अयोध्या में भूमि पूजन के लिए पहुंचकर पीएम मोदी वहां लगाएंगे पारिजात का पौधा, जानिए इसका पौराणिक महत्व

पांच अगस्त यानी बुधवार को होने वाले राम जन्मभूमि पूजन कार्यक्रम का पूरा देश इंतजार कर रहा है। इस कार्यक्रम के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 5 अगस्त को अयोध्या आएंगे और इस भूमि पूजन को संपन्न करेंगे।

Avatar Written by: August 4, 2020 5:22 pm

नई दिल्ली। पांच अगस्त यानी बुधवार को होने वाले राम जन्मभूमि पूजन कार्यक्रम का पूरा देश इंतजार कर रहा है। इस कार्यक्रम के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 5 अगस्त को अयोध्या आएंगे और इस भूमि पूजन को संपन्न करेंगे। इस दौरान पीएम मोदी श्रीराम जन्मभूमि परिसर में पारिजात का पौधा लगाएंगे। आखिर क्या है इस पौधे का महत्व और खासियत जिसकी वजह से इसे भूमि पूजन समारोह का हिस्सा बनाया जा रहा है।

Modi Ram Puja

आपको बता हैं इस दिव्य वृक्ष के बारे में-

पारिजात का पेड़ बहुत खूबसूरत होता है। पारिजात के फूल को भगवान हरि के श्रृंगार और पूजन में प्रयोग किया जाता है, इसलिए इस मनमोहक और सुगंधित पुष्प को हरसिंगार के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दू धर्म में इस वृक्ष का बहुत महत्व माना जाता है। ऐसी भी मान्यता है कि पारिजात को छूने मात्र से ही व्यक्ति की थकान मिट जाती है।

parijat tree

पारिजात का वृक्ष ऊंचाई में दस से पच्चीस फीट तक का होता है। इसके इस वृक्ष की एक खास बात ये भी है कि इसमें बहुत बड़ी मात्रा में फूल लगते हैं। एक दिन में इसके कितने भी फूल तोड़े जाएं, अगले दिन इस फिर बड़ी मात्रा में फूल खिल जाते हैं। यह वृक्ष खासतौर से मध्य भारत और हिमालय की नीची तराइयों में अधिक उगता है।

सबसे खास बात है कि ये फूल रात में ही खिलता है और सुबह होते ही इसके सारे फूल झड़ जाते हैं। इसलिए इसे रात की रानी भी कहा जाता है। हरसिंगार का फूल पश्चिम बंगाल का राजकीय पुष्प भी है। दुनिया भर में इसकी सिर्फ पांच प्रजातियां पाई जाती हैं।

parijat tree

कहा जाता है कि धन की देवी लक्ष्मी को पारिजात के फूल अत्यंत प्रिय हैं। पूजा-पाठ के दौरान मां लक्ष्मी को ये फूल चढ़ाने से वो प्रसन्न होती हैं। खास बात ये है कि पूजा-पाठ में पारिजात के वे ही फूल इस्तेमाल किए जाते हैं जो वृक्ष से टूटकर गिर जाते हैं। पूजा के लिए इस वृक्ष से फूल तोड़ना पूरी तरह से निषिद्ध है। एक मान्यता ये भी है क‍ि 14 साल के वनवास के दौरान सीता माता हर‍सिंगार के फूलों से ही अपना श्रृंगार करती थीं।