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Yogi Adityanath: योगी के मंत्रियों के संघर्ष की कहानी, कोई बेचता था अखबार, कोई था मजदूर, तो किसी की थी पंचर बनाने की दुकान

Yogi Adityanath: योगी मंत्रिमंडल में 50 मंत्री 18 कैबिनेट, 14 स्वतंत्र प्रभार और 20 राज्य मंत्री बनाए गए हैं, लेकिन क्या आप आज जिन्हें उत्तर प्रदेश के मंत्री के चेहरे के रुप में देख रहे हैं, उनकी जिदंगी से जुड़ी बातों से अवगत है या नहीं। बता दें कि इनमें से कई ऐसे चेहरे हैं, जिनकी जिंदगी से जुड़ी बातों को जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे, जी हां…मंत्री पद संभाल रहे इनमें कुछ ऐसे मंत्री भी शामिल हैं, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी संघर्ष किया है।

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नई दिल्ली। 2022 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर से योगी सरकार के सिर जीत का ताज सुसज्जित हो चूका है। योगी आदित्यनाथ लगातार दूसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद का पदभार संभाल चुके हैं। कई बड़ी चुनौतियों के बाद शुक्रवार को योगी आदित्यनाथ दूसरी बार सीएम पद पर काबिज हो चुके हैं। वहीं, केशव प्रसाद मौर्या और बृजेश पाठक को डिप्टी सीएम की जिम्मेदारी सौंपी गई है। योगी मंत्रिमंडल में 50 मंत्री 18 कैबिनेट, 14 स्वतंत्र प्रभार और 20 राज्य मंत्री बनाए गए हैं, लेकिन क्या आप आज जिन्हें उत्तर प्रदेश के मंत्री के चेहरे के रुप में देख रहे हैं, उनकी जिदंगी से जुड़ी बातों से अवगत है या नहीं।

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बता दें कि इनमें से कई ऐसे चेहरे हैं, जिनकी जिंदगी से जुड़ी बातों को जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे, जी हां…मंत्री पद संभाल रहे इनमें कुछ ऐसे मंत्री भी शामिल हैं, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी संघर्ष किया है। इन्हें अपने संघर्ष के दौरान कई तकलीफों का सामना करना पड़ा है। बात करें डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य की तो बचपन में ये अखबार बेचने का काम किया करते थे। इनमें से कोई पंचर बनाया करता था, तो कोई के पिता के साथ कपड़ा प्रेस करता था, तो कोई सड़क किनारे पटाखा, रंग-गुलाल की दुकान लगाया करते था। वहीं योगी कैबिनेट में एक ऐसे मंत्री भी शामिल हैं, जिनके पिता आज भी परचून की दुकान चलाते हैं, जबकि भाई चाट-फुल्की बेचते हैं।

आइए जानते हैं योगी के संघर्षमई मंत्रियों की कहानी…

केशव प्रसाद मौर्य: पिता के दुकान पर चाय बेचने से लेकर साइकिल से अखबार बेचने तक का काम किया

लगातार दूसरी बार यूपी के डिप्टी सीएम बनें केशव प्रसाद मौर्य की जिंदगी संघर्षो से भरी हुई है। इन्होंने खेलने-कूदने के उम्र में ही अपने कंधों पर जिम्मेंदारियों का बोझ उठा लिया था। बचपन में केशव अखबार बेचने का काम किया करते थे और अखबार बांटने के बाद जो भी समय बचता था, उसमें वह अपने पिता के चाय की दुकान पर हाथ बंटाया करते थे। गरीब परिवार के रहने वाले केशव मौर्या आज एक बड़ी हस्थी के नाम से जाने जाते हैं। केशव मौर्या 2013 में प्रयागराज के केपी कॉलेज में आए ईसाई धर्म प्रचारक का विरोध करने को लेकर चर्चा में आए थे।
वर्ष 2002 में भाजपा ने कट्टर हिंदूवादी छवि के कारण केशव को प्रयागराज शहर पश्चिमी से माफिया अतीक के खिलाफ उन्हें चुनावी रण में उतारा था, लेकिन दुर्भाग्य से केशव मोर्या को इस चुनावी जंग में हार का सामना पड़ा।

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भाजपा ने केशव को दूसरी बार फिर से साल 2007 में पश्चिमी शहर से प्रत्याशी के रूप में चुना, लेकिन इस बार भी इन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन भाग्य ने साथ दिया और आखिरकार केशव साल 2012 में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने एक बार फिर से उनके गृह क्षेत्र सिराथू से प्रत्याशी बनाया और वह भारी मतों के साथ जीतकर विधायक बन गए। भाजपा ने वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में केशव को फूलपुर संसदीय सीट से प्रत्याशी बनाया। इसमें केशव भारी मतों से सपा प्रत्याशी धर्मराज सिंह पटेल से चुनाव जीते। जिसके बाद 2016 में भाजपा ने केशव को प्रदेश अध्यक्ष पद संभालने का दायित्व सौंपा। 2017 के चुनाव में जीत हासिल करने के बाद भाजपा ने केशव मौर्या को उत्तर प्रदेश का डिप्टी सीएम बनाया।

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गुलाब देवी : पिता ने लोगों के कपड़े प्रेस कर बेटी को पढ़ाया

गुलाब देवी को भी उनकी जिंदगी में बहुत दुख झेलने पड़े थे। योगी सरकार में गुलाब देवी को राज्यमंत्री का पद मिला है। गुलाब देवी के पिता दूसरों के कपड़े प्रेस करने का काम किया करते थे। गुलाब देवी अपने पिता की इकलौती बेटी है। गुलाब देवी के पिता ने उनको काफी उत्साहित किया और उन्हें खूब पढ़ाया-लिखाया। जिसके बाद उन्हें चन्दौसी के ही कन्या इंटर कॉलेज में शिक्षक की नौकरी मिल गई। यहां गुलाब देवी प्रिंसिपल तक बनीं। इसी दौरान गुलाब देवी का सियासी करियर शुरू हो गया और वे भाजपा के साथ जुड़ गईं। गुलाब देवी जिलाध्यक्ष भी रहीं। 2018 में इनके पिता का निधन हो गया। बेटी के इस मुकाम पर पहुंचने के बाद भी पिता लोगों के कपड़े प्रेस करते थे। कहते थे कि इसी रोजगार की वजह से ही मेरी बेटी आगे बढ़ी है। मैं इसे नही छोड़ सकता। बता दें कि चन्दौसी विधानसभा क्षेत्र से पांचवी बार विधायक बनने वाली गुलाब देवी को तीसरी बार राज्यमंत्री का पद मिला है।

धर्मवीर प्रजापति

धर्मवीर प्रजापति : भाई आज भी चाट-फुल्की बेचते हैं।

धर्मवीर का सफर भी संघर्षों से भरा रहा है। योगी कैबिनेट में राज्यमंत्री बने धर्मवीर प्रजापति हाथरस के बहरदोई गांव के निवासी हैं। 1998 में गांव छोड़कर वह हाजीपुर खेड़ा, खंदौली में रहने चले गए थे। हालांकि, आज भी उनका परिवार गांव में ही रहता है। धर्मवीर के पिता गेंदालाल गांव में एक छोटी सी परचून की दुकान चलाते थे। इनके छोटे भाई आज भी गांव में चाट-फुल्की बेचते हैं। 2005 में वह भाजपा के वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह के संपर्क में आए थे। जिसके बाद पहले संगठन से जुड़ गए और फिर बाद में एमएलसी बने। 2017 में धर्मवीर को माटी कला बोर्ड का चेयरमैन घोषित किया गया।

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नंद गोपाल गुप्ता नंदी: सड़क किनारे पटाखा, रंग-गुलाल बेचा करते थे।

प्रयागराज के रहने वाले नंद गोपाल की जिंदगी में कई उतार चढ़ाव आए, जो दूसरी बार योगी सरकार में मंत्री बन गए हैं। बता दें कि नंद के पिता डाक विभाग में काम किया करते थे और उनकी मां घर में सिलाई-बुनाई का काम किया करती थीं। आर्थिक तंगी के कारण नंद ने बचपन में दिवाली पर पटाखे बेचने के साथ-साथ होली पर सड़क किनारे रंग-गुलाल की दुकान लगाया करते थे। कई बार पैसों के लिए उनको पुराने बोरे बेचने का भी काम करना पड़ा था, लेकिन धीरे-धीरे हालात सुधरा और उन्होंने 1992 में मिठाई की दुकान खोली और फिर यहीं से वो आगे बढ़ते गए। जिसके बाद नंद ने ट्रक खरीदी और फिर घी और दवाओं की एजेंसी ले ली। 1994 में नंद ने ईंट-भट्टे का कारोबार भी शुरू किया। अब नंद के पास करोड़ो की दौलत है। 2007 में नंद गोपाल बसपा के टिकट पर चुनाव लड़े और जीत हालिस कर राजनीति में कदम रखा। लेकिन 2012 के चुनाव में वह चुनाव हार गए। हालांकि, उनकी पत्नी अभिलाषा गुप्ता नंदी महापौर का चुनाव जीत गईं। नंद 2016 में भाजपा का दामन थाम लिया और 2017 में चुनाव लड़े और जीत गए। योगी सरकार में उन्हें मंत्री बनाया गया। एक बार फिर से चुनाव जीतने पर उन्हें मंत्री बनाया गया।

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मनोहर लाल उर्फ मन्नु कोरी: मजदूर से मंत्री बनने तक का सफर

बात करे मनोहर लाल पंथ की तो इन्होंने भी अपनी जिंदगी में काफी संघर्ष किया है। मनोहर लाल पंथ उर्फ मन्नू कोरी को लगातार दूसरी बार राज्यमंत्री बनाया गया है। आर्थिक तंगी के कारण मन्नू कोरी को 10वीं के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी। बता दें कि मन्नु के पिता मूर्ति बनाने का काम किया करते थे जिसमें मन्नु भी अपने पिता की मदद करते थे। इसके साथ वह मजदूरी भी किया करते थे। इस बीच, मन्नु बुंदेलखंड के मशहूर बुंदेला परिवार से मिले और यहीं से उनकी राजनीतिक करियर की शुरूआत हुई। 1995 में पहली बार जिला पंचायत में शामिल हुए। वह शुरू से ही भाजपा के साथ रहे और कई बार जिला पंचायत से लेकर विधानसभा तक कई बार चुनाव हारे।

इस बीच, वह बुंदेलखंड के मशहूर बुंदेला परिवार के संपर्क में आए। यहीं से उनका सियासी करियर शुरू हुआ। 1995 में पहली बार जिला पंचायत में शामिल हुए। शुरू से ही बीजेपी के साथ रहे कोरी जिला पंचायत से लेकर विधानसभा तक कई बार चुनाव हारे। 2012 में वह बसपा के फेरनलाल अहिरवार से महज 1700 वोटों से हारे थे, लेकिन 2017 में बीजेपी से उन्हें फिर टिकट मिला और भारी मतों से जीत गए। तब उन्हें पहली बार राज्यमंत्री का पद मिला और इस बार फिर चुनाव जीतने पर उन्हें योगी सरकार में राज्यमंत्री का पद मिला है।

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राकेश राठौर : पंचर की दुकान से विधायक और मंत्री बनने तक का कठिन सफर

राकेश राठौर की कहानी भी संघर्षों से भरी है। इन्होंने उत्तर प्रदेश के राज्यमंत्री के रूप में शपथ लिया है। योगी सरकार में मंत्री बने राकेश राठौर आठवीं पास हैं। एक समय में राकेश मिस्त्री का काम किया करते थे और इनकी साइकिल और स्कूटर ठीक करने की दुकान भी थी। बाद में उन्होंने स्पेयर्स पार्ट्स बेचने का भी काम शुरू किया और आखिर में इन्वर्टर बेचने तक का काम किया। 2017 में भी वह विधायक चुने गए थे और इस बार उन्हें योगी सरकार में मंत्री बनाया गया है।

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