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कोरोना महामारी के कारण वैश्विक बेचेनी है। वैज्ञानिक कम समय में ही कोरोना का टीका खोजने में सफल हुए हैं, लेकिन कोरोना की दवा अभी तक नहीं खोजी जा सकी है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी किसी स्पष्ट निर्णय पर नहीं पहुंचा है।

आपातकाल के दौरान दिल्ली में जगह-जगह बसी हुई झुग्गी बस्तियों को हटाने और 1982 में दिल्ली में आयोजित एशियाई खेलों और गुट-निरपेक्ष सम्मेलन के शानदार और सुव्यवस्थित आयोजन का श्रेय जगमोहन को जाता है।

Coronavirus: दिल्ली के श्मशानों में जलती चिताओं का सीधा कनेक्शन उन अस्पतालों से है जो दिल्ली सरकार के दायरे में आते हैं। इन अस्पतालों में बेहिसाब मौते हो रही हैं। इसकी सीधी सी वजह केजरीवाल सरकार की भयानक असफलता और अस्पतालों में बेसिक सुविधाओं का अभाव है। मगर अंतराष्ट्रीय मीडिया दिल्ली के इन अस्पतालों में फैली हुई भयानक अव्यवस्था और बदइंतजामी का ठीकरा मोदी के सिर पर फोड़ रहा है।

विश्व मानवता विचार व बुद्धि से संचालित है। हम इसके अविभाज्य अंग हैं। इसलिए हम सब भी विचार व भाव प्रेरित हैं। क्वांटम भौतिकी के विशेषज्ञ डा. जाॅन हेजलिन ने लिखा है, ‘‘हमारा शरीर वस्तुतः हमारे विचारों का परिणाम है।

व्यक्ति असाधारण संरचना है। शरीर प्रत्यक्ष है। अंतःकरण अप्रत्यक्ष है। हमारे कर्म तप भौतिक हैं। इनके प्रेरक तत्व हमारे भीतर हैं। प्रेरणा दिखाई नहीं पड़ती। इसकी वाह्य गतिविधि दिखाई पड़ती है। जब हर्ष, उल्लास दुख-सुख के भाव बाहर प्रकट होते हैं, तब दिखाई पड़ते हैं।

मनुष्य आनंद अभीप्सु है। आनंद के तमाम उपकरण प्रकृति में हैं। वे प्राकृतिक हैं। अनेक उपकरण समाज में भी हैं और वे सांस्कृतिक हैं। समाज अपने आनंद के लिए अनेक संस्थाए बनाते हैं। राजव्यवस्था समाज की सबसे महत्वपूर्ण संस्था है। एक विशेष भूखण्ड में रहने वाले लोगों की एक जीवनशैली होती है।

रोहिंग्या घुसपैठिये मोहम्मद सलीमुल्ला ने ‘विख्यात’ वकील प्रशांत भूषण के माध्यम से उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिका दायर करते हुए जम्मू-कश्मीर प्रशासन की इस कार्रवाई पर तत्काल रोक लगाने की माँग की है। साथ ही, गृह मंत्रालय को यह निर्देश देने की भी माँग की गयी है कि वह अनौपचारिक शिविरों में रह रहे रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय (एफ आर आर ओ) के माध्यम से तत्काल और तीव्र गति से शरणार्थी पहचान पत्र जारी करे ताकि इन ‘शरणार्थियों’ का उत्पीड़न न हो सके।

जीवन सरल है, तरल है और विरल भी। संसार का प्रत्येक व्यक्ति अनेक अभिलाषाओं से भरा पूरा है। अभिलाषाएं कभी पूरी नहीं होती। अनंत है अभिलाषाएं। एक पूरी हुई दूसरी सामने है। मेरे मन में जीवन को समझने की अभिलाषा रही है। यह कठिन कार्य है।

पद्मश्री कंवलसिंह चौहान ने बताया कि भारत में कागज बनाने की 639 कारखाने हैं जोकि फिलहाल सभी बंद पड़ी हैं। बंद होने का केवल एक ही कारण है कि उसमें लगने वाली लागत करीब 80 रुपए होता था, और चायना से वही कागज हमको 60 रुपए किलोग्राम के हिसाब से मिल जाता है।