‘सृष्टि की शुरुआत गर्भ से हुई… दुख का बड़ा कारण भी अज्ञानता है’

नई दिल्ली। गर्भ सभी प्राणियों का उद्गम है। मां गर्भ धारण करती है। पिता का तेज गर्भ में माँ की जनन चेतना से मिलता है। जीवन अतिसूक्ष्म उगता है। प्रकाशहीन गर्भ के भीतर। पूरी सृष्टि भी पहले गर्भ में ही थी। ऋग्वेद के ऋषि ने इसे ‘‘हिरण्य गर्भ’’ कहा है कि सबसे पहले हिरण्य गर्भ थे। वही समस्त भूतों के स्वामी हैं। हिरण्य स्वर्णिम है। सभी जीवों वनस्पतियों का विकास गर्भ में होता है। बीज धरती का आधार और जलरस व प्रकाश पाकर टूटता है। पौध बनता है, कोपले उगती हैं। कलियां खिलती हैं। फूल लहकते हैं। फिर बीज बनते हैं।प्रकृति के प्रत्येक नवसृजन में गर्भ की भूमिका है। यह तो हुई जीवों के गर्भ धारण और प्राणी बनने की कथा लेकिन अर्थवेद (11.7) में ज्ञान गर्भ की भी मजेदार चर्चा है। यह ज्ञान गर्भ आचार्य की कोख में होता है। इस गर्भ में देखे, सुने, पढ़े और भोगे अनुभव होते हैं। ज्ञान गर्भ में सामान्य जीव नहीं होते। अथर्ववेद के अनुसार आचार्य जिसे ज्ञान का सुपात्र समझते हैं उसे ज्ञान गर्भ में रखते हैं। ऐसे सुपात्र को ब्रह्मचारी कहा गया है। उसकी पात्रता के विषय में कहते हैं ‘‘देव, पितर और गंधर्व उसका अनुसरण करते हैं। (अथर्ववेद 11.7.2) यहाँ ब्रह्मचारी ज्ञान प्राप्ति के संकल्प से युक्त है। बताते हैं कि आचार्य उसका उपनयन करते हैं। तीन रात्रि तक ज्ञान अपने गर्भ में रखते हैं। फिर वह गर्भ से बाहर आता है। देवशक्तियां उसका अभिनंदन करती हैं।’’उत्तर वैदिक काल में विद्वानों को ‘द्विज’ कहते थे। द्विज का सामान्य अर्थ है-दुबारा जन्मा। ठीक बात है। पहला गर्भ माँ का है, माँ जननी है। उसके गर्भ से प्रथम जन्म मिलता है। फिर आचार्य का ज्ञान गर्भ है। आचार्य के ज्ञान गर्भ से बाहर आए। ज्ञानी का स्वाभाविक ही देव शक्तियाँ अभिनंदन करती हैं। ज्ञान महत्वपूर्ण है। ज्ञानी सर्वत्र सम्मान पाते हैं। लेकिन ज्ञान देने वाले ज्ञानी आचार्य आसानी से नहीं मिलते। विद्वान आचार्य मिलते भी हैं तो वे किसी जिज्ञासु को अपने ज्ञान गर्भ में आश्रय नहीं देते। श्री कृष्ण ने अर्जुन को समझाया ‘‘दुख का कारण अज्ञान है। ज्ञान से आनंद मिलता है।’’ उस ज्ञान को विनम्रतापूर्वक सादर, प्रश्नोत्तर और सेवा द्वारा आचार्य से प्राप्त करना चाहिए। गीता में आदर और विनम्रता के लिए ‘प्रणिपातेन, परिप्रश्नेन सेवाया’ शब्द आए हैं। प्रणिपातेन-झुकते हुए प्रणाम करके। प्रश्न पूछते हुए सेवा करते रहना विद्यार्थी का कर्त्तव्य है। आचार्य के पास उपलब्ध ज्ञान है, पढ़ा, सुना, देखा ज्ञान और अनुभूति की संपदा है। गूगल के पास उपलब्ध ज्ञान की विवरणी है। लेकिन अनुभूति का आभाव है, इसीलिए ज्ञान गर्भ का कोई विकल्प नहीं। ज्ञान श्रेष्ठ है लेकिन कई मित्र प्रश्न उठाते है कि ज्ञान है क्या? साधारणतया ज्ञाता और ज्ञेय के सम्बन्ध से बने इन्द्रिय बोध को ज्ञान कहते हैं। हम ज्ञान के इच्छुक हैं। ज्ञाता होना चाहते हैं। कोई ज्ञेय पदार्थ है। हम उसे नहीं जानते। अज्ञात पदार्थ से हमारा इन्द्रिय बोध जुड़ता है। हम उसे देखते हैं। पूर्व में देखे गये विषयों से तुलना करते हैं। हम सुनते हैं, छूते हैं, चखते भी हैं। हमारी इन्द्रियाँ सबकी सूचना देती है। फिर पहले से उपलब्ध जानकारियों के आधार पर हम उसका विवेचन करते हैं। यही हमारा प्राथमिक ज्ञान है। पदार्थ के गुण धर्म एक झटके में नहीं प्रकट होते। इसलिए अल्प समय में प्राप्त सूचना पूर्ण ज्ञान नहीं हो सकती। ज्ञान विवेचन के लिए प्राग् अनुभव बहुत जरूरी है।

भारतीय पूर्वजों ने वस्तु या पदार्थ के अलावा भाव जगत का भी विवेचन किया है। भाव पदार्थ नहीं होते इसलिए इनका ज्ञान भाव तल पर जाता है। ऐसा बोध व्यक्तिगत अनुभूति से ही किया जाना ही संभव है। भारतीय दर्शन की विवेचन शैली में भाव जगत को समझने के लिए लोक जीवन के तमाम प्रतीकों से ही उदाहरण दिये गये हैं। लेकिन ज्ञान प्रबोधन में आचार्य की भूमिका का कोई विकल्प नहीं। आचार्य शंकर ने “विवेक चूड़ामणि” में आचार्यो के पास जाकर ज्ञान प्राप्ति का उपदेश दिया है कि गहन श्रद्धा और तीव्र प्रयासों में ब्रह्म सत्य और जगत् मिथ्या का विवेक मिलता है।bhagavath-geeta

ज्ञान प्राप्ति के लिए चित्त की एकाग्रता का तीव्र प्रयास जरूरी है। बुद्धि को एक ही केन्द्र पर लगाने से ज्ञान प्राप्ति के मध्यम प्रयास भी तीव्र गति पकड़ते हैं। गीता में ऐसी बुद्धि को ‘व्यवसायात्मिक’ कहा गया है। जल्दबाजी में इसे व्यवसायिक या बिजनेस माइंड मान लिया जाता है कि व्यवसायिक बुद्धि एकाग्र होती है। लेकिन गीताकार ने व्यवसाय के साथ आत्मिक भी जोड़ा है। महाभारत में भी इसी शब्द का प्रयोग है ‘‘व्यासायित्मका बुद्धि मनो व्याकरणम्।’’ व्यवसायिक बुद्धि आत्मभाव से जुड़ी रहती है। यह सार आसार की निर्णायक है। मन व्याकरण का काम करते हुए विस्तार देता है। लेकिन यहाँ प्रश्न भी उठते हैं। बुद्धि की सारी संपदा हमारी स्मृति शक्ति का संकलन है। स्मृति के कारण ही बुद्धि है। स्मृति गयी तो बुद्धि गयी। बुद्धि जाती है तो भी स्मृति का पूरा नाश नहीं होता। आत्म से जुड़ी बुद्धि आत्म से जुडे़ संदर्भों को बचाये रखती है। संचित बुद्धि को हम ज्ञान कोष कह सकते हैं। लेकिन वह ज्ञान गर्भ नहीं होता। ज्ञान गर्भ बुद्धि जागृति का मूल केन्द्र है। विवेक की नाल नाभि इसी से जुड़ी रहती है।संसार का ज्ञान रूप, वस्तु पदार्थ या जीव मनुष्य का परिचय है। यह सूक्ष्म भी हो सकता है और स्थूल भी। लेकिन मेरी समझ में असली ज्ञान प्रत्यक्ष संसार के पदार्थों व मनुष्य के रिश्तों में है। कुछ मोटे प्रश्न हैं। हम पृथ्वी पर हैं। हमारे पृथ्वी से क्या संबंध हैं? हम वायुमण्डल में हैं, वायुमण्डल से हमारे क्या संबंध हैं? हम नदियां, आकाशों, ग्रहों, उपग्रहों, तारों से हैं। हमारे जीवन में इनकी क्या भूमिका है? क्या तमाम तकनीकी उपकरणों से दिखायी देने वाला यह दृश्यमान लोक अकेला है? या अन्य अदृश्य लोक भी हैं? क्या हम अनिश्चित जीवन लेकर यहाँ हैं?

मृत्यु के बाद क्या सब कुछ नष्ट हो जायेगा? क्या स्मृति बचेगी? मन, बुद्धि, अहंकार क्या नष्ट हो जायेंगे? क्या हमारा आत्म शरीर के साथ मर जायेगा? क्या अशरीरी होकर भी वह गतिशील रहेगा? इस प्रकृति को कब और किसने बनाया? क्या यह स्वयंभू है? क्या कोई निर्माता, धाता, विद्याता इसका संचालक है? विज्ञान का पूरा आधार गति के अध्ययन पर टिका है। सूर्य, पृथ्वी आदि की गति विज्ञान पकड़ चुका है। मन की गति क्या है? मन का कोई दिक् नहीं होता। मन की भागभाग हमारी स्मृति का ही परिणाम तो नहीं है। पहले समय नहीं था। गति से समय आया। काल और दिक्कत की हमारे जीवन में क्या स्थिति है? उनसे हमारे सम्बंध क्या हैं?यहां थोड़े से प्रश्न हैं। यह प्रश्नावली लम्बी हो सकती है। इन प्रश्नों के उत्तर से भी तमाम नये प्रश्न उग सकते हैं। तब क्या अन्तिम प्रश्न यह नहीं बनता कि इस विराट जगत को ठीक से जानना कठिन है। क्या आत्मसर्म्पण ही विकल्प है? वैदिक वांग्मय में कुछ ऐसे ही प्रश्नों की ज्ञिज्ञासा हैं। उनमें अनेक प्रश्नों के उत्तर भी हैं। निसंदेह वे सबका समाधान नहीं करते लेकिन ज्ञान यात्रा के लिए विचारोत्तेजन तो करते ही हैं। प्रकृति रहस्यपूर्ण हैं। इसके रहस्य अनंत हैं। ऐसा जानकर अध्ययन छोड़ना कायरता है।

आशावादी रहना अच्छा है। बहुत संभव है कि किसी मंगल मुहूर्त में सूर्योदय की किरणें सविता का तेज लेकर बैठ जायें हमारे भीतर। बने ज्ञान गर्भ। हमको इसी ज्ञान गर्भ में रहने का अवसर मिले। संभव यह भी कि किसी मनचाहे गीत काव्य को सुनते-सुनते खो जायें शब्द और अर्थ। केवल नाद ही बचे चित्त में। नाद ज्ञान नदी होकर हमको ज्ञान नद में डूबोता हुआ बहा ले जाए। अथवा कोई गाय आये हमारी ओर हम उसकी आँखों में आँखें डालें। उसकी आँखों में करूणा के सागर का नीर बहता देखें हम और पूरे अंतःकरण के साथ डूब जायें करूणा सागर में। प्रतीक प्रकृति से ही आते हैं। हम पर अनुकम्पा करते हैं लेकिन हम उन्हें ठीक से देख नहीं पाते। नाद ध्वनि होते हैं। हम नाद में होकर भी नृत्य नहीं कर पाते। इसलिए आशा का ही एक दिया जलाये रखना चाहिए। संभव है कि इसी दीप प्रकाश में मिले। ज्ञान ज्योति और जीवन मधुरस से भर जाए।

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