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ज्योतिष

Rajasthan: सालासर बालाजी प्रकाट्य उत्सव पर हुई मंदिर की भव्य सजावट, दूर-दूर से दर्शन करने पहुंचे श्रद्धालु

Rajasthan: देश भर में बाला जी का ये एकमात्र मंदिर है, जिसमे बालाजी के चेहरे पर दाढ़ी और मूँछ है।मंदिर में होने वाले मेलों व अन्य आयोजनों का प्रबंधन हनुमान सेवा समिति द्वारा किया जाता है। इस मंदिर की स्थापना के विषय में एक कथा प्रचलित है जो इस प्रकार है…

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नई दिल्ली। राजस्थान में स्थित श्री बालाजी महाराज सालासर धाम का प्रकाट्य उत्सव आज यानी 6 अगस्त 2022 को काफी धूमधाम से मनाया जा रहा है। ये मंदिर का 268 वां स्थापना दिवस है। श्रावण सुदी नवमी संवत 1811 (268वर्ष) पूर्व आज के ही पावन दिन पर सन्त शिरोमणि श्री मोहनदास जी की अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर श्री बालाजी महाराज सालासर धाम में विराजित(स्थापित) हुए थे। इस अवसर पर मंदिर को भव्य तरीके से सजाया गया है। श्री सालासर प्राकट्य उत्सव में शामिल होने के लिए दूर-दराज के इलाकों से लोग आ रहे हैं। राजस्थान के चुरू जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग 668 पर स्थित इस मंदिर में दर्शन करने के लिए श्रद्धालु अत्यंत उत्साहित हैं। वैसे तो यहां के बालाजी महाराज के दर्शन करने के लिए दर्शनार्थी पूरे साल आते रहते हैं, लेकिन चैत्र और आश्विन के महीने में इस मंदिर की छठा देखते ही बनती है। हर वर्ष चैत्र और आश्विन में माह में बड़े स्तर पर यहां मेलों का आयोजन किया जाता है। देश भर में बाला जी का ये एकमात्र मंदिर है, जिसमे बालाजी के चेहरे पर दाढ़ी और मूँछ है। स्थापना दिवस के मौके पर मंदिर की सजावट में फूलों और रोशनी का इस्तेमाल किया गया, जिससे पूरा मन्दिर दूधिया रोशनी से जगमगा रहा है। सजावट के लिए अजमेर और इंदौर से कारीगरों को बुलाया गया था। मन्दिर कमेटी के मांगीलाल पुजारी ने बताया कि ‘सम्वत 1811 श्रावण सुधि नवमी शनिवार के दिन बालाजी महाराज की मूर्ति की स्थापना हुई थी। इस बार नवमी के दिन शनिवार का संयोग बना है।और आज ही 6 अगस्त को 268वां स्थापना दिवस शनिवार को मनाया जा रहा है। रात्रि को मन्दिर परिसर में शेखावाटी के प्रसिद्ध बऊ धाम के सन्त रतिनाथ महाराज व पुजारी परिवार के सदस्यों द्वारा भजनों का कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। मंदिर में होने वाले मेलों व अन्य आयोजनों का प्रबंधन हनुमान सेवा समिति द्वारा किया जाता है। इस मंदिर की स्थापना के विषय में एक कथा प्रचलित है, जो इस प्रकार है…

श्रावण शुक्लपक्ष नवमी, संवत् 1811 में शनिवार के दिन नागौर जिले में असोटा नामक गाँव में एक गिन्थाला-जाट किसान अपने खेतों की जुताई कर रहा था। अचानक उसके हल से किसी चीज के टकराने से टन्न की आवाज आई। किसान ने जब उस जगह की मिट्टी को खोद कर देखा तो मिट्टी में सनी हुई उसे दो मूर्त्तियाँ मिलीं। उसी समय उसकी पत्नी उसके लिए भोजन लेकर वहाँ पहुँची और मूर्ति को देख कर अपनी साड़ी से उसे साफ करके देखा तो ये बालाजी भगवान श्री हनुमान की मूर्ति थी। इसके बाद श्रद्धा से दोनों से उन्हें प्रणाम किया। भगवान बालाजी के प्रकट होने की खबर चारो ओर तेजी से फैल गई। ये बात असोटा के ठाकुर तक भी पहुंची। कहा जाता है कि बालाजी ने स्वयं उसके सपने में आकर उसे आदेश दिया कि इस प्रतिमा को चूरू के सालासर भेज दिया जाए। उसी रात श्री हनुमान के एक परम भक्त, सालासर के मोहन दासजी महाराज को भी बालाजी महाराज सपने में दिखाई दिए।

स्वप्न में ही उन्हें असोटा की मूर्त्ति के बारे पता चला। इसके बाद उन्होंने आसोटा के ठाकुर एक सन्देश के जरिए मूर्ति की बात बताई। ठाकुर ये जानकर हतप्रभ रह गए कि मोहन दास जी को ये बात कैसे पता चली। इसके बाद उन्होंने बिना विलम्ब उस मूर्त्ति को सालासर भेज दिया। यही जगह आज सालासर धाम के रूप में विख्यात है।

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