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स्वर्गीय कार्तिक उरांव जी : व्यक्तित्व एवं कृतित्व

श्री कार्तिक उरांव जी ने अपनी पुस्तक “बिस वर्ष की काली रात” में कहा है कि जनजातियों और हिंदुओं द्वारा पालन किए जाने वाले अनुष्ठानों में कोई विरोधाभास नहीं है, बल्कि वे पूरक हैं। निषादराज, शबरी, कनप्पा आदि का उदाहरण देते हुए और प्राचीन भारतीय ग्रंथों में वर्णित विभिन्न उपाख्यानों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि भारत के जनजाति अनादि काल से हिंदू थे।

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By: विवेकानंद नरताम

हजारों वर्षों से वनों में रहनेवाले जनजाति समाज में जन्मे स्वर्गीय कार्तिक उरांव जी का अनन्यसाधारण व्यक्तित्व एवं कृतित्व पीढ़ियों तक हमारा मार्गदर्शन करता रहेगा. एक उच्च विद्याविभूषित और पेशेवर इंजीनियर होने के कारण उनके सामने अनेक अवसर उपलब्ध थे. परतु जिस समाज से वे आए थे, उसकी सेवा करने में ही उन्होंने अपने जीवन लक्ष निर्धारित किया. जनजाति समाज का विकास एवं उसमे आनेवाली बाधाओं सबंधी उनके पास दूरदृष्टि थी. उन्होंने संसद एवं उसके बहार समाज में  बिना लाग-लपेट के मुखर होकर इस सन्दर्भ में बातों को रखा. यही एक कारण है की उनके स्वर्गवास के इतने वर्षों के बाद भी, उनके विचारों की प्रासंगिकता थोड़ी भी कम नहीं हुई है.

स्वर्गीय कार्तिक उरांव जी को उनके सहकारी एवं अनुयाई बाबा कार्तिक उरांव साहेब के नाम से पुकारते थे. जनजाति समाज के वे अत्यंत मेधावी एवं उच्च विद्याविभूषित नेता थे. अपने लोगों के प्रति उनकी अत्यधिक प्रतिबद्धता के कारण उन्होंने तीन बार लोहरदगा संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व लोक सभा में किया. वे अपनी कड़ी मेहनत और समाज और राष्ट्र की सेवा करने के जुनून के बल पर भारत सरकार के विमानन और संचार मंत्री भी बने. भारत के जनजातीय समाज के उत्थान के लिए वे आजीवन प्रतिबद्ध रहे एवं उनके  धर्म एवं संस्कृति की बाहरी आघातों से रक्षा के लिए सदैव प्रयत्नशील रहे.

उनका जन्म 29 अक्टूबर 1924 को झारखंड राज्य के गुमला जिले के करौंदा लिटाटोली नामक गाँव में कुरुख जनजाति से संबंधित जायरा उरांव (पिता) और बिरसी उरांव (माँ) के यहाँ हुआ था. 1942 में गुमला से हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने साइंस कॉलेज, पटना से इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की. आगे चलकर उन्होंने  बिहार कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग, पटना से इंजीनियरिंग में स्नातक की पढ़ाई पूरी की. इसके बाद वे इंग्लैंड चले गए और रॉयल कॉलेज ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, ग्लासगो और बैटरसी कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी, लंदन विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग में अपनी आगे की पढ़ाई पूरी की. उन्होंने लंदन के लिंकन इन में बार-एट-लॉ का भी अध्ययन किया. भारतीयों के लिए यह गर्व की बात है कि इंग्लैंड में अपने 9 वर्षों के निवास के दौरान उन्होंने 1959 में ब्रिटिश सरकार के लिए दुनिया के सबसे बड़े स्वचालित पावर स्टेशन का डिजाइन तैयार किया. आज इसे ‘हिंकले न्यूक्लियर पावर प्लांट’ के नाम से जाना जाता है.

श्री कार्तिक उरांव 1961 में भारत लौटे और उन्होंने एचईसी (Heavy Engineering Corporation Ltd., Ranchi) में अधीक्षक निर्माण डिजाइनर का पद संभाला. इसके साथ ही उन्होंने बीएयू (Birsa Agricultural University, Ranchi) और सेंट्रल लाइब्रेरी के भवन का भी डिजाइन तैयार किया. बाद में उन्हें उप मुख्य डिजाइन इंजीनियर के पद पर पदोन्नत किया गया, लेकिन उस समय छोटानागुपर के जनजातियों की स्थिति को देखते हुए; उन्होंने समाज के लिए काम करने का संकल्प लिया और 1962 में राजनीति में प्रवेश किया. वे न केवल एक कुशल इंजीनियर थे, बल्कि एक उत्कृष्ट राजनीतिज्ञ भी थे.

आचार्य विनोबा भावे जी के नेतृत्व में 1968 में जब भूदान आंदोलन तेज हो रहा था, तब जनजातियों की जमीन सस्ते दामों पर बेची जा रही थी। ऐसे समय में कार्तिक उरांव ने श्रीमती इंदिरा गांधी से अपील की कि वे जनजातियों को उनकी भूमि से वंचित करके भूमिहीन होने से बचाएं। वह तत्कालीन प्रधान मंत्री श्रीमती गांधी को मनाने में सफल रहे और इस मुद्दे पर अधिनियम बनाकर जनजातियों की खोई हुई भूमि को वापस पाने की व्यवस्था की गई। श्री कार्तिक उरांव के अथक प्रयासों के कारण ही रांची में बिरसा कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना हुई. उन्होंने ‘ट्राइबल सब-प्लान ‘ के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी जिसके आधार पर वर्तमान में केंद्र और राज्य सरकारें जनजातियों के विकास के लिए विभिन्न विकास योजनाएं चला रही हैं.

स्वर्गीय कार्तिक उरांव जी को जनजातियों का धर्म , संस्कृति और परंपराओं को  बचाने के लिए उनके सबसे महत्वपूर्ण योगदान के लिए सदैव याद किया जाएगा. ईसाई मिशनरियों द्वारा जनजातियों को बड़ी संख्या में धर्म परिवर्तन करने के लिए अनेक प्रकार के प्रलोभन दिए जा रहे थे, जो की आज भी निरंतर हो रहा है. कार्तिक उरांव जी को  ईसाई पादरियों के इस प्रकार के  बेईमान इरादे नामंजूर थे. जनजातियों की गरीबी, पिछड़ापन और अज्ञानता का फायदा उठाकर उन्हें ईसाई बनाने के प्रयासों का उन्होंने कड़ाई से विरोध किया. इसपर रोक लगे इस उद्देश्य से उन्होने 1967 में लोकसभा के 322 सदस्यों और राज्यसभा के 26 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित भारत सरकार को एक ज्ञापन सौंपा. इस दस्तावेज़ में स्पष्ट रूप से धर्मान्तरित व्यक्तियों के आरक्षण लाभों पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव सरकार के समक्ष रखा गया था.

उक्त ज्ञापन के सुझावों का इंदिरा गांधी सरकार में लोकसभा के 50 सदस्यों द्वारा प्रतिवाद किया गया था जो भारत में ईसाई मिशनों के इशारे पर काम कर रहे थे. कार्तिक उरांव जी के अथक प्रयासों के बावजूद ज्ञापन में सिफारिशों को लागू नहीं किया जा सका क्योंकि ईसाई मिशनों ने इंदिरा गांधी पर उन्हें लागू नहीं करने का जबरदस्त दबाव डाला. ज्ञापन में सुझाव अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आदेश (संशोधन) विधेयक, 1967 पर संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की सिफारिशों के बिल्कुल अनुरूप थे. समिति ने निम्नलिखित संशोधन की सिफारिश की थी:

“2A. Notwithstanding anything contained in the parliament in Paragraph 2, no person who has given up tribal faith or and has embraced either Christianity or Islam shall be deemed to be a member of any Scheduled Tribes ( Vide Para 2A, page 29, line 38 of the Schedule II of the report).

ऐसा संशोधन अनुसूचित जाति (एससी) के मामले में 1956 में पहले ही किया जा चुका था जो इस प्रकार है –

“3. Notwithstanding anything contained in the Paragraph 2, no person who professes a religion different from the Hindu or Sikh Religion shall be deemed to be a member of Scheduled Castes”

श्री उरांव और संयुक्त संसदीय समिति द्वारा प्रस्तुत ज्ञापन में उल्लिखित सिफारिशों का समय पर क्रियान्वयन सही दिशा में एक कदम साबित होता. वर्तमान में जनजातियों की बड़ी आबादी को ईसाई धर्म अपनाने का लालच दिया जाता है, पूर्वोत्तर राज्य भारत का सबसे बुरी तरह प्रभावित क्षेत्र है. सेंटर फॉर पॉलिसी स्टडीज (सीपीएस) द्वारा 2011 की धर्म डेटा जनगणना पर नवीनतम प्रकाशित नोट के अनुसार, मिजोरम मणिपुर और नागालैंड अब लगभग पूरी तरह से ईसाई बन गए हैं. अनुसूचित जनजातियों के बीच ईसाई आबादी मिजोरम में 90.08 प्रतिशत है और मणिपुर और नागालैंड में क्रमशः 97.42 और 98.21 प्रतिशत है. यह प्रवृत्ति भारत के विभिन्न अन्य हिस्सों में भी जनजातियों के बीच जारी है. ईसाई धर्म में उनका रूपांतरण अनिवार्य रूप से उन्हें उनकी सांस्कृतिक विरासत और मूल आस्था से अलग कर देता है जिसका ये समुदाय वर्षों से पालन कर रहे हैं. इसके अलावा, नव परिवर्तित ईसाइयों ने उन लोगों को सताना शुरू कर दिया है जो अपने मूल आस्था का पालन कर रहे है. साथ ही ताज़ा आंकड़ों के अनुसार ईसाई धर्मान्तरित ही आरक्षण का सबसे अधिक लाभ उठाते है. श्री कार्तिक उरांव ने इसका बहुत पहले ही अनुमान लगा लिया था और जीवन भर जनजातियों के लिए लड़ते रहे.

श्री कार्तिक उरांव जी ने अपनी पुस्तक “बिस वर्ष की काली रात” में कहा है कि जनजातियों और हिंदुओं द्वारा पालन किए जाने वाले अनुष्ठानों में कोई विरोधाभास नहीं है, बल्कि वे पूरक हैं। निषादराज, शबरी, कनप्पा आदि का उदाहरण देते हुए और प्राचीन भारतीय ग्रंथों में वर्णित विभिन्न उपाख्यानों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि भारत के जनजाति अनादि काल से हिंदू थे। अपनी पुस्तक में उन्होंने आगे कहा कि जनजातियों का ईसाई धर्म में धर्मांतरण भारत में ब्रिटिश शासन की तुलना में स्वतंत्र भारत में बड़े पैमाने पर हुआ है। इसलिए, एक सामाजिक कार्यकर्ता और जनजातियों के हितों के लिए एक सांसद के रूप में, उन्होंने धर्मांतरित जनजातीय लोगों को अनुसूचित जनजाति की श्रेणी से बाहर रखने पर जोर दिया।

8 दिसंबर 1981 के दुर्भाग्यपूर्ण दिन, श्री कार्तिक उरांव जी संसद भवन के गलियारे के फर्श पर गिर गए। उन्हें इलाज के लिए राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती कराया गया  लेकिन उनकी हालत बिगड़ती गई और उनका स्वर्गवास हो गया। वे आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका व्यक्तित्व एवं कृतित्व  उन सभी का मार्गदर्शन करते रहेंगे जो भारत की सनातन परम्परों पर विश्वास रखते है  और भारतीय जनजाति समाज के सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिए प्रतिबद्ध है।

((विवेकानंद नरताम, श्याम लाल महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के सहायक प्राध्यापक है))

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