हृदय नारायण दीक्षित

राष्ट्र प्राचीन वैदिक धारणा है और नेशन आधुनिक काल का विचार है। राष्ट्र के लिए अंग्रेजी भाषा में कोई समानार्थी शब्द नहीं है। ई0एच0 कार ने नेशन की परिभाषा की है, “सही अर्थो में राष्ट्र्रो या नेशंस का उदय माध्यकाल की समाप्ति पर हुआ।”

काम कामनाओं का बीज है। यह प्रकृति में सर्वव्यापी है। प्राकृतिक है। प्रकृति की सृजनशक्ति है। प्रत्येक शक्ति का नियमन भी होता है। नियमविहीन शक्ति अराजकता में प्रकट होती है। फिर काम को विराट शक्ति जाना गया है।

भूमि और सभी प्राणी परस्पर अन्तर्सम्बन्धित हैं। यह नेह मां और पुत्र जैसा है। वैदिक साहित्य में इस सम्बंध का अनेकशः उल्लेख है। वैदिक ऋषि पृथ्वी को बार-बार नमन करते हैं। अथर्ववेद (भूमि सूक्त, 12.26 व 27) में कहते हैं, “इस भूमि की सतह पर धूलिकण हैं, शिलाखण्ड व पत्थर हैं।

कविता और विज्ञान एक साथ नहीं मिलते। काव्य में भाव अभिव्यक्ति की प्रमुखता होती है और विज्ञान में प्रत्यक्ष सिद्धि की। विज्ञान में पृथ्वी सौर मण्डल का ग्रह है। पृथ्वी पर तमाम वस्तुएं, खनिज, वनस्पतियां और जल पृथ्वी का भाग है।

मनुष्य एकाकी नहीं रह सकता। वह परिवार और समाज का अंग है। परिवार में परस्पर प्रेम का प्रसाद होता है। इसी तरह समाज में परस्पर प्रेम से राष्ट्र आनंद क्षेत्र बनते हैं।

कालचिंतन भारतवासियों का प्रिय विषय रहा है। ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में दिन रात्रिविहीन दशा का उल्लेख है। काल की धारणा में दिन और रात्रि समय के ही चेहरे हैं। ऋषि के अनुसार तब न रात थी

प्रत्येक प्राणी की काया के अणु परमाणु में काम सर्जक तरंग हैं। मन संकल्प का केन्द्र भी काम ऊर्जा के प्रवाह से शक्ति पाता है।। प्रकृति में अतिरिक्त काम ऊर्जा है। यह काम ऊर्जा के तरंग प्रवाह से उफनाती रहती है।

अथर्ववेद में जीवन के सभी पक्ष हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद में वैज्ञानिक विषयों का भी दर्शन है। सामवेद गीत प्रधान है लेकिन अथर्ववेद में उपलब्ध विज्ञान की व्यवहार पद्धति भी है।

गीता ने सारी दुनिया को प्रभावित किया। इसका प्रभाव चीन और जापान तक पड़ा। ‘जर्मन धर्म’ के अधिकृत भाष्यकार जे0डब्लू0 होअर ने गीता का महत्वपूर्ण उल्लेख किया। होअर ने लिखा, “यह सब कालों में सब प्रकार के धार्मिक जीवन के लिए प्रामाणिक है।

भारत की देव आस्था निराली हैं, यहां प्रत्येक ग्राम के देवता हैं, कुल देवता हैं, क्षेत्र देवता हैं और वन देवता भी हैं। वैदिक काल के देवता वेदों में हैं। उत्तरवैदिक काल व पुराण काल में भी वैदिक देवों की उपासना व स्तुतियां थीं लेकिन तमाम नए देवनाम भी जुड़े। तैत्तिरीय उपनिषद् में ‘आचार्य देवता है - आचार्य देवो भव। माता पिता भी देवता है - मातृ देवो भव, पितृ देवो भव।