हृदय नारायण दीक्षित

राजनीति स्वयं से दूर की यात्रा है। यहां स्वयं के प्रगति आस्तिक भाव नहीं है। हम स्वयं अपनी प्रशंसा करते हैं, प्रशंसा सुनने के लिए तमाम उपाय करते हैं। बेशक अपना चित्र देखकर सब प्रसन्न होते हैं। लेकिन हम अपना बड़ा चित्र चाहते हैं।

अमावस्या हर माह आती है। यही बताने कि तमस् भी संसार सत्य का अंग है। रात्रि को प्रकाशहीन कहा जाता है पर ऐसा है नहीं। रात्रि में चन्द्रप्रकाश होता है। क्रमशः घटता बढ़ता हुआ। अमावस्या अंधकार से परिपूर्ण रात्रि है।

इस वर्ष (2019) का करवाचौथ एवम गणेश चतुर्थी एक साथ होने से आज का दिन और भी विशेष हो गया...

सविता सूर्य ही हैं। सूर्य किरणें स्वर्णिम होती है। सविता देव का मण्डल 1 सूक्त 35 में स्वर्ण जोड़कर सुंदर मानवीकरण हुआ है। कहते हैं, “सविता देव ‘हिरण्याक्ष’ स्वर्ण आखों - दृष्टि वाले हैं।

श्राद्ध सामान्य अंधविश्वासी कर्मकाण्ड नहीं है। हमारे पूर्वजों ने ही ऐसे सुंदर कर्मकाण्ड को बड़े जतन के साथ गढ़ा है। इस कर्मकाण्ड में स्वयं के भीतर पूर्वजों के प्रवाह का पुनर्सृजन संभव है।

ऋग्वेद के अधिकांश देवता प्रकृति की शक्ति हैं। सूर्य, पृथ्वी, जल, वायु, मरूत, नदी आदि देव प्रकृति में प्रत्यक्ष हैं। लेकिन इन्द्र प्रकृति की प्रत्यक्ष शक्ति नहीं हैं। ऋग्वेद में सभी देवों की तुलना में इन्द्र की सबसे ज्यादा स्तुतियां हैं।

पूर्वज अनुभूति में पृथ्वी सजीव है। यह निर्जीव नहीं है। लाखों जीवों की धारक है। इसी में उगना उदय और अस्त होना प्रत्येक प्राणी की नियति है। यह जननी है। पृथ्वी को माता कहने वाले यह ऋषि अंधविश्वासी नहीं हैं।

भरत का उद्देश्य सांस्कृतिक है। तत्व बोध इतिहास बोध के रास्ते समाज के अंतर्मन का संस्कार है। ऋग्वेद के रचनाकार ऋषि प्रकृति के सत्य, शिव और सुंदर को ही काव्य मंत्री द्वारा पुनर्सृजित कर रहे थे।

माता पिता के प्रति भावपरक ऋद्धा का अपना समाज विज्ञान है। माता पिता बचपन में पोषण देते हैं, पढ़ाते हैं सिखाते हैं। वे स्वयं की चिन्ता नहीं करते अपना भविष्य नहीं देखते। हम सबके सुखद भविष्य का तानाबाना बुनते हैं।  हम तरूण होते हैं, पिता वृद्ध होते हैं। हम तरूणाई से और परिपक्व होते हैं, पिता और वृद्ध होते हैं। जब हम तेज रफ्तार जीवन की गतिशीलता में होते हैं, तब माता पिता उठते हीं गिर पड़ते हैं। वे बचपन में हमको गिरने से बचाते थे।

ऋग्वेद में मनुष्य और देवों की प्रीति अनूठी है। वैदिक अभिजन सभी अवसरों पर देवों का स्मरण करते हैं। वे दुखी होते हैं तो देवों की स्तुतियां करते हैं और जब सुखी होते हैं तब भी लेकिन आनंद और उत्सव के समय वे देवों को ज्यादा याद करते हैं।