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BAPS Bhadreshdas Swami Honoured With ‘Saraswati Award’ : बीएपीएस के साधु भद्रेशदास स्वामी प्रतिष्ठित ‘सरस्वती पुरस्कार’ से सम्मानित

BAPS Bhadreshdas Swami Honoured With ‘Saraswati Award’ : 2022 में प्रकाशित भद्रेशदास स्वामी की महत्वपूर्ण साहित्य कृति ‘स्वामीनारायण सिद्धांत सुधा’ के लिए उन्हें सरस्वती सम्मान 2024 से सम्मानित किया गया है। सरस्वती सम्मान की शुरुआत के.के. बिरला फाउंडेशन के द्वारा वर्ष 1991 में की गई थी। इस पुरस्कार से सम्मानित होने वाले विशिष्ट जनों को प्रशस्ति पत्र और प्रतीक चिन्ह के साथ 15 लाख रुपए की राशि भी प्रदान की जाती है।

नई दिल्ली। बीएपीएस के साधु महामहोपाध्याय भद्रेशदास स्वामी को प्रतिष्ठित ‘सरस्वती पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया है। 2022 में प्रकाशित भद्रेशदास स्वामी की महत्वपूर्ण साहित्य कृति ‘स्वामीनारायण सिद्धांत सुधा’ के लिए उन्हें सरस्वती सम्मान 2024 से सम्मानित किया गया है। सरस्वती सम्मान की शुरुआत के.के. बिरला फाउंडेशन के द्वारा वर्ष 1991 में की गई थी। इस पुरस्कार से सम्मानित होने वाले विशिष्ट जनों को प्रशस्ति पत्र और प्रतीक चिन्ह के साथ 15 लाख रुपए की राशि भी प्रदान की जाती है।

डॉक्टर ऑफ साइंस जैसी मानद उपाधि से सुशोभित हैं भद्रेशदास स्वामी

भद्रेशदास जी का जन्म 12 दिसंबर 1966 को महाराष्ट्र के नांदेड़ में हुआ था। बोचनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था (बीएपीएस) के साधु भद्रेशदास संस्कृत भाषा के अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान हैं।  उनके पास एम.ए., पी.एच.डी., डी.लिट. जैसी डिग्रियों के साथ वो आईआईटी खड़गपुर द्वारा डॉक्टर ऑफ साइंस की मानद उपाधि से भी सुशोभित हैं। वर्तमान में वे बीएपीएस स्वामीनारायण शोध संस्थान के अध्यक्ष के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

भद्रेशदास स्वामी को देश-विदेश में मिल चुके हैं कई प्रतिष्ठित पुरस्कार

भद्रेशदास स्वामी की विद्वता और योगदान को भारतीय दर्शन में अति महत्वपूर्ण माना जाता है। आधुनिक युग में भारत की पारम्परिक वैदिक ज्ञान प्रणाली के संरक्षण एवं संवर्धन में उनका विशेष योगदान है। उनकी अनुपम विद्वत्ता के लिए ही उन्हें ‘महामहोपाध्याय’, ‘भाष्य-रत्नाकर’ जैसी उपाधियों से भी अलंकृत किया गया है। भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद (आईसीपीआर) द्वारा भद्रेशदास जी को लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से भी सम्मानित किया गया है। इसके अलावा थाईलैंड की सिल्पाकोर्न यूनिवर्सिटी ने उन्हें ‘वेदांत मार्तंड पुरस्कार’ से सम्मानित किया है।

‘स्वामीनारायण सिद्धांत सुधा’ कृति के बारे में

महामहोपाध्याय स्वामी भद्रेशदास की कृति ‘स्वामीनारायण सिद्धांत सुधा’ अक्षर पुरुषोत्तम दर्शन की संपूर्ण दार्शनिक दृष्टि को सरल, तर्कसंगत और गहन रूप से प्रस्तुत करती है। यह ग्रंथ इस तथ्य को रेखांकित करता है कि भारत में दार्शनिक अवधारणों की परम्परा केवल इतिहास की बात नहीं है बल्कि आज भी नए दार्शनिक आविष्कारों को जन्म देने वाली जीवंत परम्परा है। इस ग्रंथ के अध्ययन से संस्कृत भाषा की विश्वजयी सामर्थ्य को समझा जा सकता है। विद्वानों के अनुसार इस ग्रंथ की भाषा अत्यंत तर्कपूर्ण होते हुए भी मधुर और सरस है। दार्शनिक सिद्धांतों को व्याख्यायित करने में संस्कृत भाषा में जो शक्ति निहित है, उस शक्ति का निदर्शन इस ग्रंथ में विद्यमान है।

सरस्वती सम्मान चयन परिषद

सरस्वती सम्मान चयन परिषद की बैठक सेवानिवृत्त न्यायाधीश अर्जुन कुमार सीकरी की अध्यक्षता में संपन्न हुई जिसमें स्वामी भद्रेशदास को सम्मानित करने का निर्णय लिया गया। चयन परिषद के अन्य सदस्यों में प्रो. रामदेव शुक्ल, डा. बुद्धिनाथ मिश्र, डा. किरण बुदकुले, डा. सी. मृणालिनी, प्रो. कालीदास मिश्र, प्रो. ललित मंगोत्रा, श्री मालन नारायणन, प्रो. मिलिन्द गोविन्दराव जोशी, डा. मानबेन्द्र मुखोपाध्याय, विजय वर्मा, प्रियव्रत भरतिया और डा. सुरेश ऋतुपर्ण शामिल हैं।

हरिवंश राय बच्चन को मिला था सबसे पहला सरस्वती सम्मान

सरस्वती सम्मान भारत के संविधान की अनुसूची VIII में सूचीबद्ध भारत की 22 भाषाओं में से किसी में उत्कृष्ट गद्य या पद्य साहित्यिक कार्यों के लिए एक वार्षिक पुरस्कार है। सरस्वती सम्मान हर साल किसी भारतीय नागरिक को उसकी ऐसी साहित्यिक कृति के लिए दिया जाता है, जो भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित किसी भी भारतीय भाषा में सम्मान वर्ष से ठीक पहले 10 साल की अवधि में प्रकाशित हुई हो। 1991 में हरिवंश राय बच्चन को सबसे पहले सरस्वती पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।