भारत की सांस्कृतिक चेतना का केंद्र है उत्तर प्रदेश

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उत्तर प्रदेश प्राचीन काल से ही एक सांस्कृतिक इकाई है। दुनिया का सबसे बड़ा काव्य महाभारत है। इसमें राष्ट्र और भारत की सांस्कृतिक चेतना हहराती है। यह अपने ढंग का इतिहास है, काव्य है। इसमें दुनिया के सभी दर्शन मौजूद हैं। इसकी रचना उत्तर प्रदेश में हुई। वाल्मीकि की ‘रामायण’ विश्व सम्पदा है। इसी रामायण के आधार पर दक्षिण भारत की कई भाषाओं में रामकथा आधारित अनेक काव्य रचे गए। रामायण का उद्भव उप्र में बहती तमसा नदी के तट पर हुआ। इसका रचना क्षेत्र भी अपना उत्तर प्रदेश ही है। गीता महाभारत के भीष्म पर्व का दार्शनिक हिस्सा है। गीता अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित दर्शन ग्रंथ है। यह भी उत्तर प्रदेश में रची गई थी। रामायण और महाभारत की घटनाओं की पृष्ठभूमि उत्तर प्रदेश ही है। श्रीराम रामायण के महानायक और भारतीय मर्यादा के उत्तम पुरूष। मर्यादा पुरूषोत्तम। यही अपनी अयोध्या के। सांस्कृतिक राष्ट्रभाव की ऊर्जा से भरे पूरे उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बीती दीपावली श्रीराम की घर वापसी का उत्सव मनाया था। जैसे श्रीराम की घर वापसी भारतीय इतिहास का अजर अमर आख्यान है वैसे ही योगी जी के आयोजन को भी इतिहास देवता ने सहर्ष अपने अंक में समेट लिया है।मथुरा वृन्दावन भारत के मन की पुलक हैं। कृष्ण कन्हैया की लीलास्थली। कान्हा की बासुरी का यह क्षेत्र भी उत्तर प्रदेश का ही प्रमुख अंग हैं। राधा और श्रीकृष्ण के आध्यात्मिक प्रेम की गवाह है यह भूमि। यमुना तट तमाम सांस्कृतिक घटनाओं की स्थली है। श्रीराम और श्रीकृष्ण भारत के मन के स्वर्णिम स्वप्न हैं। साधारण मानव, असाधारण देवता और भारतीय श्रद्धा में विष्णु के अवतार। उत्तर प्रदेश के पूरबी भाग ने योग को आनंद व मोक्ष का द्वार बनाया।

नाथ संप्रदाय ने भक्ति और श्रद्धा को विज्ञान जैसा रूप दिया। गुरू गोरखनाथ का प्रभाव दो दर्जन से ज्यादा देशों तक पड़ा। गोरखनाथ और परवर्ती पीठाधीश्वरों ने विद्यमान योगसूत्रों में भी ध्यान साधना के नवीन आयाम जोड़े। गोरखपुर योग और योग उपासना का ऊर्जा क्षेत्र है। गोरखपुर उत्तर प्रदेश में है और इसी नाथ परम्परा के पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ उ.प्र. के मुख्यसेवक है। उत्तर प्रदेश को प्रत्येक दृष्टि से संपन्न और सांस्कृतिक बनाने के लिए उनका प्रयास ऐतिहासिक है। वे जो भी करते हैं, वह ऐतिहासिक हो जाता है।

संत परंपरा में उत्तर प्रदेश की समृद्धि रोमांचकारी है। तुलसी, कबीर और सूर अनूठे हैं। संत तो हैं ही कवि और ऋषि भी हैं। भारतीय संस्कृति का विकास सांस्कृतिक उत्तर प्रदेश में हुआ। उ.प्र. स्वाधीनता आन्दोलन की गतिविधि का प्रमुख केन्द्र रहा। 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की मुख्यभूमि भी अपना प्रदेश ही था। दूसरे स्वाधीनता संग्राम की मुख्य भूमि भी यूपी ही था। भारत के महान विद्वान और नेता लोकमान्य तिलक ने यहीं लखनऊ आकर “स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है” का उद्घोष किया। गांधी जी ने यहां दीर्घकालिक प्रवास किया, यात्राएं भी कीं। रामायण मेले और भारतीय संस्कृति के अनुरागी डॉ राममनोहर लोहिया यू0पी0 के। विदेशी समाजवाद में संस्कृति तत्व जोड़ने वाले लोहिया ने काल माक्र्स के अर्थशास्त्र को अपूर्ण बताया था। उन्होंने यू0पी0 की ही संस्कृति और दर्शन के प्रभाव में “इकोनामिक्स बियांड माक्र्स – अर्थशास्त्र माक्र्स से आगे” लिखा। एकात्म मानव दर्शन के ऋषि पं. दीनदयाल उपाध्याय भी मथुरा के। उनके जीवन का अधिकांश कर्मक्षेत्र उप्र ही था। संप्रति उन्हीं के द्वारा प्रतिपादित विचारधारा की केन्द्र व राज्य सरकारें हैं। उप्र की सांस्कृतिक समृद्धि अनूठी है। बार-बार ध्यान देने योग्य है।

ऋग्वैदिक काल के पूर्वजो ने जल को ‘आपः मातरम्’ गाया था। ऋग्वेद के नदी सूक्त में नदियों की स्तुति है। उत्तर प्रदेश की गंगा, यमुना और सरस्वती आदि नदियां हमारे पूर्वजों की प्रीति रही हैं। सरयू को श्रीराम का सान्निध्य मिला, वे श्रंगवेरपुर में गंगा को प्रणाम करते हुए चित्रकूट गये। यह गाथा तमसा नदी पर वाल्मीकि के दिव्य दर्शन से शब्द आकार बनी। यमुना को श्रीकृष्ण की प्रीति मिली और श्रीकृष्ण को यमुना की। सई आदि तमाम नदियों के जल से प्रभावित उप्र का आंचल जलरस से भरापूरा रहा है। सरस्वती महा जलप्रलय के दौरान घटित तमाम भौगोलिक परिवर्तनों के कारण अब मूल रूप में नहीं है। लेकिन ज्ञान देवी के रूप में उसका प्रवाह हम सबके अन्तस छन्दस में पुण्य भाव भरता है। यूपी ने महान सर्जकों को जन्म दिया है। हिन्दी के विद्वानों में रामचन्द्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ रामविलास शर्मा आदि का सृजन अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति का है। वामपंथी विद्वानों में डॉ नामवर सिंह अतुलनीय हैं। विश्वनाथ तिवारी सहित आदि अनेक विद्वानों की मुख्य भूमि उत्तर प्रदेश ही है। यहां संस्कृत साहित्य का विकास हुआ, संस्कृत ने संस्कृति को अविस्मरणीय बनाया। तमाम ललित कलाओं से समृद्ध उप्र की धरती की अपनी अस्मिता है।

उत्तर प्रदेश ने भारत को प्रभावित किया, भारतीय संस्कृति को शक्ति का संवर्द्धन किया लेकिन जीवनयापन की महत्वपूर्ण सुविधाओं से 22 करोड़ की जनसंख्या का बड़ा भाग उपेक्षित रहा है। राज्यपाल श्रीरामनाईक ने उत्तर प्रदेश दिवस के आयोजन का परामर्श पूर्ववर्ती राज्य सरकार को दिया था। उस सरकार ने इसे महत्व नहीं दिया। लेकिन योगी आदित्यनाथ ने इस आयोजन को महत्ता दी। संस्थाओं के स्थापना दिवस या महापुरूषों की जयंतियों के आयोजन निस्संदेह प्रेरित करते हैं लेकिन योगी जी ने इस आयोजन को सर्वथा नई दिशा दी। उन्होंने उप्र के लिए करोड़ों रूपए की नई योजनाओं की घोषणा की। आयोजन सामान्य से असामान्य हो गया। उन्होंने काफी अर्से से सूने पड़े करोड़ो रूपए से बने हस्तशिल्प ग्राम को भी योजना का भाग बनाया। उन्होंने इस भव्य आयोजन को रस्मी जलसे लाभकारी परिणामों वाला सरकारी संकल्प बनाया। आलोचकों को निन्दा करने का अधिकार है लेकिन तमाम योजनाओं के संकल्प से जुड़े इस स्थापना दिवस को यूपी के जनगणमन ने खुले दिल से स्वीकार किया है।

योगी आदित्यनाथ हमेशा नया सोचते हैं और जो कुछ सोंचते हैं उसे पूरा करने में पूरी शक्ति और संकल्प के साथ जुट जाते हैं। उन्हें कोई भी कार्य असंभव नहीं लगता। वे योगी हैं। उन्होंने प्रत्येक जिले का विशेष शिल्प, विशेष उत्पाद या विशिष्ट हुनर खोजने का काम किया। प्रत्येक जिले की विशिष्टता सामने आई। इस योजना सरकारी संरक्षण का लाभ उठाकर संबंधित जिले के लोग अपने विशेष शिल्प कौशल का प्रयोग अपने क्षेत्र में ही करेंगे। उत्पादन में वृद्धि के साथ नए रोजगार भी सृजित होंगे। उनकी आय बढ़ेगी। बढ़ी आय से उनकी क्रय शक्ति बढ़ेगी। वे बढ़ी क्रय शक्ति से अन्य क्षेत्रों के उत्पाद खरीदेंगे। समृद्धि में चक्रानुवर्ती वृद्धि होगी। इस योजना को मुख्यमंत्री का मानसपुत्र कहा जा सकता है। प्रधानमंत्री आवास योजना से लाखों परिवारों को लाभान्वित करने का काम तेज रफ्तार चल रहा है। ऊर्जा क्षेत्र में गरीबों को निःशुल्क कनेक्शन की योजना लोकप्रिय है ही। उत्तर प्रदेश समृद्धि के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। समृद्ध संस्कृति और समृद्ध जन मिलकर भारत को आर्थिक महाशक्ति बनाएंगे। 22 करोड़ जन की आशा और उम्मीदों में मुख्यमंत्री और उनकी सरकार के शपथ संकल्प हैं।

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