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Who was Tika Lal Taploo?: कश्मीर में इस्लामी आतंकियों ने ऐसे कुचली थी हिंदुओं की आवाज, सबसे पहले इस नेता को बनाया था शिकार

Who was Tika Lal Taploo?: फिल्म द कश्मीर फाइल्स रिलीज होने के बाद से लगातार चर्चा में बनी हुई है। हर कोई फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ की बात कर रहा है। फिल्म के रिलीज होने के बाद घाटी में हिंदुओं की निर्मम हत्याओं की अंतहीन कहानियाँ आपको पढ़ने को मिल रही होंगी। इस बीच आपने शायद कश्मीरी पंडित टीका लाल टपलू का नाम भी सुना हो।

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नई दिल्ली। कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार पर बनी मूवी ‘द कश्मीर फाइल्स’ इन दिनों सुर्ख़ियों में बनी हुई है। फिल्म ने कश्मीर से कश्मीरी पंडितों के पलायन और उनकी दर्द भरी कहानियों को ताजा कर दिया है। फिल्म रिलीज होने के बाद से लगातार चर्चा में बनी हुई है। हर कोई फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ की बात कर रहा है। फिल्म के रिलीज होने के बाद घाटी में हिंदुओं की निर्मम हत्याओं की अंतहीन कहानियाँ आपको पढ़ने को मिल रही होंगी। इस बीच आपने शायद कश्मीरी पंडित टीका लाल टपलू का नाम भी सुना हो। पेशे से वकील और भाजपा उपाध्यक्ष टीका लाल टपलू 90 के दशक में कश्मीरी पंडितों में सबसे जाना माना चेहरा थे। लोग उन्हें लालाजी यानी बड़ा भाई कहकर बुलाते थे।

पंडित टीका लाल टपलू उन कश्मीरी पंडितों में से एक थे जिनकी नरसंहार के दौरान हत्या कर दी गई थी। पंडित टीका लाल टपलू वो पहले शख्स थे जिन्हें इस्लामी आतंकियों ने निशाना बनाकर पूरे नरसंहार की शुरुआत की थी। भाजपा उपाध्यक्ष टीका लाल टपलू की हत्या को 14 सितंबर 1989 को अंजाम दिया गया। आतंकी लंबे समय से उन्हें मारने के लिए साजिशें रच रहे थे। कट्टरपंथियों से अपने परिवार को बचाने के लिए टीका लाल अपने परिवार को खुद से दूर दिल्ली छोड़ आए थे।

दिल्ली से वापस कश्मीर लौटे पंडित टीका लाल के घर आतंकियों ने 12 सितंबर 1989 को हमला कर दिया और 14 सिंतबर को उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया। 14 सिंतबर की सुबह टीका लाल के लिए बिल्कुल सामान्य थी। हालांकि वो कट्टरपंथियों के मंसूबों से पूरी तरह वाकिफ थे और जानते थे कि आतंकी उन पर कभी भी हमला कर सकते हैं। बावजूद इसके वह उस दिन अपने घर से बाहर निकल गए। कारण था उनके घर के बाहर एक बच्ची का तेज-तेज रोना। टपलू जैसी ही उस बच्ची के पास पहुंचे, तभी सामने से आए आतंकियों ने उन्हें गोलियों से भून दिया।

इस हत्या से आतंकियों के दो काम पूरे हुए थे। एक तो उनके रास्ते से टीका लाल हमेशा के लिए हट गए थे, जो कश्मीरी पंड़ितों में आतंकियों के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहे थे और दूसरा निजाम-ए-मुस्तफा का जो संदेश वो कश्मीरी पंडितों तक पहुंचाना चाहते थे वो हर पंडित के घर पहुंच गया था। इस एक हत्या से हालात इतने तनावपूर्ण हो गए थे कि लोगों ने अपने बच्चों को स्कूल भेजने से मना कर दिया था और कई दिन घरों में बंद रहे थे।

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