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हृदय नारायण दीक्षित

मनुष्य आनंद अभीप्सु है। आनंद के तमाम उपकरण प्रकृति में हैं। वे प्राकृतिक हैं। अनेक उपकरण समाज में भी हैं और वे सांस्कृतिक हैं। समाज अपने आनंद के लिए अनेक संस्थाए बनाते हैं। राजव्यवस्था समाज की सबसे महत्वपूर्ण संस्था है। एक विशेष भूखण्ड में रहने वाले लोगों की एक जीवनशैली होती है।

जीवन सरल है, तरल है और विरल भी। संसार का प्रत्येक व्यक्ति अनेक अभिलाषाओं से भरा पूरा है। अभिलाषाएं कभी पूरी नहीं होती। अनंत है अभिलाषाएं। एक पूरी हुई दूसरी सामने है। मेरे मन में जीवन को समझने की अभिलाषा रही है। यह कठिन कार्य है।

ऋग्वेद में संसार प्राकृतिक विकास का परिणाम है। वर्ण व्यवस्था सामाजिक विकास के क्रम में विकसित हुई और जाति भी। सभी आर्य एक समान थे। सभी वर्णो में आत्मीय सम्बंध थे। मनुस्मृति (10.64) में कहा गया है कि शूद्र ब्राह्मणत्व को प्राप्त होता है और ब्राह्मण शूद्रत्व को। भिन्न-भिन्न वर्ण में वैवाहिक सम्बंध थे।”

भारतीय परंपरा को अंधविश्वासी कहने वाले लज्जित हैं। कथित प्रगतिशील श्रीराम व श्री कृष्ण को काव्य कल्पना बताते थे। वे हिन्दुत्व को साम्प्रदायिक कहते थे। राजनैतिक दलतंत्र का बड़ा हिस्सा भी हिन्दुत्व को साम्प्रदायिक बताता था। देवों की भी निन्दा थी।

अंग्रेजी सभ्यता प्रभावित विद्वानों ने मान लिया कि हम कभी राष्ट्र नहीं थे। अंग्रेजों ने ही भारत को राष्ट्र बनाया है। लेकिन 20वीं सदी के सबसे बड़े आदमी महात्मा गांधी ने चुनौती दी। उन्होंने 1909 में हिन्द स्वराज में लिखा, “आपको अंग्रेजों ने बताया हे कि भारत एक राष्ट्र नहीं था कि अंग्रेजों ने ही यह राष्ट्र बनाया है। लेकिन यह सरासर झूठ है।

राजनीति लोकमंगल का अनुष्ठान रही है। प्राचीन भारत में समाज को आनंद-मगन बनाने के उपाय सभी स्तर पर किए जाते थे। मनुष्य इस विश्व का भाग है। विश्व का भाग होने के कारण मनुष्य और प्रकृति के मध्य आत्मीय संबन्ध हैं, लेकिन अंतर्विरोध भी है।

Prayer in India: प्रार्थना(Prayer) में बड़ी ऊर्जा है। दर्शन और विज्ञान में प्रार्थी भाव से उतरना आनंददायी है, विद्यार्थी भाव से उतरना संतोषजनक है लेकिन अर्थार्थी बुद्धि से उतरना व्यर्थ है। प्रार्थना में शब्दार्थ का मूल्य नहीं होता।

संसद भारत का सर्वोच्च सदन है। भारतीय संसद द्विसदनीय है। लोकसभा को सामान्यतया निम्न सदन और राज्यसभा को उच्च सदन कहा जाता है दोनों के गठन के लिए अलग-अलग निर्वाचक मण्डल है।

एक संसार प्रत्यक्ष है। यह सबको दिखाई पड़ता है। दूरी की बात अलग है। दूरी के अनुपात में सभी वस्तुएं किसी-न-किसी रूप में दिखाई पड़ती हैं। भारतीय चिंतन में शब्द को ब्रह्म कहा गया है। ब्रह्म और अस्तित्व पर्यायवाची हैं। हम प्रत्यक्ष अस्तित्व का बड़ा भाग देख लेते हैं।

श्रद्धा भाव घट रहा है। श्रद्धा गहन आत्म विश्वास का पर्याय है। घने कोहरे या अंधकार में दूर तक नहीं दिखाई पड़ता। शीत घनत्व ज्यादा हो तो निकट देखना भी विकट हो जाता है। गहन अंधकार में भी ऐसा ही होता है। कोहरे में सामान्य प्रकाश काम नहीं करता। कोहरे के कारण दुर्घटनाएं होती हैं।