज्य व्यवस्था नहीं थी। राज्य संस्था का क्रमिक विकास हुआ है। अथर्ववेद में राज्य के जन्म और विकास का सुन्दर वर्णन है। बताते हैं “पहले विराट (राजा-राज्य रहित) दशा थी, इस में विकास हुआ। गार्हृपत्य संस्था (परिवार-कुटुम्ब) आई।

कालचिंतन भारतवासियों का प्रिय विषय रहा है। ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में दिन रात्रिविहीन दशा का उल्लेख है। काल की धारणा में दिन और रात्रि समय के ही चेहरे हैं। ऋषि के अनुसार तब न रात थी

प्रत्येक प्राणी की काया के अणु परमाणु में काम सर्जक तरंग हैं। मन संकल्प का केन्द्र भी काम ऊर्जा के प्रवाह से शक्ति पाता है।। प्रकृति में अतिरिक्त काम ऊर्जा है। यह काम ऊर्जा के तरंग प्रवाह से उफनाती रहती है।

अथर्ववेद में जीवन के सभी पक्ष हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद में वैज्ञानिक विषयों का भी दर्शन है। सामवेद गीत प्रधान है लेकिन अथर्ववेद में उपलब्ध विज्ञान की व्यवहार पद्धति भी है।

भारत की देव आस्था निराली हैं, यहां प्रत्येक ग्राम के देवता हैं, कुल देवता हैं, क्षेत्र देवता हैं और वन देवता भी हैं। वैदिक काल के देवता वेदों में हैं। उत्तरवैदिक काल व पुराण काल में भी वैदिक देवों की उपासना व स्तुतियां थीं लेकिन तमाम नए देवनाम भी जुड़े। तैत्तिरीय उपनिषद् में ‘आचार्य देवता है - आचार्य देवो भव। माता पिता भी देवता है - मातृ देवो भव, पितृ देवो भव।

सविता सूर्य ही हैं। सूर्य किरणें स्वर्णिम होती है। सविता देव का मण्डल 1 सूक्त 35 में स्वर्ण जोड़कर सुंदर मानवीकरण हुआ है। कहते हैं, “सविता देव ‘हिरण्याक्ष’ स्वर्ण आखों - दृष्टि वाले हैं।

श्राद्ध सामान्य अंधविश्वासी कर्मकाण्ड नहीं है। हमारे पूर्वजों ने ही ऐसे सुंदर कर्मकाण्ड को बड़े जतन के साथ गढ़ा है। इस कर्मकाण्ड में स्वयं के भीतर पूर्वजों के प्रवाह का पुनर्सृजन संभव है।

ऋग्वेद के अधिकांश देवता प्रकृति की शक्ति हैं। सूर्य, पृथ्वी, जल, वायु, मरूत, नदी आदि देव प्रकृति में प्रत्यक्ष हैं। लेकिन इन्द्र प्रकृति की प्रत्यक्ष शक्ति नहीं हैं। ऋग्वेद में सभी देवों की तुलना में इन्द्र की सबसे ज्यादा स्तुतियां हैं।

पूर्वज अनुभूति में पृथ्वी सजीव है। यह निर्जीव नहीं है। लाखों जीवों की धारक है। इसी में उगना उदय और अस्त होना प्रत्येक प्राणी की नियति है। यह जननी है। पृथ्वी को माता कहने वाले यह ऋषि अंधविश्वासी नहीं हैं।