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“जब तक अन्न जल है तब तक जीवन”

लक्ष्यविहीन ज्ञान निरर्थक है। सर्वभूतहित संलग्नता में ही सच्चा सृजन है। भरत मुनि ने नाटक का उद्देश्य मनोरंजन के साथ सदाचार ही बताया है। यहां सदाचरण की स्थापना के लिए नाटक और कथा में नायक के चरित्र चित्रण की महत्ता रही है।

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रस जीवन का प्रवाह है। हम रस अभीप्सु हैं और रस जिज्ञासु भी। अथातो रस जिज्ञासा। बातें भी रस पूर्ण होती हैं लेकिन द्रव्य या वस्तु नहीं होतीं। आनंदहीन बातचीत नीरस कही जाती हैं। बातों का रस बतरस कहा जाता है। रसभाव से भरेपूरे वाक्य काव्य हो जाते हैं। रस अनुभूति भाव है और भौतिक दृष्टि से द्रव्य है। चरक संहिता में रस की व्याख्या है “रसना के अर्थ का नाम रस है। रस का आधार द्रव्य जल और पृथ्वी है। पृथ्वी और जल से ही रस की उत्पत्ति हुई है। इसके विशेष ज्ञान में वायु, आकाश और अग्नि कारण बनते हैं।” यहां रसना का अर्थ स्वाद इन्द्रिय-जिह्वा है। रस के विशेष ज्ञान का अर्थ मधुर, तिक्त या लवण आदि है। बताते हैं “सुस्वादु अम्ल और लवण वात (वायु) को शांत करते हैं। कषाय, मधुर और तिक्त पित्त को तथा कसैले, कटु और तीखे रस कफ को शांत करने वाले हैं।” रस की धारणा साहित्य में भी है। इस धारणा का मूल आयुर्विज्ञान में दिखाई पड़ता है। अन्न से शरीर है। अन्न में रस होता है। जल अन्न का साथ है ही। इसीलिए “जब तक अन्न जल है तब तक जीवन” की कहावत चलती है। अन्न जल प्रत्यक्ष हैं।

सरस भावबोध का जीवन आनंदमगन होता है। रसानुभूति वाले लोग ‘रसिक’ कहे जाते हैं। संवेदनशील रसिक, रसिया या सुरसा होते हैं। सुरसा का सामान्य अर्थ सुन्दर रस है, रामकथा वाली सुरसा सु-रसा नहीं, सुर-सा है। द्रव्य में उपस्थित रस की बात प्रत्यक्ष है। श्रंगार का सम्बंध आंख से है। श्रंगार भी रस है। कहते हैं कि आंखों के माध्यम से श्रंगार रस का पान होता है। श्रंगार के देवता विष्णु हैं। श्रंगार भावोत्तेजक भी होता है, जान पड़ता है कि तब इस देवत्व का प्रभार विष्णु से कामदेव के पास चला जाता होगा। भरतमुनि ने कामदेव को हास्य का देवता जाना है। हास्य भी रस है। विष्णु भले ही जगत पालक हो पर हास्य रस के सृजन में कामदेव की ही भूमिका है। कामदेव की कृपा से ही वास्तविक हास्य है।

वात्स्यायन ने मदनोत्सव की चर्चा की है। मदन रस के देवता भी कामदेव हैं। तुलसीदास ने कामदेव की शक्ति का सजीव वर्णन किया है, “कामदेव ने अपना प्रभाव दिखाया। बसंत आ गया, तो सारी मर्यादाएं टूट गई। ते निज निज मरजाद तजि, भए सकल बस काम।” बताते हैं, “सबके हृदय मदन अभिलाषा/लता निहारि नवहिं तरूशाखा।” मदन अभिलाषा में मदन रस का प्रवाह स्वाभाविक है। लिखा है “मदन अंध व्याकुल सब लोका।” हद तो तब हो गई जब “देखि मुएहुं मन मनसिज जागा।” तुलसीदास का मन मुर्दो में भी मदन जगाकर नहीं रूका। उन्होंने इसी बात को अगले छन्द में “जागई मनोभव मुएहुं मन” दोहराया। ऋषि अथर्वा ने भी काम का स्वाभाविक वर्णन किया है। अथर्ववेद के ‘कामसूक्त’ में कहते हैं “आप सर्वत्र व्याप्त हैं। सृष्टि के हरेक जीव में है।” काम का विस्तार ही कामनाएं हैं। अथर्वा ने कविता को काम की पुत्री बताया है।

कविता सरस होती है। नीरस भी हो सकती है। लेकिन सरसता काव्य की अनिवार्यता है। कामदेव को हास्यरस का देवता मानना उचित ही है। हास्यरस मदनरस का छोटा भाई हो सकता है। हास्यरस की मर्यादा टूटी कि मदनरस का वेग आया। तब मुर्दो के मन में छुपी मदन अभिलाषा उछल पड़ती है। वात्स्यायन ने ‘कामसूत्र’ में बताया है कि “वाटिका के सघन वृक्षों की छाया में ही झूला डालना चाहिए।” वात्स्यायन की नायिका रसवन्त होगी ही। सघन वृक्षों में रस गाढ़े होते हैं। बिना रस का पेड़ न पत्तियां उगाता है और न फूल। वर्षा की रसभरी ऋतु। रस भरे वृक्ष। रस भरी झूला झूलने वाली स्त्रियां। वात्स्यायन स्वयं रसिया थे या नही? कह नहीं सकता। लेकिन रस में भी रस उड़ेलने की उनकी शैली में भी रस प्रवाह है। यद्यपि उनका दावा है कि वे विज्ञान बता रहे हैं। काम का विज्ञान ही। वे काम अति से होने वाली क्षति का भी वर्णन करते हैं।

समूचा ऋग्वेद रस भरा है। ऋग्वेद में एक पूरा मण्डल सोमरस को अर्पित है। यह रस जागृत करता है। प्रसन्न करता है, सृजन प्रेरक है। रचनाशीलता को बढ़ाता है। हम मनुष्य प्रकृति का भाग हैं। प्रकृति सरस है। हम सब भी सरस होते हैं। तैत्तिरीय उपनिषद् में रस आनंद बताया गया है। देखता हूं कि पृथ्वी वर्षारस पाकर लहकती है। हम वनस्पतियों को ‘हरी भरी’ कहते हैं। हरी कहना रंग परिचय है लेकिन हरी के साथ भरी का अर्थ रस के अलावा और क्या हो सकता है? रसिया रस अभीप्सु होते हैं तब रंगरसिया क्या होगा? रस द्रव्य के साथ भाव भी है। भावरस द्रव्य रस से बड़ा है। द्रव्य का ज्ञान आसान है और द्रव्य के रस का भी लेकिन भावरस का आनंद रसिक ही जानते हैं। ज्ञान का उद्देश्य केवल ज्ञान नहीं होता। ज्ञान, विज्ञान और दर्शन बुद्धि विलास नहीं है। अध्ययन और चिन्तन का उद्देश्य है – समग्र मानवता का हित, आनंद और वैभव। भारतीय चिन्तन में यह उद्देश्य और भी व्यापक है।

लक्ष्यविहीन ज्ञान निरर्थक है। सर्वभूतहित संलग्नता में ही सच्चा सृजन है। भरत मुनि ने नाटक का उद्देश्य मनोरंजन के साथ सदाचार ही बताया है। यहां सदाचरण की स्थापना के लिए नाटक और कथा में नायक के चरित्र चित्रण की महत्ता रही है। उच्चतर जीवन मूल्यों का वरण करने वाले नायक कहे जाते हैं। समाज उन्हें आदर देता रहा है। कवि लेखक स्वाभाविक ही उनका गुणगान करते हैं। उनकी कीर्ति से समाज में उच्चतर मूल्यों का विकास होता है। ‘रामायण’ बालकाण्ड के अनुसार कवि वाल्मीकि ने नारद से पूछा था “इस समय संसार में गुणवान, वीर, धर्मज्ञ, सत्यवादी, प्राणिमात्र के हितैषी, अनेक चरित्रों वाले, विद्वान समर्थ, धैर्यवान, क्रोध-विजयी, तेजस्वी, ईष्र्या रहित और युद्ध में क्रुद्ध होने पर देवताओं को भी भयभीत करने वाले कौन हैं?” नारद ने श्रीराम का नाम सुझाया। श्रीराम इस कसौटी पर खरे निकले। भरत मुनि ने नाट्य शास्त्र में लिखा है “जो आपत्ति या अन्य कष्ट पाकर भी पुनः अभ्युदय प्राप्त करता है और अन्य पुरूषों में श्रेष्ठ है। उसे नायक समझना चाहिए।” भरत ने नायिका के बारे में लिखा है “जो स्त्री शारीरिक सौन्दर्य व तमाम गुणों से युक्त हो। जिसका शरीर अलंकारों व पुष्पमालाओं से चमकता हो उसे नायिका बनाना चाहिए।

संवेदन प्रत्येक चेतन या जीव का स्वभाव है। संवेदनशीलता ही प्राणी को प्रकृति से जोड़ती है। शब्द अन्तस् रस को बाहर लाते हैं। लेकिन हमारे अन्तस की तरह शब्द का भी अन्तस् होता है। भरत मुनि ने शब्दार्थ पर भी रसपूर्ण बात कही है। लिखा है “रस के अभाव में शब्द का अर्थ प्रवर्तित नहीं होता – न हि रसादृते कश्चिदर्थ प्रवर्तते। प्रवर्तते का शब्दार्थ गतिशील भी हो सकता है। ऋषियों की मानें तो प्राण ही रस को प्रेरित करता है। यह प्राण ही सर्वस्व है। रस महत्वपूर्ण है। तैत्तिरीय उपनिषद् में परम चेतन को रस कहा गया है। शंकराचार्य के भाष्य में “खट्टा मीठा आदि तृप्तिदायक पदार्थ लोक में रस नाम से प्रसिद्ध हैं। इस रस को पाकर पुरूष आनंदी हो जाता है।” भरत मुनि ने लिखा है “जैसे बीज से वृक्ष उत्पन्न होता है। वृक्ष फूल और फल से लदते हैं। वैसे ही रस मूल है। सभी भाव रस से ही प्रवाहमान हैं – मूलं रसा सर्वे तेभ्यो भावा व्यवस्थिता।”

नारद भक्ति सूत्र और भरत के नाट्यशास्त्र में भाव का महत्व है। यहां भाव को सद्भाव बनाने के उद्देश्य हैं। यहां सद्भावना या सद्भाव को श्रेयस्कर माना गया है। योग और भक्ति सत्कर्म सत्भाव का प्रवाह बढ़ाते हैं। भाव संकल्प की शक्ति है। राष्ट्रभाव को लेकर दुनिया के अनेक देशभक्तों ने अपने प्राणों की आहुतियां दी हैं। प्रेम भी ज्ञान भाग नहीं है। यह भी एक गहन भाव है। नारद भक्ति सूत्र में प्रेम को भक्ति का प्रथम चरण कहा गया है। भक्ति प्रेम का परम भाव है। नारद भक्ति सूत्र में इसे अव्याख्येय और अनिवर्चनीय कहा गया है। यह प्रेम का रूपांतरण है – ‘स त्वस्मिन परम प्रेम रूपा’ है। भक्ति उस (परमसत्ता) के लिए परमप्रेम है।

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