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सत्ता के लालच में एक वंशवादी नेता ने अपनी राजनीतिक विरासत और पार्टी दोनों को मिट्टी में मिला दिया

उद्धव ठाकरे ने महज सत्ता की लालसा में बालासाहेब ठाकरे के सिद्धांतों को तिलांजलि दे दी और अपने घोर विरोधी के साथ साँठ-गाँठ करके अपनी पार्टी और बालासाहेब की विरासत को मटियामेट कर दिया

लोकसभा के बाद राज्यसभा से भी वक्फ संशोधन बिल पारित हो गया। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद अब जल्द ही कानून का रूप भी ले लेगा। वक्फ संशोधन बिल पर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का साथ देकर उद्धव ठाकरे ने अपने पिता बालासाहेब ठाकरे के सिद्धांतों को तिलांजलि दे डाली। उनके कहने पर शिवसेना यूबीटी के सभी सांसदों ने इस बिल के खिलाफ वोट किया। यही नहीं इसके बाद उद्धव ठाकरे ने तंज भी कसा कि मुसलमानों के लिए भाजपा की चिंता देखकर जिन्ना को भी शर्म आ जाएगी। उनका यह बयान यह साबित करने के लिए काफी है कि उनकी विचारधारा अब पूरी तरह से हिंदुत्व के खिलाफ हो चुकी है।

उद्धव का यह बयान महज एक राजनीतिक बयान नहीं है बल्कि शिवसेना के मूल सिद्धांतों और हिन्दू हृदय सम्राट बालासाहेब ठाकरे की विरासत की मुखालफत करना है, उनके विचारों का विरोध करना है। बालासाहेब ठाकरे ने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। जो कहा, उस पर अडिग रहे। ऐसे में उद्धव के इस कदम को क्या कहा जाए? क्या शिवसेना यूबीटी का वक्फ संशोधन के खिलाफ वोट करना और इसके बाद उद्धव ठाकरे का तंज साबित नहीं करता कि वे मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने के लिए पूरी तरह अपनी विचारधारा बदल चुके हैं।

बालासाहेब ठाकरे का हिंदुत्व पर अडिग विश्वास था। वे कभी मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति के पक्षधर नहीं थे। ठाकरे हमेशा कहते थे, ” हिंदुत्व भारत की पहचान है। मुसलमानों को भारत में रहने का अधिकार है, लेकिन हिंदू समाज की प्राथमिकताओं से हटकर उनका कोई स्थान नहीं होना चाहिए। बाला साहेब ने कभी सेक्युलरिज्म का बाना नहीं ओढ़ा और हमेशा मुस्लिम तुष्टिकरण का विरोध किया। वहीं उद्धव ठाकरे का रवैया उनके एकदम विपरीत है। वे मुसलमानों के ‘अधिकार’ की बात कर रहे हैं। वक्फ की मनमानी पर अंकुश लाने और पारदर्शिता रखने के लिए सही नीयत से लाए गए बिल के खिलाफ बोल रहे हैं।

उद्धव ठाकरे को राजनीति करनी है तो करें, उनकी भाजपा से नहीं बन रही तो कोई दिक्कत नहीं, लेकिन इस तरह के तंज और इस बिल के खिलाफ अपने सांसदों से वोट करवाना उनकी पार्टी के नाम को शोभा नहीं देता। शायद वह भूल गए हैं कि वे उन बालासाहेब के पुत्र हैं, जिन्हें शेर कहा जाता है। शायद ही कोई ऐसा नेता हो, अभिनेता हो जो उनके दरवाजे पर न गया हो। वे भाजपा के साथ होते थे तो भी अपनी शर्तों पर होते थे। यहां तक कि वह यह भी कहा करते थे कि ‘कमलाबाई’ यानी भाजपा वही करेगी जो वह कहेंगे। उनकी एक हनक थी, एक अंदाज था, राजनीतिक गलियारों में उनका सम्मान विपक्षी भी करते थे, आज भी उनके नाम का बेहद सम्मान है, लेकिन उद्धव ने तो उस सम्मान का भी लिहाज नहीं किया जिसके दम पर वह राजनीति में यहां तक पहुंचे । बालासाहेब ने कभी चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति उनके इर्द—गिर्द ही घूमती थी। अपने बंगले मातोश्री में बैठकर उन्होंने जो बोल दिया वो होना ही होता था।

क्या उद्धव के इस कदम से स्वर्गीय बालासाहेब ठाकरे की आत्मा को ठेस नहीं पहुंचेगी? महज महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनने की लालसा में वह इस स्तर पर चले जाएंगे, यह तो किसी ने सोचा भी नहीं होगा। माना वे विपक्ष में हैं, वे वहां रहते, कम से कम इस मुद्दे पर उनके सांसदों को इस बिल के खिलाफ वोट नहीं करना चाहिए था। राजनीतिक मतभेद होने का अर्थ यह तो नहीं आप उस विचारधारा को ही त्याग दें जिसके चलते आपका वजूद है। जहां तक बाल ठाकरे के हिंदुत्व की बात है तो हिंदुत्व उनका राजनीतिक विचार नहीं था, यह उनका जीवन दर्शन था, जिस पर उन्होंने कभी समझौता नहीं किया।

क्या उद्धव ठाकरे अब उसी राह पर नहीं चल रहे हैं, जिस राह पर सेक्युलरिज्म का ढिंढोरा पीटने वाले तमाम राजनीतिक दल चलते हैं। उद्धव ठाकरे का बयान दर्शाता है वे राजनीतिक स्वार्थ के लिए किसी भी सिद्धांत से समझौता कर सकते हैं।
शिवसेना भले ही दो हिस्सों में बंट गई हो लेकिन उसकी पहचान तो हिंदुत्व से ही है। उनके इस कदम ने यह साफ कर दिया कि उनकी राजनीति अब पूरी तरह से तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति तक सीमित हो गई है। उद्धव ठाकरे ने अपने पिता की विरासत और शिवसेना के हिंदुत्व के सिद्धांतों को तिलांजलि दे डाली है, केवल और केवल सत्ता की खातिर।