बच्चों को जानलेवा तंबाकू के खतरे से बचाने के लिए जरूरी है कानून में संशोधन 

तंबाकू सेवन की चपेट में बच्चे अब पहले से कहीं अधिक हैं। छह साल तक के बच्चे भी सिगरेट, बीड़ी जैसे तंबाकू उत्पादों का सेवन करने लगे हैं। हमें बच्चों में तंबाकू इस्तेमाल को रोकने के लिए कॉटपा (सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम) के प्रावधानों को मजबूत बनाना होगा। 

Written by: October 3, 2021 1:44 pm
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अभी तक हम यही मानते आए थे कि सिगरेट या ड्रग्स का इस्तेमाल युवा अवस्था में साथियों के दबाव या प्रयोग के कारण शुरू होता है, लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल अलग और बहुत कड़वी है। क्या हमने कभी सोचा है कि हमारे स्कूली बच्चे बहुत कम उम्र में इस खतरे के संपर्क में आ रहे हैं? बहरहाल, यह कड़वी सच्चाई है। कई अध्ययनों, शोधों और सर्वेक्षणों के आंकड़े परेशान करने वाले हैं। उन आंकड़ों से पता चला है कि औसतन 10 वर्ष की उम्र के बच्चे तंबाकू उत्पादों का इस्तेमाल कर रहे हैं। तंबाकू उत्पादों तक उनकी पहुंच आसान होने यानी इन उत्पादों के आसानी से मिलने के कारण वे इनकी ओर आकर्षित होकर पहला कदम उठाते हैं और उन्हें इनकी लत लगते देर नहीं लगती है।

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ज्यादा जोखिम में हैं बच्चे 

वर्ष 2012 में बच्चों के तंबाकू उत्पादों का इस्तेमाल शुरू करने की औसत उम्र 12 वर्ष तीन महीने थी। वर्ष 2019 में यह उम्र कम होकर 10 साल रह गई। यह दर्शाता है कि कैसे जोखिम बढ़ रहा है। हमारे बच्चे इससे भी कम उम्र में तंबाकू उत्पादों का इस्तेमाल शुरू कर चुके हैं। देश के कुछ हिस्सों, जैसे कि पूर्वोत्तर राज्यों, विशेष रूप से मिजोरम और असम में तत्काल इस पर ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि वहां छह साल के बच्चों तक में तंबाकू उत्पाद अपनी पैठ बना चुके हैं यानी इस उम्र के बच्चे भी इनका सेवन करने लगे हैं।

हाल ही में केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री मनसुख मंडाविया ने ग्लोबल यूथ टोबैको सर्वे (GYTS-4), भारत, 2019 की नेशनल फैक्ट शीट जारी की। यह रिपोर्ट कड़वी सच्चाई को उजागर करने और आंखें खोलने वाली है जिसमें बताया गया है कि स्कूल जाने वाले 13-15 वर्ष की उम्र के बच्चों में तंबाकू सेवन कितना बढ़ रहा है। सर्वे के मुताबिक, 13-15 वर्ष की आयु के लगभग पांच में से एक बच्चे ने अपने जीवन में किसी न किसी रूप में (धूम्रपान, धुआं रहित और अन्य रूपों में) तंबाकू का इस्तेमाल किया। लड़कों में तंबाकू के सेवन का प्रचलन 9.6% और लड़कियों में 7.4% था। इस आयु वर्ग के स्कूली बच्चों में धूम्रपान का प्रचलन 7.3% था, जबकि धुआं रहित तंबाकू उत्पाद के मामले में प्रसार 4.1% था।

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प्रयास तेज करने और कॉटपा को सख्त बनाने की जरूरत

जाहिर है, हमारे बच्चे बहुत तेजी से तंबाकू के खतरे के शिकार हो रहे हैं। इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, हमें इस समस्या को रोकने के लिए अपने प्रयासों को तेज करना होगा। मेरा मानना है कि अगर कॉटपा कड़े नियमों और दंडों से लैस हो तो यह तंबाकू के इस्तेमाल को रोकने में महत्वपूर्ण हथियार साबित हो सकता है, खासकर बच्चों में। तंबाकू उत्पादों की बिक्री वाली जगह पर सभी प्रकार के विज्ञापनों को प्रतिबंधित कर और जिस उम्र में युवा तंबाकू खरीद सकते हैं उसे बढ़ा कर ऐसा किया जा सकता है। कॉटपा को और अधिक प्रभावी बनाने की दृष्टि से हाल ही में कुछ संशोधनों का प्रस्ताव किया गया है। हालांकि, तंबाकू उद्योग की ओर से निहित स्वार्थ की वजह से इन संशोधनों का विरोध किया जा रहा है।

तंबाकू लॉबी लंबे समय से इन कानूनों को दरकिनार करने की कोशिश कर रही है और लाखों लोगों की जान जोखिम में डाल रही है। तंबाकू कंपनियों के लिए अपने उत्पादों पर ‘तंबाकू का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है’ जैसी वैधानिक चेतावनियों को प्रमुखता से शामिल करना अनिवार्य है। लेकिन इन्होंने केसर, इलायची, गुलाब और ऐसी ही अन्य सामग्रियों की आड़ ले ली है और अपने उत्पादों का विज्ञापन कर इन कानूनों को दरकिनार कर दिया है। यदि आप ध्यान दें तो बहुत सारी तंबाकू कंपनियां बच्चों को तंबाकू उत्पादों के प्रति आकर्षित करने के लिए फिल्म अभिनेताओं का सहारा लेती हैं यानी उनसे विज्ञापन करवाती हैं। ऐसे में आप अच्छी तरह से कल्पना कर सकते हैं कि जब उनका पसंदीदा अभिनेता इस तरह के उत्पाद का प्रचार कर रहा होता है तो युवा दिमाग पर उसका किस तरह से प्रभाव पड़ता है। इसी तरह, कई तंबाकू कंपनियां ऐसे आयोजनों को प्रायोजित करती हैं जिनकी पहुंच व्यापक स्तर पर होती है। इन सभी का युवा मन पर ज्यादा प्रभाव पड़ता है और वह इन उत्पादों का इस्तेमाल शुरू करने के लिए प्रेरित होता है।

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मुझे विश्वास है कि कॉटपा में प्रस्तावित संशोधनों के प्रभावी होने के साथ इस तरह की गतिविधियों और छद्म विज्ञापनों को दंडनीय अपराध माना जाएगा और उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। इन संशोधनों से सीमा पार से होने वाले तंबाकू और अन्य ड्रग्स के अवैध व्यापार को रोकने में भी मदद मिलेगी, खासकर म्यांमार और बांग्लादेश से होने वाला अवैध व्यापार।

यहां इस बात का उल्लेख किया जा सकता है कि तंबाकू निरोधी विभिन्न कानूनों में निर्धारित कई जुर्माने बहुत कम हैं। इन कानूनों के जरिये तंबाकू इस्तेमाल को रोकना संभव नहीं है। जरा कल्पना कीजिए, किसी बच्चे को तंबाकू सेवन में धकेलने जितना बड़ा अपराध करने के लिए सिर्फ 200 रुपये जुर्माना! मुझे पूरी उम्मीद है कि कॉटपा में प्रस्तावित संशोधनों के परिणामस्वरूप इन जुर्मानों में बदलाव होगा ताकि अपराधी वैकल्पिक नियमों के जरिये बचने का रास्ता न खोज सकें। मुझे उम्मीद है कि संसद में बिल पेश होने और पारित होने के बाद कॉटपा और मजबूत होगा।

एनसीपीसीआर ने की कॉटपा में संशोधन की वकालत 

कॉटपा को मजबूत करने के लिए आवाज उठाने के अलावा, एनसीपीसीआर विभिन्न मंत्रालयों और सरकारी विभागों के साथ मिलकर भावी पीढ़ी को तंबाकू और ड्रग्स की लत से बचाने की जिम्मेदारी निभा रहा है। एनसीपीसीआर ने स्कूल स्तर पर पहल की है ताकि बच्चे ऐसी गतिविधियों में भाग ले सकें, तंबाकू के दुष्परिणामों को समझ सकें और जिम्मेदार नागरिक के रूप में विकसित हो सकें।

इसके लिए स्कूलों में प्रहरी क्लब बनाए गए हैं, जहां बच्चों को गांधी स्मृति दर्शन समिति द्वारा सलाह दी जाती है और स्कूल के एक निर्धारित दायरे के भीतर सतर्कता बरती जाती है। अवैध गतिविधियों पर नजर रखने के लिए एनसीपीसीआर स्कूलों में कैमरे भी लगा रहा है। इसके अलावा, बच्चों को नशीले पदार्थों से बचाने के लिए अधिसूचित दवाओं और कफ सिरप आदि की बिक्री पर अंकुश लगाने के साथ-साथ मेडिकल स्टोर और फार्मेसियों में भी कैमरे स्थापित कर रहा है। नजदीकी पुलिस स्टेशन उनकी इन गतिविधियों पर नजर रखेंगे।

बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए महिला और बाल विकास मंत्रालय के तहत काम करने वाले एक सांविधिक निकाय के रूप में एनसीपीसीआर, तंबाकू के इस्तेमाल को रोकने और बच्चों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त जांच और उपाय करने की तत्काल जरूरत पर ध्यान आकर्षित करना चाहता है। एनसीपीसीआर का मानना है कि कॉटपा में संशोधन एक आवश्यक कदम है जिसे जल्द से जल्द उठाया जाना चाहिए।

(लेखक राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष हैं, यह आलेख हाल ही में उनके द्वारा एक ऑनलाइन परिचर्चा में दिए गए उद्बोधन पर आधारित है )

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