हृदय नारायण दीक्षित

तमाम अभावों के बावजू ग्राम निवासियों के मन में गांवों का आकर्षण है। कोरोना महामारी के प्रकोप के समय महानगरों में मजदूरी करने वाले ग्रामीण गांवों की ओर भागे। इनकी संख्या लाखों में थी। हजारों प्रवासी पैदल भी लंबी यात्रा करते देखे गए थे।

प्रकृति आलस्य नहीं करती। प्रकृति की शक्तियां निरंतर सक्रिय रहती है। सूर्य आलस्य नहीं करते। पृथ्वी प्रतिपल नृत्यमगन है और चंद्र भी। सोम और चन्द्र पर्याय भी माने जाते हैं। चन्द्रमा विराट पुरूष का मन कहा गया है। मन कभी आलस्य नहीं करता। मन सतत् सक्रिय रहता है। ऋग्वेद अथर्ववेद में सोमलता का उल्लेख है।

विज्ञान सत्य जानने का अनुशासन है। सत्य को जानना विज्ञान है। विज्ञान ने भौतिक विश्व के अनेक रहस्यों का अनावरण किया है। लेकिन जगत के सभी गोचर प्रपंचो में कार्यकारण श्रंखला की खोज अभी शेष है। शिखर ब्रह्माण्ड विज्ञानी स्टीफेंस हाकिंग ने ''द थ्योरी ऑफ एवरीथिंग'' में सभी कार्यो के कारण जानने का कार्य भविष्य की वैज्ञानिक पीढ़ी पर छोड़ा है। सत्य का ज्ञान उपयोगी है।

कोरोना महामारी से विश्व अशांत है। विश्व मानवता पर व्यथित है। दुनिया भयग्रस्त है। मृत्यु सामने है। चिकित्सा विज्ञान के सामने अभूतपूर्व चुनौती है। यहां तक की विश्व स्वास्थ्य संगठन भी संकट में है और अशांत है। 

आत्मनिर्भरता सबसे बड़ा सुख है। आत्मनिर्भर समाज और राष्ट्र अपने निर्णयों में दबावमुक्त रहते हैं। सशक्त राष्ट्र अपने समाज जीवन के सभी क्षेत्रों में आत्मनिर्भर होने का लक्ष्य रखते हैं। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रजीवन के सभी क्षेत्रों में आत्म निर्भर बनाने का प्रयास लगातार किया है। आत्मनिर्भर होने की प्राथमिक शर्त है- अन्न आत्म निर्भरता।

कोरोना महामारी है। महमारी की इस अवधि में हजारों विद्वान व विशेषज्ञ प्रकट हो गए हैं। हमारे जैसे विद्यार्थी हलकान हैं। ढेर सारे विद्वान, ढेर सारे विशेषज्ञ, ढेर सारे चैनल। पुराना फिल्मी गीत याद आता है- किस किस को प्यार करूं? टीवी पर बहसे ही बहसें।

अथर्ववेद भारतीय अनुभूति का मधुरस है। निस्संदेह इसके पूर्व ऋग्वेद में दर्शन और विज्ञान के ज्ञान अभिलेख हैं, प्रकृति के प्रति गहन जिज्ञासा है। मनुष्य को आनंदित करने वाली जीवनदृष्टि है।

घर आनंद है, घर में होना अपनत्व में रहना है। बच्चे बाहर खेलने जाते हैं, खेलने के बाद घर लौट आते हैं। हम सब पूरे दिन बाहर काम करते हैं, काम के बाद घर लौट जाते हैं।

आपत्काल का प्रभाव दोधारी तलवार जैसा होता है। आपदाएं असहाय होने का भाव जगाती हैं। निराश करती हैं। निराशा मन की विशेष चित्तदशा है।

स्वास्थ्य सुख है और रोगी होना दुख। यह मान्यता भारतीय आयुर्विज्ञान की है। संक्रामक रोगों के रोगी को अलग रखे जाने की जरूरत अथर्ववेद के रचनाकाल में भी थी।