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ज्योतिष

जानें और समझें गठिया रोग का प्रमुख ज्योतिषीय कारण और निवारण के ज्योतिषीय उपाय को…

चिकित्सा विज्ञान (Medical Science) के अनुसार गठिया रोग (Arthritis) तब होता है जब शरीर में उत्पन्न यूरिक एसिड (Uric Acid) का उत्सर्जन समुचित प्रकार से नहीं हो पाता है। पानी में फ्लोराइड की मात्रा अधिक होने पर भी जोड़ सख्त होने लगते हैं। यहां जानें और समझें गठिया रोग का प्रमुख ज्योतिषीय कारण और निवारण के ज्योतिषीय उपाय को।

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Arthritis Pain

नई दिल्ली। चिकित्सा विज्ञान (Medical Science) के अनुसार गठिया रोग (Arthritis) तब होता है जब शरीर में उत्पन्न यूरिक एसिड (Uric Acid) का उत्सर्जन समुचित प्रकार से नहीं हो पाता है। पानी में फ्लोराइड की मात्रा अधिक होने पर भी जोड़ सख्त होने लगते हैं। इससे जोड़ों के बीच स्थित कार्टिलेज घिसने लगता है और दर्द की अनुभूति होती है। आयुर्वेद (Ayurveda) के अनुसार जोड़ों में वात का संतुलन बिगड़ने पर जोड़ों में सूजन (Swollen Joints) आ जाती है और यह धीरे-धीरे गठिया रोग का रूप धारण कर लेती है।

Psoriasis arthritis

आयुर्वेद के अनुसार हड्डी और जोड़ों में वायु का निवास होता है। वायु के असंतुलन से जोड़ से प्रभावित होते हैं अतः वायु गडबड़ा जाने से जोड़ों में दर्द होता है। गठिया रोग जोड़ों के दर्द से संबंधित है। इसलिए जोड़ों की रचना को ठीक तरह समझ लेना उचित होगा। गठिया में जोड़ों की रचना में विकृति पैदा होती है। हड्डियों के बीच का जोड़ एक झिल्ली से बनी थैली में रहता है, जिसे सायनोवियल कोष या आर्तीक्युलेट कोष कहते हैं।

जोड़ों की छोटी-छोटी रचनाएं इसी कोष में रहती हैं। हड्डियों के बीच की क्रिया ठीक तरह से हो तथा हड्डियों के बीच घर्षण न हो, इसलिए जोड़ों में हड्डियों के किनारे लचीले और नर्म होते हैं। यहां पर एक प्रकार की नर्म हड्डियां रहती हैं, जिन्हें कार्टीलेज या आर्तीक्युलेट कहते है, जो हड्डियों को रगड़ खाने से बचाती हैं। पूरे जोड़ को घेरे हुए एक पतली झिल्ली होती है, जिसके कारण जोड़ की बनावट ठीक रहती है। इस झिल्ली से पारदर्शी, चिकना तरल पदार्थ उत्पन्न होता है, जिसे सायनोवियल तरल कहते हैं।

Arthritis Pain

संपूर्ण सायनोवियल कोष में यह तरल श्रा रहता है। किसी भी बाह्य चोट से जोड़ को बचाने का काम यह तरल करता है। इस तरल के रहते जोड़ अपना काम ठीक ढंग से करता है। गठिया रोग का एक कारण शरीर में अधिक मात्रा में यूरिक ऐसिड का होना माना गया है। जब गुर्दों द्वारा यह कम मात्रा में विसर्जित होता है, या मूत्र त्यागने की क्षमता कम हो जाती है, तो मोनो सोडियम वाइयूरेत क्रिस्टल जोड़ों के ऊतकों में जमा हो कर तेज उत्तेजना एवं प्रदाह उत्पन्न करने लगता है। तब प्रशवित शग में रक्त संचार असहनीय दर्द पैदा कर देता है।

ध्यान देने वाली बात यह हैं कि गठिया रोगियों का वजन अक्सर ज्यादा होता है और ये देखने में स्वस्थ एवं प्रायः मांसाहारी और खाने-पीने के शौकीन होते हैं। शरी और तैलीय शेजन- मांस, मक्खन, घी और तेज मसाले, शारीरिक एवं मानसिक कार्य न करना, क्रोध, चिंता, शराब का सेवन, पुरानी कब्ज आदि कारणों से जोड़ों में मोनो सोडियम बाइयूरेट जमा होने से असहनीय पीड़ा होती है, जिससे मानव गठिया रोग से पीड़ित हो जाता है।

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार वात का कारक ग्रह शनि है। कुण्डली में शनि की स्थिति अनुकूल नहीं होने पर इस रोग का सामना करना पड़ता है। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि शनि के अलावा बुध और शुक्र भी इस रोग को प्रभावित करते हैं। जिनकी जन्मपत्री में शनि तीसरे, छठे, आठवें, अथवा बारहवें स्थान का स्वामी होता है और बुध एवं शुक्र को देखता है उन्हें गठिया रोग का दर्द सहना पड़ता है। लेकिन बुध या शुक्र शनि के साथ एक ही घर में बैठे हों तब इस रोग के होने की संभावना काफी कम रहती है।

ज्योतिष में “शनि” को हड्डियों के जोड़ या जॉइंट्स का कारक माना गया है हमारे शरीर में हड्डियों का नियंत्रक ग्रह तो सूर्य है पर हड्डियों के जोड़ों की स्थिति को “शनि” नियंत्रित करता है अतः हमारे शरीर में हड्डियों के जोड़ या जॉइंट्स की मजबूत या कमजोर स्थिति हमारी कुंडली में स्थित ‘शनि” के बल पर निर्भर करती है ।

पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि जन्म कुंडली में शनि पीड़ित स्थिति में होने पर व्यक्ति अक्सर जॉइंट्स पेन या जोड़ो के दर्द से परेशान रहता है और कुंडली में शनि पीड़ित होने पर ही घुटनो के दर्द, कमर दर्द, गर्दन के दर्द, रीढ़ की हड्डी की समस्या, कोहनी और कंधो के जॉइंट्स में दर्द के जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। इसके अतिरिक्त कुंडली का “दसवा भाव” घुटनो का प्रतिनिधित्व करता है। छटा भाव कमर का प्रतिनिधित्व करता है, तीसरा भाव कन्धों का प्रतिनिधित्व करता है और सूर्य को हड्डियों और केल्सियम का कारक माना गया है अतः इन सबकी भी यहाँ सहायक भूमिका है। परंतु जोड़ो के दर्द की समस्या में मुख्य भूमिका “शनि” की ही होती है क्योंकि शनि को हड्डियों के जोड़ो का नैसर्गिक कारक माना गया है और शनि हमारे शरीर में उपस्थित हड्डियों के सभी जॉइंट्स का प्रतिनिधित्व करता है। अतः कुंडली में शनि पीड़ित होने पर ही व्यक्ति को दीर्घकालीन या निरन्तर जॉइंट्स पेन की समस्या बनी रहती है”

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आचार्य वराह मिहिर के अनुसार पहले घर में बृहस्पति हो और सातवें घर में शनि विराजमान हो इस स्थिति में भी गठिया रोग होता है। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हरण की शनि की दृष्टि दसवें घर एवं दसवें घर के स्वामी पर होने से भी इस के रोग की आशंका रहती है। वृषभ, मिथुन एवं तुला राशि के व्यक्तियों में इस रोग की संभावना अधिक रहती है। जिनकी कुण्डली में शनि चन्द्रमा को देखता है उन्हें भी गठिया रोग की पीड़ा सहनी पड़ती है।

जानिए गठिया रोग के ज्योतिषीय उपचार को

–शनिवार के दिन संध्या के समय शनि देव को तिल एवं तिल का तेल अर्पित करें।

–तिल के तेल से जोड़ों की मालिश करें।

–उड़द की दाल से बनी खिचड़ी दान करें और स्वयं भी खाएं।

–जितना संभव हो शनि मंत्र “ओम् शं शनिश्चराय नमः” मंत्र का जप करें।

–गुरूवार के दिन गाय को चने की दाल, रोटी एवं केला खिलाएं।

–नियमित रूप से गुरू मंत्र “ओम् बृं बृहस्पतये नम:” मंत्र का जप करें।

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