कोरोना प्रबंधन का यूपी मॉडल

कोरोना की पहली लहर के साथ ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एग्रेसिव टेस्टिंग की पर जोर दिया है। नई प्रयोगशालाओं की स्थापना हो या उन्हें उपकरणों से और समृद्धि देने की जरूरत, सीएम ने हमेशा ही प्राथमिकता दी है। जिस उत्तर प्रदेश में पिछले वर्ष कोरोना के पहला केस के लिए सैम्पल टेस्टिंग एनआईवी पुणे में करानी पड़ी थी।

Avatar Written by: June 7, 2021 4:10 pm
Yogi Adityanath Corona Vaccination Dry Run

01- कोरोना कर्फ्यू: जीवन और जीविका के संरक्षण का भाव

कोरोना महामारी के खिलाफ देश में लड़ाई जारी है। तमाम राज्यों ने कोरोना के फैलाव को रोकने के लिए जहां पूर्ण लॉकडाउन लगाकर सामान्य गतिविधियों को ठप रखने की नीति अपनाई वहीं, उत्तर प्रदेश ने कोरोना कर्फ्यू की नीति को लागू किया। “जीवन और जीविका’ दोनों को सुरक्षित-संरक्षित करने की भावना के साथ लागू इस अभिनव व्यवस्था में मेडिकल जैसी आवश्यक गतिविधियों के साथ-साथ औद्योगिक इकाइयों, चीनी मिल, शीतगृहों, किराना की दुकानों, कृषि कार्य, निर्माण कार्य, फल-सब्ज़ी, खाद-बीज की दुकानों, खेती-बाड़ी से जुड़े काम,गेहूं क्रय केंद्रों का संचालन जारी रखा गया। कोरोना कर्फ्यू के बीच गेहूं खरीद में तो रिकॉर्ड भी बना। लोगों के आवश्यक आवागमन पर भी कोई रोक नहीं थी। विशेष परिस्थितियों के लिए ई-पास की सुविधा दी गई। राज्य के भीतर राज्य परिवहन निगम की बसें भी संचालित होती रहीं, ताकि किसी नागरिक को आवश्यकता पर आवागमन में दिक्कत न हो। बावजूद इसके, उत्तर प्रदेश का रिकवरी दर देश में सबसे अच्छा है तो यह प्रदेश सबसे कम पॉजिटिविटी दर वाले राज्यों में शुमार है। उत्तर प्रदेश के बारे में विशेषज्ञों ने आशंका जताई थी कि मई में हर दिन यहां न्यूनतम एक लाख पॉजिटिव केस आएंगे और मई के अंत तक 30 लाख एक्टिव केस होंगे। जबकि वस्तुस्थिति इससे कहीं उलट है। दिल्ली, उत्तराखंड, राजस्थान, केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र जैसे आबादी में उत्तर प्रदेश से आधे, एक तिहाई अथवा बराबर वाले राज्यों के साथ-साथ ब्रिटेन, यूनाइटेड स्टेट और ब्राजील जैसे बड़े देशों की तुलना में उत्तर प्रदेश में कोरोना की स्थिति कहीं बेहतर है। देश के तमाम राज्यों ने पूर्ण लॉकडाउन की नीति अपनाई, तमाम अन्य उपाय किये, लेकिन संक्रमण की रोकथाम में बहुत सफलता नहीं मिल रही।

02- एग्रेसिव टेस्टिंग :05 करोड़ पार टेस्टिंग का कीर्तिमान

कोरोना की पहली लहर के साथ ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एग्रेसिव टेस्टिंग की पर जोर दिया है। नई प्रयोगशालाओं की स्थापना हो या उन्हें उपकरणों से और समृद्धि देने की जरूरत, सीएम ने हमेशा ही प्राथमिकता दी है। जिस उत्तर प्रदेश में पिछले वर्ष कोरोना के पहला केस के लिए सैम्पल टेस्टिंग एनआईवी पुणे में करानी पड़ी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब देश में 24 मार्च को लॉकडाउन की घोषणा की थी, एक दिन पहले 23 मार्च को केजीएमयू की लैब में केवल 72 टेस्ट किए गए थे। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में कोविड-19 बीमारी की सिर्फ स्क्रीनिंग की ही सुविधा मौजूद थी। कोरोना का प्रकोप बढऩे के बाद दो हफ्ते के भीतर लखनऊ के संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआइ), मेरठ मेडिकल कॉलेज, सैफई ग्रामीण आयुर्विज्ञान संस्थान, गोरखपुर और झांसी मेडिकल कॉलेज के साथ केंद्र सरकार की लैब अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू), बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) और लखनऊ के कमांड अस्पताल में कुल मिलाकर रोज पांच हजार से अधि‍क सैंपल की कोरोना जांच शुरू हो गई। संसाधन बढ़ाने के लिए मुहिम के रूप में काम किया गया। नतीजतन, आज 05 करोड़ से ज्यादा टेस्टिंग हो चुकी है। यह भारत के किसी राज्य में हुई सर्वाधिक टेस्टिंग है। प्रदेश में 300 से अधिक लैबोरेटरी क्रियाशील हैं। आज उत्तर प्रदेश में एक दिन में तीन लाख से साढ़े तीन लाख टेस्टिंग हो रही है। इसमें भी दो लाख तक सैम्पल आरटीपीसीआर माध्यम से जांचे जा रहे हैं।

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03- गांव-गांव, घर-घर स्क्रीनिंग-टेस्टिंग: डब्ल्यूएचओ ने सराहा

कोविड महामारी से गांवों को सुरक्षित रखने के लिए अपनाई गई नीति को “विश्व स्वास्थ्य संगठन” से सराहना मिली। इस विशेष अभियान की शुरुआत करते समय मुख्यमंत्री ने कहा था कि हमें कोविड संक्रमण से गांवों को बचाने के लिए पुख़्ता इंतज़ाम करने की जरूरत है। ऐसे में प्रदेश के सभी 97 हजार राजस्व गांवों में कोविड टेस्टिंग का वृहद अभियान संचालित किया जाना चाहिए। यह देश में अपनी तरह की अनूठी और वृहद टेस्टिंग ड्राइव होगी। 05 मई से इस वृहद टेस्टिंग अभियान को शुरू किया गया। इसके तहत, 73 हजार निगरानी समितियों के 04 लाख सदस्य घर-घर जाते थे स्क्रीनिंग करते थे। यदि कोई लक्षणयुक्त अथवा संदिग्ध व्यक्ति मिला तो तत्काल रैपिड रिस्पॉन्स टीम से संपर्क कर उसकी टेस्टिंग कराई जाती थी। अवश्यक्तानुसार होम आइसोलेशन अथवा इंस्टिट्यूशनल क्वारन्टीन किया जाता था। मरीज और उसके परिजनों को मेडिकल किट उपलब्ध कराया जाता था। 09 मई के बाद अभियान की एक समीक्षा हुई जिसमें पाया गया कि 68 फीसदी गांव अब तक संक्रमण से दूर हैं। अभियान तो जारी रहा पर आगे की रणनीति तय करने में यह रिपोर्ट उपयोगी रही। वास्तव में, ट्रेसिंग और सर्विलांस को लेकर यूपी में शानदार काम हुआ। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कहना है कि कोरोना की चेन तोड़ने के लिए सबसे जरूरी है कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग और सर्विलांस को बेहतर करना। पूरे कोरोना काल में कांटेक्ट ट्रेसिंग की जिलेवार रिपोर्ट का आकलन हर दिन मुख्यमंत्री द्वारा की जाती रही। रिपोर्ट के आधार पर संबंधित जिलों को सक्रियता बढ़ाने के निर्देश दिए जाते रहे। मॉनीटरिंग की गई। ज्यादातर जिलों में एक कोविड पॉजिटिव मरीज की पुष्टि पर 15-20 कांटेक्ट ट्रेसिंग की गई है। इससे संक्रमण का प्रसार कम से कम होता गया। इसी तरह, सर्विलांस की टीमें गांव-गांव घर घर नजर रखती रहीं। 24 करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश में आज 18 करोड़ लोगों तक संपर्क किया जा चुका है।

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04- अर्ली ट्रीटमेंट-अर्ली रिकवरी

कोरोना काल में समाज के अलग-अलग लोगों से संवाद करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हमेशा ही लोगों से बीमारी को न छुपाने की अपील की। उन्होंने बार-बार दोहराया कि यह बीमारी नहीं महामारी है। जितनी जल्दी इलाज होगा, उतनी ही जल्दी स्वस्थ हो सकेंगे। इसी भावना के साथ कोरोना मरीजों को सुविधाजनक ढंग से गुणवत्तापूर्ण इलाज मुहैया कराई गई। यह संकल्पबद्धता का परिचायक है कि जिस उत्तर प्रदेश में पिछले वर्ष जब कोरोना का पहला मरीज मिला था, तब प्रदेश में उसके इलाज की कोई व्यवस्था नहीं थी। अंततः उसे दिल्ली के सफदरजंग हॉस्पिटल भेजना पड़ा, आज उसी प्रदेश में पौने दो लाख आइसोलेशन बेड, सवा लाख आईसीयू/एचडीयू बेड उपलब्ध हैं। सभी जिलों में वेंटिलेटर हैं, उन्हें चलाने वाले प्रशिक्षित कर्मचारी हैं। माइल्ड, सीवियर और क्रिटिकल स्थिति वाले मरीजों के लिए क्रमशःएल-1, एल-2 और एल-3 अस्पताल तैयार कराए गए। डॉक्टरों/पैरामेडिकल स्टाफ का कोविड के इलाज के लिए प्रशिक्षण दिया गया। एक-एक अस्पताल की 24×7 निगरानी की गई। जरूरत दवा की हो, ऑक्सीजन की हो, उपकरण की हो अथवा मैंनपॉवर की सबका त्वरित निदान सुनिश्चित कराया गया। नतीजतन स्थिति नियंत्रित रही। एक ओर सरकारी चिकित्सा संस्थानों में जहां कोविड इलाज पूर्णतः निःशुल्क रहा, वहीं सरकार द्वारा अधिग्रहीत निजी चिकित्सालयों में ‘आयुष्मान भारत’ अंतर्गत उपचार का खर्च कवर किया गया, जिससे कमजोर आय वर्ग के लोगों को बड़ी राहत मिली।

05- प्रतिबद्धता के साथ नियोजित प्रयास, कोविड टीकाकरण में अव्वल

“टीकाकरण, कोरोना से बचाव का सुरक्षा-कवर है। प्रदेश के हर नागरिक को यह सुरक्षा कवर दिया जाएगा।” मुख्यमंत्री ने इस बात को अलग-अलग मौकों पर दोहराया है। उनका यह कहना बताता है कि उनकी नीतियों में टीकाकरण का कितना महत्वपूर्ण स्थान है। शायद, प्रतिबद्धता का यही भाव है, जिसके कारण एक ओर जहां दिल्ली और महाराष्ट्र जैसे साधन संपन्न राज्य, एक-एक कर टीकाकरण बंद कर रहे हैं, वहीं यूपी में प्रदेशव्यापी वैक्सीनेशन किसी मेगा इवेंट से कम नहीं है।एक जून से हर दिन औसतन साढ़े तीन लाख लोगों को टीका-कवर उपलब्ध कराया जा रहा है। केंद्र सरकार द्वारा 18-44 आयु वर्ग के लोगों के टीकाकरण की अनुमति एक मई से देने के चंद घंटों के भीतर ही मुख्यमंत्री ने ऐलान किया कि एक मई से यूपी में 18-44 आयु के लोगों का टीकाकरण होगा और राज्य सरकार पूरा खर्च वहन करेगी।नियत तिथि से यह काम शुरू भी हुआ। आज पूरे प्रदेश में टीकाकरण सुचारू रूप से चल रहा है। यही नहीं, अब मीडिया, न्यायालय, सरकारी कर्मचारी आदि वर्गों के लिए अलग-बूथ बनाये गए हैं। तो, 12 वर्ष से कम आयु के बच्चों के अभिभावकों के लिए “अभिभावक स्पेशल” बूथ बनाकर टीकाकरण किया जा रहा है। सर्वाधिक वैक्सीन लगाने में यूपी पहले स्थान पर है। 45+ आयु के लोगों के लिए टीका केंद्र सरकार द्वारा दिया जा रहा है तो 18-44 आयु के लोगों का टीकाकरण राज्य सरकार के संसाधनों से हो रहा है। यही नहीं, वैक्सीन प्रोक्योरमेंट के प्रयासों के क्रम मं। वैक्सीन आपूर्ति के लिए ग्लोबल टेंडर जारी किए। यूपी की इस कार्यवाही का देश के कई राज्यों ने अनुसरण किया।

06- ऑक्सीजन की बूंद-बूंद संरक्षित, नीति आयोग ने मॉडल को बताया शानदार

कोरोना की दूसरी लहर के बीच देश जब आक्सीजन के संकट से त्राहिमाम कर रहा था, तब उत्तर प्रदेश ने वह कदम उठाया जिसकी सर्वत्र सराहना हुई। ऑक्सीजन की बढ़ती मांग को देखते हुए ऑक्सीजन की उपलब्धता सुनिश्चित कराने के साथ-साथ वितरण व्यवस्था को बेहतर करने की दिशा में शानदार काम किया। इस पर खुद नीति आयोग ने मुहर भी लगाई है। यूपी में 23 अप्रैल को ‘आक्सीजन मानीटरिंग सिस्टम फार यूपी’ का शुभारंभ हुआ। नतीजतन, मात्र 10 दिनों से प्रतिदिन एक हजार मीट्रिक टन आक्सीजन की रिकार्ड सप्लाई संभव हो सकी, जबकि चंद दिनों पूर्व तक यह आपूर्ति मात्र 250 मीट्रिक टन थी। आक्सीजन की आपूर्ति के लिए आनलाइन मानीटरिंग सिस्टम लागू करने वाला उत्तर प्रदेश पहला राज्य था। डिजिटल प्लेटफार्म से खाद्य सुरक्षा व औषधि प्रशासन, चिकित्सा शिक्षा विभाग, चिकित्सा स्वास्थ्य व परिवार कल्याण विभाग, परिवहन तथा गृह विभाग को जोड़ा गया। गृह विभाग में बने विशेष कंट्रोल रूम में आक्सी क्रैकर डैश बोर्ड पर आक्सीजन टैंकर की लोकेशन, आक्सीजन की स्थिति व मांग को पल-पल मानीटर किया गया।आक्सीजन सप्लाई में लगे वाहनों की आनलाइन उपस्थिति को ट्रैक कर सबसे पास मौजूद वाहन को अस्पताल के लिए रवाना करने की व्यवस्था की गई, जिससे आक्सीजन की मांग को कम समय में पूरा किया जा सके। इस कामयाबी ने दूसरे राज्यों के लिए नया सबक भी तय किया। एक-एक बूंद ऑक्सीजन का इस्तेमाल मरीजों के उपयोगार्थ हो, यह सुनिश्चित किया गया तो ऑक्सीजन की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित कराने के लिए पश्चिम बंगाल, गुजरात, उड़ीसा, झारखंड, उत्तराखंड आदि राज्यों से ऑक्सीजन लाई गई। निःसन्देह इसमें भारत सरकार की ओर से भी विशेष सहयोग मिला। नीति आयोग ने यूपी की इस मॉडल की सराहना की है। यही नहीं, सात तकनीकी संस्थाओं से ऑक्सीजन खर्च की ऑडिट भी कराई गई, जिसके परिणामस्वरूप 10 फीसदी तक खपत कम हुई। ऑक्सीजन टैंकरों के अभाव को दूर करने के लिए ऑर्गन के टैंकरों को तकनीकी सहयोग से ऑक्सिजन के उपयोगार्थ परिवर्तित किया गया।

07- “टेबल से ग्राउंड लेवल तक ” एक्टिव रहे सीएम योगी

कोरोना महामारी के बीच सीएम योगी आदित्यनाथ हमेशा ही फ्रंटलाइन में मौजूद रहे। आमजन की स्वास्थ्य सुरक्षा और आजीविका प्रबंधन को लेकर उत्तर प्रदेश के वर्तमान नेतृत्व ने जिस तत्परता और प्रतिबद्धता से कार्य किया, उसने आलोचकों भी प्रभावित किया है। कोरोना की दूसरी लहर को परास्त करने के लिए मुख्यमंत्री ने जिस दृढ़ इच्छाशक्ति, प्रतिबद्धता और दूरदर्शिता का परिचय दिया है, वह दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्रियों के लिए एक मानक है। 14 अप्रैल को मुख्यमंत्री के कोरोना संक्रमित होने की पुष्टि हुई। डॉक्टरों ने उन्हें आराम करने और एकांतवास का परामर्श दिया। तमाम अधिकारियों ने भी मुख्यमंत्री को सेहत के दृष्टिगत कुछ दिन स्वास्थ्य लाभ करने की अपील की लेकिन ‘कर्म योगी’ ने आराम स्वीकार नहीं किया। और, कोविड प्रोटोकॉल का कारण होम आइसोलेशन में रहने का निर्णय लिया। लेकिन काम बदस्तूर जारी रहा। होम आइसोलेशन में रहते हुए उन्होंने रोजाना न सिर्फ अफसरों के साथ समीक्षा बैठक की, बल्कि कृषक, स्वास्थ्य विशेषज्ञों, खिलाड़ियों और निगरानी समिति के सदस्यों सहित समाज के विभिन्न तबकों के साथ वर्चुअली संवाद कार्यक्रम भी जारी रखा। 30 अप्रैल को रिपोर्ट निगेटिव आने के तुरंत बाद वह ग्राउंड जीरो पर उतर गए और लखनऊ में अवध शिल्प ग्राम में डीआरडीओ की ओर से तैयार किए जाने वाले डेडिकेटेड कोविड अस्पताल की प्रगति का निरीक्षण किया था। ट्रेस, टेस्ट और ट्रीट (ट्रिपल टी) के फार्मूले के साथ कोरोना की रोकथाम में जुटे मुख्यमंत्री योगी ने जिलों में भ्रमण कर न केवल अधिकारियों से स्थिति का जायजा लिया, बल्कि उन्होंने अस्पतालों में जाकर सीधे मरीजों से उनका हालचाल पूछा और गांवों में पहुंचकर आमजन से संवाद कर उनका सुख-दुःख भी पूछा। यह नहीं, सीएम योगी पहले ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने कोरोना संक्रमित लोगों के घर पर दस्तक दी, उनकी सेहत का हाल-चाल लिया, उन्हें मिल रही सुविधाओं और उनकी जरूरतों के बारे में जानकारी ली। 26 दिन के निरंतर दौरे के जरिए सीएम ने स्वास्थ्यकर्मियों, पुलिसकर्मियों, आशा कार्यकत्रियों, आंगनबाड़ी बहनों से भेंट कर उनकी कार्यशैली की सराहना की और उन्हें प्रोत्साहित कर कोरोना के खिलाफ जंग जीतने के लिए उनमें नई ऊर्जा का संचार किया। साथ ही, इंटीग्रेटेड कोविड कमांड सेंटरों में औचक निरीक्षण कर व्यवस्थाओं की हकीकत जानी और आवश्यक दिशा-निर्देश दिए।

08- निगरानी समितियां: माइक्रो मैनेजमेंट का शानदार प्रयास

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की दूरदर्शी रणनीति के कारण प्रदेश में बढ़ते कोरोना संक्रमण पर लगाम लग सकी है। रणनीति का अहम हिस्सा रहीं निगरानी समितियों और आरआर टीम की जितनी सराहना की जाए कम है। यह दो ऐसे संगठन हैं, जिन्होंने शहरों से लेकर दूरदराज के गांवों तक माइक्रो लेवल पर स्थिति नियंत्रित रखने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सीएम योगी ने कोरोना की दूसरी लहर से पहले ही शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अलग-अलग निगरानी समितियों और रैपिड रेस्पॉन्स टीमों का गठन किया था और डोर टू डोर स्क्रीनिंग की रणनीति बनाई थी। 73,441 निगरानी समितियों के चार लाख सदस्यों और 7,761 रैपिड रिस्पॉन्स करने वाली प्रशिक्षित टीमों के सहयोग से कोरोना की चेन तोड़ने के लिए निर्णयक प्रयास हुआ। यह समितियां घर-घर जाकर स्क्रीनिंग करती थीं। लोगों के टेस्ट कराती थीं। गांव में बाहर से आने वालों पर नजर रखती थीं। उनकी टेस्टिंग, मेडिकल किट देने और क्वारन्टीन करने में इनकी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही। ग्राम/शहरी वार्डो के लोगों को ही इसमें रखां गया। बहुत से लोगों ने स्वयंसेवा भाव से इसमें सहभागिता की।

CM Yogi Safai

09- कोविड प्रबंधन की रीढ़: इंटोग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर

मुख्यमंत्री योगी ने इस एकीकृत व्यवस्था को कोविड प्रबंधन की रीढ़ कहा है। हर जिले में ऐसे कंट्रोल सेंटर स्थापित कराए गए हैं। 24×7 सक्रिय रहने वाला इस सेंटर से सभी गतिविधियों को अंजाम दिया जाता था। किसी को टेस्ट कराना हो, अस्पताल में एडमिट होना हो, होम आइसोलेशन में दवा या कोई और जरूरत हो, मरीज को एम्बुलेंस चाहिए या फिर एडमिशन और डिस्चार्ज के समय को कोविड पोर्टल पर सूचनाओं को अपडेट करना हो अथवा, सर्विलांस और निगरानी टीमों की मॉनीटरिंग, सब कुछ यहां से ऑपरेट होता रहा। कुशल और प्रशिक्षित कार्मिक इस सेंटर में तैनात किए गए। हर दिन जिले के शीर्ष अधिकारियों की बैठक यही होती रही।

yOGI aDITYANATH aLIGARH

10- टीम-11/टीम-09: व्यवस्था का विकेंद्रीकरण- जिम्मेदारी और जवाबदेही

कोविड की लड़ाई को व्यवस्थित बनाने में सीएम ने व्यवस्था के विकेंद्रीकरण की नीति अपनाई। शीर्ष अधिकारियों की जिम्मेदारियां तय की गईं और हर जवाबदेही भी सुनिश्चित हुई। कोविड की पहली लहर में जबकि प्रवासी श्रमिकों के व्यवस्थापन, पीपीई किट की उपलब्धता सुनिश्चित कराने जैसी चुनौतियां थीं, तब शानदार नियोजन के लिए योगी की टीम-11 खासी सुर्खियों में थी। वहीं दूसरी लहर में सीएम ने 09 सदस्यीय टीम बनाई। यह टीम राज्य स्तर पर कोविड प्रबंधन से जुड़े कार्यों को देखती है। नीतिगत निर्णय लेती है और उसे लागू कराती है। दूसरी लहर में बेड और ऑक्सीजन की व्यवस्था सबसे बड़ी चुनौती थी। तब इस टीम-09 ने शानदार ढंग से नियोजन किया। टीम-09 सीधे मुख्यमंत्री को रिपोर्ट करती है। कोविड बेड्स, मानव संसाधन की उपलब्धता, प्रशिक्षण और टीकाकरण से जुड़े कार्य,मेडिकल किट, टेस्टिंग और स्वास्थ्य सुविधाओं की बढ़ोतरी से जुड़े कार्य,आइसीसीसी और सीएम हेल्पलाइन की मॉनिटरिंग, ऑक्सीजन की सुचारु उपलब्धता, स्वच्छता, फॉगिंग, सैनिटाइजेशन, कंटेन्मेंट ज़ोन, लॉ एंड ऑर्डर, साप्ताहिक बन्दी,कोविड प्रोटोकॉल का अनुपालन सहित हर काम इन सदस्यों के बीच बंटा था। इस व्यवस्था के सकारात्मक परिणाम भी मिले। फिर इसी तर्ज पर जिलों में भी टीम गठित की गई।

Yogi Adityanath DRDO Covid Hosital

11- सभी वर्गों से सतत संवाद-विमर्श

कोविड की पहली लहर में यूपी की सुरक्षा सुनिश्चित हो पाने के लिए वैश्विक मंच पर सराहे गए मुख्यमंत्री ने सफलता का श्रेय टीम वर्क को दिया था। इस बार दूसरी लहर में भी उन्होंने सभी वर्गों से सतत संवाद बनाये रखा। सबकी राय ली और फिर जरूरत के अनुसार उसे रणनीति के हिस्सा बनाया। अप्रैल में कोरोना का संक्रमण बढ़ने से पहले ही मुख्यमंत्री योगी ने सर्वदलीय बैठक बुलाई और सभी दलों से चर्चा की। इस दौरान विपक्ष के कई नेताओं ने सीएम योगी की सराहना भी की। सीएम योगी ने लोगों को महामारी से जागरूक करने के लिए मंत्रिमंडल के सहयोगियों, जनप्रतिनिधियों, नगर निकायों के जनप्रतिनिधियों, चिकित्सा क्षेत्र के विशेषज्ञों, धर्म गुरुओं, व्यापारियों, खिलाड़ियों और किसानों आदि से संवाद किया।

12- माइक्रो मैनेजमेंट: सेक्टर मैजिस्ट्रेट-समस्या का त्वरित समाधान

कोविड आपदा के बीच व्यवस्था सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिलों से लेकर न्याय पंचायत स्तर तक सेक्टर प्रणाली लागू की। आमतौर पर चुनावों अथवा दंगों के काल में शांति व्यवस्था बनाये रखने के लिए ऐसी प्रणाली अमल में लाई जाती है। लेकिन यूपी मॉडल में इसे महामारी काल में लागू कर माइक्रो मैनेजमेंट का शानदार प्रयास किया गया। जिलों को सेक्टर में बांटा गया और फिर प्रत्येक सेक्टर हेतु प्रभारी मजिस्ट्रेट नियुक्त किया जाए, जो अपने सेक्टर के कोविड चिकित्सालयों तथा उसके आसपास के क्षेत्र का भ्रमण करते हुए वहां किसी कोविड मरीज की मौजूदगी होने की स्थिति में तकाल उसे अस्पताल में भर्ती कराते हुए उसके इलाज की व्यवस्था सुनिश्चित करते थे। यह नहीं, कोविड मरीजों की समस्याओं के लिए जिलाधिकारी और मुख्य चिकित्सा अधिकारी की जवाबदेही तय की गई। इस प्रयोग को हर ओर सराहना भी हुई।

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13- होम आइसोलेशन के मरीजों का पूरा ध्यान

कोविड से संक्रमित ज्यादातर लोगों के उपचार के लिए होम आइसोलेशन को अधिक उपयोगी और सुविधाजनक होने के दृष्टिगत मुख्यमंत्री ने इन मरीजों की सुविधाओं का पूरा ध्यान रखा। होम आइसोलेशन में उपचार की अनुमति देने से पूर्व घर में पृथकवास कई स्थिति का आकलन किया गया और फिर उन्हें दवा की जरूरत हो या डॉक्टरी परामर्श की, सब कुछ महज एक फोन कॉल की दूरी पर था। आइसीसीसी में इस सुविधा के लिए अलग से फोन नम्बर जारी किये गए थे। तो मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1076 के माध्यम से लोगों को मिल रही इन सुविधाओं के संबंध में फीडबैक प्राप्त करते हुए सत्यापन कराया गया। कोविड मरीजों व अन्य गंभीर रोगों से ग्रस्त नॉन कोविड मरीजों में जब ऑक्सीजन की मांग बढ़ी तो इनके लिए ऑक्सीजन आपूर्ति की पृथक व्यवस्था भी की गई। हर जिले में एक रीफिलर केवल होम आइसोलेशम के मरीजों को आक्सीजन आपूर्ति के लिए तय किया गया। नतीजतन व्यवस्था सुचारू बनी रही।

14- पोस्ट कोविड समस्याओं का निःशुल्क इलाज

कोविड को हराकर स्वस्थ हुए कुछ लोगों में मानसिक व शारीरिक समस्या होने की सूचना मिलने पर मुख्यमंत्री की ओर से पोस्ट कोविड वार्ड जैसा अभिनव प्रयास किया गया। पोस्ट कोविड समस्याओं के त्वरित निदान के उद्देश्य से सभी 75 जिला अस्पतालों में पोस्ट कोविड हॉस्पिटल का संचालन किया जा रहा है। यहां मनोचिकित्सक, फिजियोथेरेपिस्ट की तैनाती की गई, ताकि आवश्यकतानुसार लोग इनसे परामर्श प्राप्त कर सकें। सरकार ने आदेश जारी कर इनके निःशुल्क इलाज की व्यवस्था भी की।

15- फील्ड में उतरे वरिष्ठ अधिकारी, व्यवस्था की हुई सतत निगरानी

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वैश्विक महामारी कोरोना से प्रदेश में व्यवस्था को और बेहतर करने की कोशिशों के क्रम में मुख्यमंत्री ने सचिव और इससे वरिष्ठ स्तर के प्रशासनिक अधिकरियों को फील्ड में उतार दिया। सभी 75 जनपदों में नोडल अधिकारियों की तैनाती हुई। पूरे प्रदेश में 59 अफसरों को 75 जिलों का नोडल अधिकारी बनाकर भेजा गया। इस लिस्ट में सीनियर आईएएस अफसरों को चयनित किया गया। इन नोडल अधिकारियों को अपने अपने जनपदों में रहकर कोविड-19 प्रबंधन की जिम्मेदारी निभाई।

16- स्वास्थ्य विशेषज्ञों की टीम ने दी कोविड से लड़ाई को मजबूती

प्रदेश में कोरोना के खिलाफ लड़ाई को मजबूत करने के लिए स्वास्थ्य विशेषज्ञों की टीम भी गठित की। एसजीपीजीआई, केजीएमयू, अटल बिहारी वाजपेयी, आरएमएल इंस्टिट्यूट जैसे प्रतिष्ठित चिकित्सा संसाधनों के डॉक्टर सलाहकार समिति में शामिल हैं। यह टीम कोविड पर प्रभावी नियंत्रण और आवश्यक रणनीति के लिए उपयोगी सिद्ध हो रही है।

17- तीसरी लहर के मद्देनजर प्रो-एक्टिव नीति: बॉम्बे हाईकोर्ट ने बताया नजीर

विशेषज्ञों द्वारा कोविड की तीसरी लहर आने और उसे बच्चों के लिए खतरनाक होने की आशंका को देखते हुए यूपी में प्रो-एक्टिव नीति के तहत बचाव और रोकथाम की तैयारियां शुरू कर दी गईं। इस मसले को लेकर सीएम की संवेदनशीलता इसी बात से समझी जा सकती है कि सभी 18 मंडलों में कोरोना की रोकथाम की स्थिति के आकलन का मैराथन कार्यक्रम पूरा करने के साथ ही सीएम योगी ने गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर सिद्धार्थ नगर और बस्ती जैसे इंसेफेलाइटिस से अति प्रभावित जिलों में तैयारियों की पड़ताल शुरू कर दी। दिमागी बुखार से बच्चों की अकाल मौत रोकने के लिए योगी ने मार्च 2017 में यूपी की सत्ता संभालते ही युद्ध स्तर पर प्रयास शुरू कर दिए थे। पीएचसी (प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र) और सीएचसी (सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र) तक इंसेफेलाइटिस को केंद्र में रखकर स्वास्थ्य सुविधाओं की बुनियादी संरचना को मजबूत किया गया। पूर्वांचल के तीन दर्जन से अधिक संवेदनशील जिलों में रोकथाम को लेकर सफाई और स्वच्छता को लेकर जागरूकता अभियान चलाया गया, उससे इंसेफेलाइटिस तकरीबन खत्म होने के कगार पर है। अब इंसेफेलाइटिस उन्मूलन के ये अनुभव योगी सरकार कोराना से बच्चों को बचाने में उपयोग कर रही है। इंसेफेलाइटिस नियंत्रण में बड़ी भूमिका निभाने वाले पीकू (पीडियाट्रिक्स इंटेंसिव केयर यूनिट) प्रोजेक्ट को पूरे प्रदेश में कोरोना से बच्चों को बचाने के लिए लागू किया गया है। सीएम के आदेश के बाद प्रदेश के सभी मेडिकल कॉलेजों में बच्चों के लिए 100 बेड का आईसीयू तैयार किया जा रहा है तो जिला अस्पतालों और सीएचसी में मिनी पीकू बनाये जा रहे हैं। 20 जून तक ऐसे पीकू प्रदेश में तैयार हो जाएंगे। इसके साथ ही तय समय में जरूरी और दक्ष मानव संसाधन का बंदोबस्त कर उनकी ट्रेनिंग का काम भी जोरों पर है। बॉम्बे हाइकोर्ट ने इस प्रयास को अन्य राज्यों के लिए अनुकरणीय कह कर सरकार की नीति की प्रशंसा की।

Yogi Adityanath

18- जीविका और सामाजिक सुरक्षा: 15 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन, 01 करोड़ को भरण-पोषण भत्ता

कोरोना महामारी में लोगों के जीवन को सुरक्षित रखने के प्रयासों के साथ-साथ सभी की जीविका और सामाजिक सुरक्षा भी संरक्षित करने के प्रयास हुए। कोविड की पहली लहर की तर्ज पर योगी सरकार, दूसरी लहर में भी गरीबों, असहायों और श्रमिकों की मदद के लिए आगे आई। राज्य सरकार ने समाज के अंतिम पायदान पर खड़े लोगों के भरण-पोषण के लिए राशन और वित्तीय सहायता प्रदान कर रही है। इसके तहत, शहरी क्षेत्रों में दैनिक रूप से कार्य कर अपना जीविकोपार्जन करने वाले ठेला, खोमचा, रेहड़ी, खोखा आदि लगाने वाले पटरी दुकानदारों, दिहाड़ी मजदूरों, रिक्शा/ई-रिक्शा चालक, पल्लेदार सहित नाविकों, नाई, धोबी, मोची, हलवाई आदि जैसे परम्परागत कामगारों को एक माह के लिए 1,000 का भरण-पोषण भत्ता प्रदान किया जाएगा। आपदाकाल में यह उनके लिए बड़ा संबल होगा। इससे लगभग 01 करोड़ गरीबों को राहत मिलेगी। इसी तरह, कोविड-19 से उत्पन्न परिस्थितियों में गरीबों और जरूरतमन्दों को राहत पहुंचाने के लिए राज्य सरकार द्वारा अन्त्योदय एवं पात्र गृहस्थी श्रेणी के राशनकार्ड धारकों को 03 माह के लिए प्रति यूनिट 03 किलो गेहूं तथा 02 किलो चावल निःशुल्क उपलब्ध कराया जाएगा। इस प्रकार, प्रति यूनिट 05 किलो निःशुल्क खाद्यान्न जरूरतमन्दों को मिलेगा। इससे प्रदेश की लगभग 15 करोड़ जनसंख्या लाभान्वित होगी। यह राशन केंद्र सरकार द्वारा घोषित निःशुल्क राशन के अतिरिक्त होगा।

19- अनाथ बच्चों को ‘उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री बाल सेवा योजना’ का संबल

कोरोना की विभीषिका में अनाथ हुए बच्चों को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर से बड़ा सहारा मिला। राज्य सरकार द्वारा ऐसे सभी बच्चों के लालन-पालन, शिक्षा-दीक्षा सहित विकास के सभी संसाधन उपलब्ध कराने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ‘उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री बाल सेवा योजना’ शुरू करने की घोषणा की है। योजनांतर्गत, ऐसे बच्चे जिन्होंने कोविड-19 के कारण अपने माता-पिता अथवा यदि उनमें से एक ही जीवित थे, तो उन्हें अथवा विधिक अभिभावक को खो दिया हो और जो अनाथ हो गए हों तो राज्य सरकार द्वारा उनकी समुचित देखभाल की जाएगी। बच्चे के वयस्क होने तक उनके अभिभावक अथवा देखभाल करने वाले को 4,000 प्रति माह की वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी। यही नहीं, स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को टैबलेट अथवा लैपटॉप दिया जाएगा तो सरकार बालिकाओं के विवाह की समुचित व्यवस्था भी करेगी। बालिकाओं की शादी के लिए राज्य सरकार द्वारा 1,01,000 की राशि दी जाएगी।

20- आपदाकाल में सुविधाजनक रहा टेलीकन्सल्टेशन-ई परामर्श

कोरोना काल में होम आइसोलेशन में रहकर इलाज कराने वाले मरीज हों, अथवा नॉन कोविड पेशेंट, सरकार ने सभी को प्रॉपर मेडिकल कंसल्टेशन उपलब्ध कराया। एक ओर जहां स्वास्थ्य विभाग के ई-संजीवनी एप के माध्यम से डॉक्टरों से परामर्श लेने में देश में उत्तर प्रदेश दूसरे पायदान पर रहा वहीं, इंटेग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर में इसके लिए अलग से फोन लाइन जारी की गई। खुद मुख्यमंत्री ने चिकित्सकों से इस कार्य में सहयोग के लिए अपील की। सरकारी के साथ-साथ निजी अस्पतालों की ओर से भी ऐसी सेवाएं संचालित की गईं।

21-सुबह, स्वच्छता, दोपहर सैनीटाइजेशन, शाम को फॉगिंग

कोरोना हो अथवा जलजनित और विषाणु जनित बीमारियां, बचाव के लिए स्वच्छता, सैनिटाइजेशन और फॉगिंग का बड़ा महत्व है। इंसेफेलाइटिस जैसी बीमारी से सफलतापूर्वक लड़ाई लड़ चुके मुख्यमंत्री योगी ने प्रदेशवासियों को ‘सुबह, स्वच्छता, दोपहर सैनीटाइजेशन, शाम को फॉगिंग’ का मंत्र दिया। कोरोना कर्फ्यू के समय तो नगर विकास और ग्राम्य विकास विभागों की ओर से इसे लेकर मुहिम चलाई गई। व्यापारियों, किसानों, निगरानी समितियों से संवाद करते समय मुख्यमंत्री ने इस कार्य में सहयोग का आह्वान किया, नतीजतन, स्वच्छता कार्य में आम आदमी की सक्रिय सहभागिता देखने को मिली। हर दिन टीम 09 की बैठक में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा इससे संबंधित गतिविधियों के बारे में अनिवार्य रूप से जानकारी ली जाती थी। महामारी की रोकथाम में गांव से लेकर शहरों तक में हुए इस विशेष प्रयास की बड़ी भूमिका है। अब बरसात के मौसम में जबकि इंसेफेलाइटिस, चिकनगुनिया, डेंगू आदि बीमारियों के प्रसार की आशंका है, ऐसे समय में स्वच्छता, सैनिटाइजेशन और फॉगिंग का कार्य और तेज किया जा रहा है।

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