दिल्ली दंगे के पीछे की साजिश का खुलासा इस चौंकाने वाले दस्तावेज में…

प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित दिल्ली दंगे साजिश का खुलासा पुस्तक फरवरी और मार्च में दिल्ली में हुए दंगे के षड़यंत्र का पर्दाफाश करती है। यह किताब कई मायने में एक संग्रह करने योग्य दस्तावेज है।

Avatar Written by: September 2, 2020 11:33 am
Delhi Riots

प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित दिल्ली दंगे साजिश का खुलासा पुस्तक फरवरी और मार्च में दिल्ली में हुए दंगे के षड़यंत्र का पर्दाफाश करती है। यह किताब कई मायने में एक संग्रह करने योग्य दस्तावेज है। इसकी सबसे खास बात ये है कि ये किसी लेखक के वैचारिक आग्रह से प्रभावित नहीं है। ऐसे समय में जबकि दिल्ली के दंगे पर लेखन दो वैचारिक धाराओं में बंटा है, इस देश विरोधी साजिश पर से उठने वाले हर पर्दे का विरोध हो रहा है, एक सेक्यूलर गैंग इस दंगे के अंदर झांकने वाली हर खिड़की को बंद कर देना चाहता है, दिल्ली दंगे की साजिश पुस्तक एक करारा जवाब है। इसलिए भी कि ये किसी लेखक के वैचारिक आग्रह से जन्म नहीं लेती, ये किसी घटना को किसी विशेष रंग में देखने का व्यक्तिगत प्रयास नहीं है।

Mridul Tyagi

कॉल फार जस्टिस संस्था ने दिल्ली दंगे की जांच के लिए एक समिति गठित की। समिति में मुंबई उच्च न्यायालय में जस्टिस रहे न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) अंबादास जोशी, पूर्व आईएएस एम. एल. मीणा, पूर्व आईपीएस अधिकारी विवेक दुबे, अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फोरेंसिक पैथोलॉजिस्ट डॉ. टी. डी.  डोगरा, स्वतंत्र रिसर्च स्कॉलर सुश्री नीरा मिश्रा, एडवोकेट और कंप्यूटर फोरेंसिक विशेषज्ञ नीरज अरोड़ा जैसी हस्तियां शामिल थीं। न तो इन विशेषज्ञों की योग्यता पर कोई सवाल उठाया जा सकता है और न ही इनके किसी किस्म के वैचारिक आग्रह रहे हैं। दिल्ली दंगों पर दिल्ली पुलिस की चार्जशीट से इतर देखें, तो यह अभी तक की सबसे विश्वसनीय स्वतंत्र जांच है। समिति ने उत्तर पूर्वी दिल्ली (दंगों से सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र) में महीनों जांच की। उस दौरान दंगा प्रभावित इलाकों में पीड़ित और चश्मदीदों की वीडियो गवाही दर्ज की गई। इस दौरान तमाम समाचार माध्यमों में प्रकाशित खबरों को खंगाला गया। सोशल मीडिया पर हुई हरकतों की समीक्षा की गई। समिति ने जांच में पाया कि कांग्रेस और आप नेताओं के बयानों ने सुनियोजित तरीके से मुस्लिम समुदाय को नागरिकता संशोधन कानून के नाम पर भड़काने के लिए चल रही साजिश को हवा दी।

सोनिया गांधी और राहुल गांधी के मुसलमानों से सड़कों पर उतरने के आह्वान ने पूरी साजिश को राजनीतिक प्रश्रय देने का काम किया। पिंजड़ा तोड़, जामिया कार्डिनेशन कमेटी, अलुमनाई एसोसिएशन आफ जामिया मिलिया, पॉपुलर फ्रंट आफ इंडिया (पीएफआई) के साथ ही आम आदमी पार्टी के स्थानीय नेताओं ने मुसलमानों को भड़काया। मजदूर तबके को हिंसा के लिए उनकी मजदूरी के बराबर पैसा देना शुरू किया गया। समिति ने जांच में पाया कि हमले के लिए भारी तादाद में पत्थर, पेट्रोल बम, गुलेल, देशी तमंचे, एसिड के पैकेट वगैहरा का दंगे से पहले सुनियोजित तरीके से इंतजाम किया गया था। सात हजार से ज्यादा बाहरी लोगों को इस हिंसा के लिए बुलाया गया था।

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प्रवर्तन निदेशालय ने भी इस बात की पुष्टि की कि सीएए के विरोध के लिए फंड पीएफआई ने मुहैया कराया। पीएफआई और रिहैब इंडिया से जुड़े 73 बैंक खातों में 120 करोड़ रुपये डाले गए। दंगा इस कदर पूर्व नियोजित था कि 24 फरवरी 2020 को हिंसा शुरू होने से पहले मुसलिम स्कूलों को बंद कर दिया गया। अन्य स्कूलों में मुस्लिम बच्चे या तो पहुंचे नहीं, या उनके अभिभावक हिंसा से पहले ही उन्हें ले आए। समिति ने दंगा प्रभावित इलाके की जनसंख्या के धार्मिक संतुलन से लेकर भौगोलिक स्थिति तक का आकलन किया। उत्तर प्रदेश से सटा होने के कारण ये इलाका दंगे के लिए ज्यादा मुफीद माना गया। यहां से फरारी आसान थी और साथ ही बाहरी लोगों को यहां लाना भी आसान था। इसके साथ ही उत्तर-पूर्वी दिल्ली की मुस्लिम आबादी कम शिक्षित और कमोबेश आर्थिक रूप से कमजोर है। समिति ने जांच में पूरी पारदर्शिता रखी। वीडियो गवाही दर्ज की गईं। गवाही में हिंदू और मुस्लिम दोनों ही पक्ष शामिल किए गए।

कुल मिलाकर ये ऐसा दस्तावेजी सुबूत है, जो दंगे की साजिश, रणनीति, उसे अमल में लाने वाले तरीकों की बखिया उधेड़ देता है। आने वाले समय में ऐसी किसी साजिश को समझने और नाकाम करने में भी यह एक अहम भूमिका निभा सकता है। वरिष्ठ पत्रकार आदित्य भारद्वाज और आशीष कुमार अंशु के संपादन ने जांच समिति की रिपोर्ट जैसी नीरस चीज को पठनीय और चुस्त बना दिया है। मुस्लिम पक्ष की उतनी दमदार उपस्थिति जांच रिपोर्ट में नजर नहीं आती, लेकिन तो भी, यह एक विश्वसनीय दस्तावेज तो है ही।

इस लेख के लेखक मृदुल त्यागी हैं। वह वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।  इस लेख में व्यक्त सारे विचार लेखक के निजी हैं।