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Rahul Gandhi Disqualified: अगर आज से 10 साल पहले राहुल ने नहीं फाड़ा होता ‘वो अध्यादेश’, तो बच जाती उनकी सदस्यता ? जानें कैसे

Rahul Gandhi Disqualified: दरअसल, जनप्रतिनिधित्व कानून के मुताबिक, जब कोई सांसद या विधायक किसी मामले में कोर्ट द्वारा दोषी करार दिया जाता है, तो पहले उसकी सदस्यता रद्द होती है और इसके बाद 6 वर्षों तक उसके चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है, जिसे   तत्कालीन संप्रग सरकार ने अपने अध्यादेश के जरिए बदलने की कोशिश की थी।

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नई दिल्ली। राहुल गांधी की मुश्किलें थमने का नाम नहीं ले रही हैं। पहले उन्हें मोदी सरनेम मामले में सूरत कोर्ट ने दो साल की सजा सुनाई। इसके बाद अब उनकी संसद सदस्यता रद्द कर दी गई है। हालांकि, कांग्रेस ने इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत जाने की बात स्पष्ट कर दी है। अब ऐस में कोर्ट का फैसला क्या होता है। इस पर सभी की निगाहें टिकी रहेंगी, लेकिन आपको बता दें कि राहुल गांधी की सदस्यता खत्म होने के बाद राजनीतिक गलियारों में आज से 10 साल पहले की उस घटना की चर्चा हो रही है, जब राहुल ने आवेश में आकर प्रेस कांफ्रेंस में एक अध्यादेश फाड़कर फेंक दिया था। हैरान करने वाली बात है कि यह अध्यादेश कोई और नहीं, बल्कि तत्कालीन संप्रग सरकार ही लेकर आई थी, लेकिन इसके बावजूद भी राहुल ने इसकी मुखालफत की थी। वहीं, विपक्षियों ने उनके इस कृत्य की खूब आलोचना की थी।

बता दें कि दिल्ली में कांग्रेस नेता अजय माकन प्रेस कांफ्रेंस कर रहे थे। प्रेस कांफ्रेंस में वे कांग्रेस सरकार द्वारा जारी किए गए अध्यादेश की खूबिया गिना रहे थे, तभी राहुल गांधी की प्रेस वार्ता में दस्तक होती है और वो उस अध्यादेश को फाड़ते हुए कहते हैं कि मुझे लगता है कि यह बिल्कुल बकवास है। खैर, ये तो रही पुरानी घटना, लेकिन अब सवाल यह है कि आखिर राहुल की सदस्यता रद्द होने के बाद आखिर इस पुराने प्रसंग की चर्चा अब क्यों की जा रही है? आइए, विस्तार से जानते हैं।

दरअसल, यह पूरा मसला 2013 का है, तब सुप्रीम कोर्ट ने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 18(4) को असंवैधानिक करार दिया था। इस प्रावधान के मुताबिक, आपराधिक मामले में दोषी करार दिए किसी भी जन प्रतिनिधि को  संसद से अयोग्य घोषित नहीं किया जा सकता है, अगर उसने ऊपरी अदालत में निचली अदालत के फैसले के खिलाफ याचिका दायर की है। यानी धारा 8(4) के तहत, किसी भी जनप्रतिनिधि को अपील लंबित होने के दौरान उसे पद पर बने रहने की छूट प्रदान की गई थी।

दरअसल, जनप्रतिनिधित्व कानून के मुताबिक, जब कोई सांसद या विधायक किसी मामले में कोर्ट द्वारा दोषी करार दिया जाता है, तो पहले उसकी सदस्यता रद्द होती है और इसके बाद 6 वर्षों तक उसके चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है, जिसे तत्कालीन संप्रग सरकार ने अपने अध्यादेश के जरिए बदलने की कोशिश की थी, लेकिन राहुल ने ना महज इसका विरोध किया था, बल्कि भरी सभा में इस अध्यादेश को फाड़कर फेंक दिया था, जिसके बाद विपक्षी दलों ने उनकी खूब आलोचना की थी। अब सवाल यह है कि अगर उस वक्त  यह अध्यादेश लागू कानून का रूप धारण कर लेता है, तो आज राहुल गांधी के साथ क्या होता ?

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आपको बता दें कि अगर उस वक्त अध्यादेश कानून की शक्ल अख्तियार कर लेता, तो राहुल गांधी की सदस्यता बच जाती। हालांकि, अभी तक राहुल ने सूरत कोर्ट के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटाया है, लेकिन खटखटाते, तो उस अध्यादेश के मुताबिक, उनकी सदस्यता बच सकती थी, क्योंकि उस अध्यादेश में स्पष्ट प्रावधान था कि अगर दोषी करार दिया गया कोई राजनेता निचली अदालत के फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत का दरवाजा खटखटाया है, तो उसकी सदस्यता को भंग ना किया जाए। गौरतलब है कि बीते गुरुवार को सूरत कोर्ट ने मोदी सरनेम मामले में राहुल को दो साल की सजा सुनाई थी । जिसके बाद से ही उनकी संसद सदस्यता पर खतरे के बादल मंडरा रहे थे, जो कि अब हकीकत में तब्दील हो चुके हैं। उधर, कांग्रेस ने इस फैसले के खूब आलोचना की है। इसे मोदी सरकार का तानाशाही करार दिया है। कांग्रेस ने इस संदर्भ में आज शाम पांच बजे आपाताकालीन बैठक भी बुलाई है। अब ऐसे में पार्टी की तरफ से आगे क्या कुछ कदम उठाया जाते हैं। इस पर सभी की निगाहें टिकी रहेंगी।

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