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हृदय नारायण दीक्षित

प्रकृति में अनेक अंश और अंग हैं। मनुष्य भी प्रकृति का भाग हैं। मनुष्य और प्रकृति के बीच स्थाई आत्मीयता है। सृष्टि के आदिकाल से मनुष्य प्रकृति में उपलब्ध पदार्थो और शक्तियों का उपयोग करता रहा है।

भारतीय अनुभूति (Indian experience) में अनेक देवता (God) हैं। सभी देव शक्तियां दिव्य हैं और दिव्यता प्रकाश है। परम तत्व सर्वत्र ज्योतिर्मय प्रकाशरूपा है। वह एकमेव ‘एकं’ है। ऋग्वेद (Rigveda) के ऋषि (sage) ने उस एक को एकं सद् कहा है।

भारतीय राजनीति (Indian politics) लोकमंगल (Lokmangal) का उपकरण है। सभी दल अपनी विचारधारा को देशहित का साधन बताते हैं। विचार आधारित राजनीति मतदाता के लिए सुविधाजनक होती है।

प्रकृति दिव्यता है, सदा से है। देवी है। मनुष्य की सारी क्षमताएं प्रकृति प्रदत् है। जीवन के सुख-दुख, लाभ-हानि व जय-पराजय प्रकृति में ही संपन्न होते हैं। दुनिया की अधिकांश संस्कृतियों में ईश्वर या ईश्वर जैसी परमसत्ता को प्रकृति का संचालक जाना गया है।

Impact of Corona : कोरोना महामारी (Corona Virus) से विश्व सामाजिक व्यवस्था में उथल-पुथल है। भारत भी अछूता नहीं है। यहां की सामाजिक व्यवस्था (social System) में भी अनेक द्वन्द्व हैं। यह ध्यान देने योग्य है।

Existence of Life: प्राण ही आयु (Life) है। प्राण के अभाव में शरीर का कोई अस्तित्व (Existence of life) नहीं है। उत्तर वैदिककाल (Post vedic period) में अन्न को मनुष्य जीवों का आधार कहा गया है। इसी उपनिषद में अन्न की निंदा न करने को महत्वपूर्ण व्रत कहा गया है कि अन्न ही प्राण है।

प्राण (Life) से जीवन है। प्राण से प्राणी है। प्राण दिखाई नहीं पड़ते। इसके बावजूद प्राण का अस्तित्व (Existence of life) है और प्राण के कारण ही जीव का अस्तित्व है। प्रश्नोपनिषद में कहा गया है कि सहस्त्रों किरणों वाला, सैकड़ों रुपों वाला समस्त जीवों का प्राण सूर्य उदित हो रहा है। यहां सूर्य संसार का प्राण है।

Importance of Books : विश्व की सभी सभ्यताओं में पुस्तकों का आदर (Respect Books) किया जाता है। पुस्तकों (Books) में वर्णित जानकारियां लेखक के कौशल से सार्वजनिक होती हैं। शब्द स्वयं में सार्वजनिक संपदा है।

लोक (World) की व्याप्ति बड़ी है। सामान्यतया प्रत्यक्ष विश्व (Direct world) को लोक कहते हैं। लेकिन भारतीय परंपरा (Indian tradition) में कई लोकों की चर्चा है।

अस्तित्व (Existence) विराट है। इसकी अपनी गतिविधि है। अस्तित्व के अंश (Parts of existence) भी इसी के भीतर अपने-अपने प्रेम से सक्रिय हैं। अस्तित्व की अनुकंपा से ही जीवन में शुभ या अशुभ घटित होता है। भविष्य में सुख मिलने या अच्छे दिन की आशा प्रतीक्षा बनती है। प्रतीक्षा गहन आस्तिक भाव (Waiting intense believer) है।