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न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने बुधवार को अगस्ता वेस्टलैंड मामले में गौतम खेतान के वकील को पूर्व प्रभाव के साथ काला धन कानून की उपयुक्तता को लेकर फटकार लगाई है।

चूंकि सर्वोच्च न्यायालय चिदंबरम की याचिका पर बुधवार सुबह सुनवाई करने के लिए सहमत हो गया है, लिहाजा जांच एजेंसियां भी अब सुबह सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने तक इंतजार करेंगी और उन्हें गिरफ्तार करने के लिए रातभर छापे नहीं मारेंगी।

दरअसल धारा 370 हटाए जाने के खिलाफ कुल 7 याचिकाएं दायर की गई थी। जिसमें से 4 याचिकाओं में सुप्रीम कोर्ट ने कामियां पाईं। इन चार याचिकाओं में से पहली याचिका अनुच्छेद 370 हटाए जाने का विरोध किया गया है।

सीबीआई को लेकर सीजेआई रंजन गोगोई ने ये भी कहा कि जब मामला राजनीति से जुड़ा नहीं होता तो सीबीआई अच्छा काम करती है लेकिन जब मामला राजनीतिक हो तो जांच के लिए जरूरी मानकों को पूरा नहीं कर पाती।

याचिकाकर्ता के अनुसार धरोहर स्थल विभाजन से पहले से ही कराची के हिंदू समुदाय से जुड़ा हुआ है और इसकी स्थापना हिंदुओं की सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए की गई थी, लेकिन सरकार ने विभाजन के बाद इसे एक बेनामी संपत्ति के रूप में अपने अधिकार में ले लिया।

अदालत ने कहा कि वह अपील में दी गई दलीलों पर विस्तृत सुनवाई करेगी और एस्सार के फैसले से उत्पन्न होने वाले मुद्दों पर भी ध्यान देगी। शीर्ष अदालत मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद करेगी।

उनका कहना है कि स्पीकर रमेश कुमार जानबूझकर इस्तीफे स्वीकार नहीं कर रहे हैं। हालांकि 10 विधायक पहले ही सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगा चुके हैं।

सुप्रीम कोर्ट में आज कर्नाटक संकट पर सुनवाई हुई। लंबी बहस के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक विधानसभा स्पीकर रमेश कुमार को आदेश दिया है कि वो अगले मंगलवार तक कोई फैसला ना लें। इस दौरान स्पीकर ना तो विधायकों के इस्तीफे पर और ना ही अयोग्य करार होने पर फैसला ले सकते हैं।

इस सूची में जिन जातियों को शामिल किया गया है वे हैं- निषाद, बिंद, मल्लाह, केवट, कश्यप, भर, धीवर, बाथम, मछुआ, प्रजापति, राजभर, कहार, कुम्हार, धीमर, मांझी, तुहा और गौड़, जो पहले अन्य पिछड़ी जातियां (ओबीसी) वर्ग का हिस्सा थे। इस कदम को योगी सरकार द्वारा इन सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को आरक्षण का लाभ प्रदान करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। यह इन 17 जाति समूहों द्वारा 15 साल पुरानी मांग तो पूरा करना भी है।

सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार से कहा कि यह कोई हत्या का मामला नहीं है। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में मजिस्ट्रेट का ऑर्डर सही नहीं है। उसे तुरंत रिहा किया जाना चाहिए।