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Bhediya Review: भेड़िया फिल्म जिसमें जरूरत के हिसाब से इमोशन गायब हैं लेकिन, फिल्म को “सुझाता है, अटखेलियां करना”

Bhediya Review: तमाम बातों में असफल होने के बाद, फिल्म मनोरंजन का साधन बनती है और आपको हंसाते हुए एक सामान्य फिल्म बनकर रह जाती है। जिस फिल्म को नया और विशिष्ट होना चाहिए, वो एक औसत दर्ज़े की फिल्म बन जाती है।

नई दिल्ली। काफी दिन से आप भेड़िया (Bhediya) की आवाज़ यूट्यूब (Youtube) में सुन रहे होंगे। अब उसकी आवाज़ सुनने और देखने का मौक़ा आ गया है। वरुण धवन (Varun Dhawan), कृति सेनन (Kriti Sanon), अभिषेक बनर्जी (Abhishek Banerjee), दीपक डोबरियाल (Deepak Dobriyal) और पालिन अभिनयकृत फिल्म भेड़िया सिनेमाघर में रिलीज़ हो गई है। इस फिल्म का इंतज़ार काफी समय से हो रहा था। लोग चर्चा कर रहे थे वरुण धवन की भेड़िया आनी है, और अब भेड़िया आ गई।

लग रहा था क्या, होगी भेड़िया की कहानी ? तमाम सवाल मन में कौंध रहे थे, फिर फिल्म का ट्रेलर लांच हुआ, गाने आए तमाम खबरें बनी और ये अंदाजा हो गया कि आखिर क्या है, भेड़िया फिल्म।

भेड़िया फिल्म का विषय समझ में आ गया पर कहानी क्या होगी, कैसी होगी, कैसे संवाद होंगे, कैसी एक्टिंग होगी ये सब जानने के लिए फिल्म देखनी पड़ेगी। इसलिए हमने ये फिल्म देख ली है और यहां आपको बिंदुवार बताएंगे कि फिल्म में क्या है और कैसा है ? यहां हम भेड़िया फिल्म का रिव्यू (Bhediya Review) करेंगे, जिसे लिखा है निरेन भट्ट ने, डायरेक्ट किया है अमर कौशिक ने और प्रोड्यूस दिनेश विजन ने किया है। मूविंग पिक्चर कम्पनी ने फिल्म के वीएफएक्स का काम किया है। फिल्म की सिनेमाटोग्राफी जिष्नु भट्टाचर्जी ने किया है| इसके अलावा फिल्म एडिट संयुक्ता कज़ा ने किया है। तो चलिए देर न करते हुए फिल्म भेड़िया के रिव्यू (Bhediya Review) पर बात करते हैं।

किरदारों की भूमिका

वरुण धवन ने फिल्म में भास्कर शर्मा का किरदार निभाया है। कृति सेनन ने डॉक्टर अनिका मित्तल का किरदार निभाया है। दीपक डोबरियाल, राजू मिश्रा के किरदार में हैं। अभिषेक बनर्जी ने गुड्डू गुप्ता का किरदार निभाया है। और पालिन ने जोमिन का किरदार निभाया है। बाकी अन्य किरदार अपनी-अपनी भूमिका में हैं।

कहानी क्या है

अरुणाचल प्रदेश के जगलों के बीच से सड़क बननी है। लेकिन अरुणाचल प्रदेश के जंगलों के बीच से सड़क को निकालना आसान काम नहीं हैं, क्योंकि वहां पर रहने वाला जनजातीय समाज इसके लिए राजी नहीं है। लेकिन पुराना डायलॉग है, जो काम जंगलों की बड़ी-बड़ी शाखाएं नहीं कर पाती हैं, वो जेब में रखी हरी पत्ती चुटकियों में कर देती है। भास्कर शर्मा, को हरी पत्तियों का लालच है और वो उसके लिए अपनी जान पर खेलने को तैयार है। भास्कर शर्मा कॉन्ट्रैक्ट को पूरा करने का जिम्मा लेता है और अपने भाई गुड्डू के साथ अरुणाचल प्रदेश पहुंच जाता है।

जहां उसे जोमिन नाम का स्थानीय लड़का मिलता है जो भास्कर के इस काम में उसकी मदद करता है। भास्कर,जोमिन और गुड्डू, राजू मिश्रा से मिलते हैं जो मुख्यतः नैनीताल के रहने वाले हैं पर अभी अरुणाचल प्रदेश पोस्टिंग है। अब भास्कर,जोमिन,राजू और गुड्डू अरुणाचल प्रदेश के बूढ़े,बड़ों और बच्चों को जंगल के बीच से सड़क निकालने के लालच देने में लग जाते हैं। लोग राजी नहीं होते हैं पर भास्कर कैसे भी करके लोगों को राजी करना चाहता है। लेकिन इस अलग संस्कृति, अलग भाषा और अलग जलवायु वाले भारतीय राज्य में, कोई भी उनकी मानने को तैयार नहीं होता है।

जब ये चारों इसी में लगे होते हैं तभी एक जादुई रात को, जंगल से गुजरते वक़्त भास्कर को एक भेड़िया काट लेता है। राजू और जोमिन, भास्कर को डॉक्टर अनिका मित्तल के पास ले जाते हैं। लेकिन इस मर्ज की कोई दवा नहीं है इसलिए अनिका, भास्कर को, दर्द की दवा देती रहती है। भास्कर में, भेड़िया की सभी ताकत और आदत प्रवेश कर जाती हैं। अब ये भेड़िया एक-एक करके उन सभी लोगों को खाने लगता है, जो जंगल के बीच से सड़क बनाने का प्रयास करते हैं। कई लोग मरते हैं, गांव और पुलिस में हलचल मच जाती है, लेकिन भास्कर अभी भी जंगल के बीच से सड़क निकालने की बात पर अड़ा रहता है।

हलचल ज्यादा मचने के बाद गुड्डू के दिमाग में भी हलचल मचती है और तब उसे पता चलता है कि उसका भाई भास्कर इच्छाधारी भेड़िया हो गया है। भास्कर सुबह सामान्य इंसान होता है, और रात को भेड़िया। धीरे-धीरे अब भास्कर के इस मर्ज़ की दवा ढूंढने की कोशिश होती है और तब पता चलता है कि भास्कर का इलाज़ वहीं हैं जहां उसे जख्म मिला था। तो क्या अब भास्कर का मर्ज़ सही हो पाएगा ? क्या जंगल के बीच से सड़क निकल पाएगी ? भास्कर किस कारण से इच्छाधारी भेड़िया बना, इस तरह के तमाम सवाल का जवाब, फिल्म देखने पर ही पता चल पाएगा।

कैसी है फिल्म

अगर आप अभिषेक बनर्जी की कॉमेडी टाइमिंग का फैन हैं तो आपको ये फिल्म देखनी चाहिए। अगर आप हल्के हॉरर पर डरते और आजकल की मीम बेस्ड कॉमेडी पर हंसते हैं, तो आप ये फिल्म देख सकते हैं। अगर आपको भारत में बनी  विसुअल इफ़ेक्ट की फिल्म देखना पसंद है, तो भी आप फिल्म को देख सकते हैं बाकी फिल्म में अच्छा बुरा क्या है बिंदुवार जान लीजिए।

जो बात आखिरी में कहनी चाहिए पहले कह देता हूं, फिल्म एंटरटेन करती है और ठीक ठाक संदेश के साथ खत्म होती है। लेकिन अफ़सोस वो संदेश दिलों में काबिज़ हो जाए ऐसा करने में फिल्म नाकाम रहती है।

फिल्म में कॉमेडी है, जो कुछ पॉइंट्स पर हंसाती है, वहीं एक जगह पर कॉमेडी के चक्कर में फिल्म बकवास/लीचड़ हो जाती है। जहां ऐसे दृश्य को दिखाने की कोशिश की गई है जो भारतीय सिनेमा पर कॉमेडी के नाम पर मलमूत्र फैला देती है।

शुरुआत में फिल्म कॉमेडी करते जाती है और देर तक अपने पॉइंट पर नहीं आती है। कॉमेडी के चक्कर में फिल्म से हॉरर और इमोशन गायब रहता है।

जैसे – जब वरुण को भेड़िया काट लेता है या अन्य जंगल के सीन, जहां पर फिल्म से दर्शक को इमोशनली जुड़ना चाहिए, फिल्म वहां कॉमेडी करती रहती है। इसके अलावा जहां दर्शक के दिल में डर पैदा होना चाहिए वहां भी कॉमेडी करती रहती है। जिस कारण से न दर्शक, फिल्म से इमोशनली जुड़ पाते हैं और न ही फिल्म देखते वक़्त हॉरर महसूस होता है। हां एंटरटेनमेंट के नाम पर कॉमेडी भरपेट, बुफे में तैयार लगी होती है। एक सवाल है, क्या अगर आपके भाई को भेड़िया काट ले और आपका भाई भेड़िया बनकर लोगों को खाने लग जाए तो आप और आपके भाई कॉमेडी करेंगे या फिर दर्द महसूस करेंगे ?

उपरोक्त कथन पर एक पॉइंट आ सकता है कि, फिल्म में एंटरटेनमेंट नहीं होगा तो कोई देखेगा नहीं। शत-प्रतिशत सही है। लेकिन ध्यान रखिए अगर एक कहानी में, उचित स्थान पर, उचित भाव नहीं होंगे, तो आपकी नौटंकी उतना असर नहीं करेगी, चाहे आप उसे कितना भी मनोरंजन का साधन कह लें। इस फिल्म में मनोरंजन तो है, लेकिन उचित जगह से, फिल्म से जोड़ने वाले और फिल्म को याद रखने वाले, भाव (Emotion) गायब हैं।

फिल्म काफी देर तक हीरो को विलेन के किरदार में ही दिखाती रहती है और कहीं भी वो हीरोइक स्टाइल देखने को नहीं मिलती है। अंत में हीरोइक स्टाइल देखने को मिलती है, लेकिन भेड़िया की, वरुण धवन की नहीं। इस हिसाब से फिल्म में कॉमेडियन वरुण थे, विलेन वरुण थे, लेकिन हीरो “भेड़िया” था।

कुछ जगह फिल्म आपको हिट करती है आपको लगता है फिल्म सही रास्ते पर है, लेकिन तभी तेज़ रफ्तार में आई कॉमेडी रास्ते को कुचल कर, निकल जाती है। दर्शक के हाथ न अच्छी कॉमेडी लगती है और न अच्छा दृश्य।

फिल्म में जगह जगह पर लूप होल्स हैं। जिन्हें खुला छोड़ दिया गया है।

लास्ट का क्लाईमैक्स को अच्छा कह सकते हैं| लेकिन व्यक्तिगत रूप से कहें, तो फिल्म के क्लाइमैक्स में आरआरआर और कांतारा की झलक देखने को मिलती है। फिल्म स्त्री जैसी कॉमेडी से भरी हुई और ऊपर से कांतारा और आरआरआर के क्लाइमैक्स से सजाई हुई लगती है।

कुल मिलाकर अगर फिल्म के लेखन की बात करें तो वो बहुत कमजोर लगता है। फिल्म का विषय अच्छा है लेकिन उचित ढंग से कहा नहीं गया है, क्योंकि फिर दोहरा दूं, सिनेमा सिर्फ एक भाव (Emotion) डालने से नहीं बनता है।

फिल्म का डायरेक्शन और छायांकन अच्छा है, लेकिन वीएफएक्स का काम, न उतना फिल्म में है और न काम का है। जो सीन भयभीत कर सकते थे वहां वीएफएक्स नाकाम रहता है। बाकी जो सीन डायरेक्शन में दिखाए गए वो पहले तमाम हॉलीवुड फिल्म में दिखाए जा चुके हैं, तो वीएफएक्स और विसुअल पर, फिल्म कुछ नया अनुभव नहीं देती है।

फिल्म में संगीत का प्रयोग अनुचित जगह पर है। जो गाने रिलीज़ के बाद अच्छे लग रहे थे, फिल्म में उनका प्रयोग अच्छा नहीं है। फिल्म का बैकग्राउंड म्यूसिक, हॉरर और मूड सेट करने में असफल होता है।

अभिषेक बनर्जी की एक्टिंग उनकी फिल्मों की तरह एक जैसी ही है। वरुण और कृति ठीक दिखें हैं। दीपक डोबरियाल ने कहीं पर अच्छा, तो कहीं औसत दर्ज़े का काम किया है और पालिन ने अपने किरदार को ठीक ढंग से निभाया है। बाकी अरुणाचल के सभी कलाकारों के लिए तालियां बनती हैं।

तमाम बातों में असफल होने के बाद, फिल्म मनोरंजन का साधन बनती है और आपको हंसाते हुए एक सामान्य फिल्म बनकर रह जाती है। जिस फिल्म को नया और विशिष्ट होना चाहिए, वो एक औसत दर्ज़े की फिल्म बन जाती है।

फिल्म के संवाद गंदे हैं। गंदे मतलब, जिन्हें साथ ले जाने का भी, दिल नहीं करता है।

फिल्म के संवाद आपके सामने हैं तय करिए अच्छे हैं या गंदे

“ये कुत्ते मुझे फूफाजी कहकर बुलाते हैं”

“मोबाइल की तरह बदलकर अचानक भेड़िया बन जाता है”

                     “फिल्म को मेरी तरफ से मात्र 3 स्टार, वो भी इसलिए क्योंकि फिल्म, एंटरटेन करती है।”