Connect with us

ब्लॉग

आपदाएं कष्टदायक होती है, लेकिन तमाम अनुभव भी देती हैं

चार्ल्स डारविन प्राकृतिक इतिहास और भूगर्भ शास्त्रीय खोज में विश्व यात्रा पर थे। भूकम्प आया। वह उठे, चक्कर आया, गिरे। उन्होंने इस अनुभव का निष्कर्ष “जरनल ऑफ रिसर्चेज” में लिखा, “भूकम्प पुराने से पुराने भावनात्मक सम्बंधों को नष्ट करता है।

Published

on

Coronavirus

विश्व कोरोना की तीसरी लहर से जूझ रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस महामारी से जूझने के लिए कई स्तर पर बैठकें कर रहे हैं। पूरा तंत्र सक्रिय कर दिया गया है। उत्तर प्रदेश में भी कोरोना की बढ़त दिखाई पड़ रही है। मुख्यमंत्री योगी जी के नेतृत्व में सभी सम्बंधित विभाग पहली व दूसरी लहर के अनुभव सहायक सिद्ध हो रहे हैं। रात्रि में 10 बजे से 06 बजे तक कर्फ्यू जारी है। सरकार और उसका तंत्र सजग है। लेकिन आमजन महामारी को लेकर सतर्क नहीं दिखाई पड़ रहे हैं। भीड़ वाले क्षेत्रों व केन्द्रों पर व्यवस्था नहीं है। भीड़ यथावत है। अपनी जिंदगी बचाने के लिए भी सतर्कता का अभाव है। भीड़ वाले केंद्रों पर कोरोना प्रोटोकाॅल का अनुपालन नहीं हो रहा है। पहली व दूसरी लहर के दौरान हाथ धोना, एक दूसरे से दो गज की भौतिक दूरी का अनुपालन बढ़ गया था। महामारी की भयावहता में बहुत लोगों ने अपने परिजन-प्रियजन खोये थे। लेकिन संप्रत्ति तीसरी लहर के प्रकोप से स्वयं बचने और दूसरों को बचाने की प्रवृत्ति नहीं दिखाई पड़ती। हाथ मिलाने को संक्रमण की एक खास वजह माना जाता है। पहली व दूसरी लहर के दौरान लोगों ने हाथ मिलाना बंद कर दिया। लेकिन वर्तमान में कुछ लोगों में हाथ मिलाने की लत फिर से पड़ रही है। सारे लोग जानते हैं कि कोरोना का संक्रमण जानलेवा है। लेकिन आश्चर्य है कि जीवन के नष्ट हो जाने के खतरे के बावजूद लोग लापरवाही कर रहे हैं।

Coronavirus

आपदाएं कष्ट देती हैं। जीवन छीनती हैं। लेकिन तमाम अनुभव भी देती हैं। संप्रति एक नई सामाजिक व्यवस्था आकार ले रही है। पंथिक अंधविश्वासों की जगह वैज्ञानिक दृष्टिकोण की मान्यता बढ़ी है। पंथिक जलसों की भीड़ कम हो रही है। सामाजिक शिष्टाचार बदल रहे हैं। नमस्कार ने हाथ मिलाने की आधुनिक जीवन शैली को विस्थापित कर दिया है। स्वच्छता नया जीवन मूल्य हो रही है। अनावश्यक विदेश यात्राओं के लती पुनः विचार के लिए बाध्य हो रहे हैं। सब जीना चाहते हैं। लेकिन मृत्यु जीवन छीनती है। जीवन की इच्छा और मृत्यु भय से समाज व सभ्यता का विकास हुआ। आदिम मनुष्य का जीवन असुरक्षित था। सामूहिक जीवनशैली में सुरक्षा थी। उसने गुफाओं में रैन बसेरा बनाए। उसने जानवरों के शिकार और आत्म रक्षा के लिए पत्थर के हथियार बनाए। जीने की इच्छा व मृत्यु भय की छाया में आदिम समाज की जीवनशैली का विकास हुआ। आत्मरक्षा की भावना भी सभ्यता के विकास की प्रेरक थी। प्राकृतिक आपदाएं या युद्ध वीभत्स मृत्यु भय लाते हैं। व्यापक जनहानि वाली आपदाएं जीवन का दृष्टिकोण बदलती हैं।

Indore-coronavirus-survey-doctors-650x450

चार्ल्स डारविन प्राकृतिक इतिहास और भूगर्भ शास्त्रीय खोज में विश्व यात्रा पर थे। भूकम्प आया। वह उठे, चक्कर आया, गिरे। उन्होंने इस अनुभव का निष्कर्ष “जरनल ऑफ रिसर्चेज” में लिखा, “भूकम्प पुराने से पुराने भावनात्मक सम्बंधों को नष्ट करता है। अल्पकाल में असुरक्षा की ऐसी धारणा बनी जो दीर्घकाल के चिंतन से न पैदा होती।” सामने खड़ी मृत्यु जीवन दृष्टिकोण बदलती है। कोरौना का अनुभव भयावह रहा है। महामारी ने नया अनुभव दिया है। भयावह मौतों ने संसार के प्रति चिंतन का दृष्टिकोण बदल दिया है। भारत में महाभारत काल में यहां सभा जैसी लोकतंत्री संस्थाएं थीं। वे असफल हुईं। महायुद्ध हुआ। यह राष्ट्रीय आपदा थी। युधिष्ठिर जीत गए लेकिन नरसंहार ने उन्हें व्यथित किया। जीवन का दृष्टिकोण बदला। वे सत्ता सम्हालने को तैयार नहीं थे। कलिंग युद्ध के बाद अशोक का भी जीवन दृष्टिकोण बदल गया। कोरोना आपदा में भारत में अन्य देशों की तुलना में बचाव के प्रयत्न ज्यादा सफल हुए हैं। इस आपदा के प्रभाव में संपूर्ण समाज में सकारात्मक परिवर्तन आया है। सामान्यजन भी गरीबों की सहायता के लिए तत्पर रहे हैं। अब समाज अतिरिक्त संवेदनशील हो गया है। पुलिस बल महामारी के दौरान चिकित्सकों के साथ संग्राम की अग्रिम पंक्ति का सम्मानीय योद्धा बन गया है।

उम्मीद है कि तीसरी लहर में भी जनसेवा शैली ऐसी ही रहेगी। कोरोना की तीसरी लहर का कहर सामने है। सारी दुनिया के राष्ट्रों व राष्ट्राध्यक्षों के लिए चुनौती है। पहली दूसरी लहर में विकसित देश भी नागरिकों के बचाव में सफल नहीं रहे। अमेरिकी महाशक्ति भी असफल रही। कम्युनिस्ट चीन अपयश का निशाना है ही। लेकिन भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के काम की प्रशंसा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी हो रही है। वे दुनिया के संवेदनशील नेता होकर उभरे हैं। संप्रति भारतीय राज और समाज दोनो ही संवेदनशील हैं। समाज का व्यक्तित्व अतिरिक्त संवेदनशील रूप में प्रकट हुआ है। लेकिन सोशल मीडिया की आभासी दुनिया के एक वर्ग में शब्द और अपशब्द का अंतर समाप्त हो गया है। श्लील और अश्लील की विभाजन रेखा समाप्त हो गई है। आश्चर्य है कि इस महामंच पर सक्रिय योद्धाओं के मन संयमी महामारी के साथ जीने वाली नई नहीं हैं। समाज चिंतकों को सोशल मीडिया की प्रवृत्ति के हतोत्साहन के लिए सक्रिय होना चाहिए। विश्व व्यवस्था का चिंतन जारी है।

coronavirus

गांवों में महामारी का प्रकोप कम रहा है। महामारी ने रोग निरोधक क्षमता का प्राचीन भारतीय प्रतीक दोहराया है। आधुनिकतावादी भी तुलसी गिलोय का काढ़ा पी रहे हैं। सामाजिक परिवर्तन का काम प्रायः जनअभियान व आन्दोलनों से होता था। महामारी ने समाज का आत्म रूपांतरण किया है। ऐसी उपलब्धियां संजोने योग्य हैं। कालरथ गतिशील है। मृत्यु या जीवन में एक का चयन ही विकल्प है। आनंदमगन जीवन के लिए नई समाज व्यवस्था का सुस्वागतम् जरूरी हैं।
महाभारत के यक्ष प्रश्नों में यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा था कि ‘‘दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है- किं आश्चर्यं?’’ युधिष्ठिर ने यक्ष को उत्तर दिया कि ‘‘दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य मृत्यु को जानते हुए भी इस सच्चाई को स्वीकार न करना है।’’ युधिष्ठिर ने कहा था कि ‘‘सारे लोग जानते हैं कि हमारी मृत्यु निश्चित है, बावजूद इसके ऐसा आचरण करते हैं कि हम कभी नहीं मरेंगे।’’ इसी तरह सारे लोग जानते हैं कि कोरोना संक्रमण से जीवन को खतरा है लेकिन आचरण ऐसा कर रहे हैं कि जैसे कोरोना महामारी कोई हंसी-मजाक हो। सैनिटाइजेशन लगभग बंद दिखाई पड़ रहा है। भौतिक दूरी भी उपेक्षित है। जागरुक लोगों, वरिष्ठों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी है कि हम सब मिलकर कोरोना प्रोटोकाॅल का पालन करें और कराएं। इसके लिए प्रभावी लोकमत का निर्माण भी करें। अच्छी बात है कि लोगों में भय नहीं है लेकिन सतर्क रहना भय का हिस्सा नहीं है। अपने और अपने परिवार व मित्रों की रक्षा के लिए कोरोना शिष्टाचार का पालन समय की आवश्यकता है।

महामारियां तमाम नये अनुभव देती हैं। अनुभव हमेशा उपयोगी होते हैं। करणीय और अकरणीय का भेद सुस्पष्ट होता है। भारत ने पहली व दूसरी कोरोना लहर के दौरान बहुत कुछ पाया है और बहुत कुछ खोया है। महामारी का अनुभव उपयोगी है। इस महामारी ने एक नये अध्याय को जन्म दिया है। समाज को महामारियों के दौरान अनुभव प्राप्त शिष्टाचार का पालन करना होगा। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में भारत के चिकित्सा तंत्र में बहुत सुधार हुए हैं। पहले टीका नहीं था, अब टीका है। पहले दवा नहीं थी, अब दवा है। पहले अनेक केंद्रों पर आॅक्सीजन की कमीं थी, अब उसकी कमीं नहीं रह गयी है। हौंसला पहले भी बुलंद था, अब अनुभव के कारण हौंसला भी बढा है। कमी लोकमत निर्माण की है। प्रत्येक व्यक्ति स्वयं अपना संरक्षक है। पूरे देश और प्रदेश में इस महामारी से जूझने की संस्कृति का विकास करना होगा।

Advertisement
Continue Reading
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Advertisement
Advertisement