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Statue of Equality: स्मारक सत्य शिव और सुंदर के प्रेरक हैं

Statue of Equality: भारतीय समाज में विषमता थी। जाति पांति के विभाजन भी थे। उधर वैदिक काल में उपनिषद् लिखे गए। उपनिषदों ने विषमता पर प्रहार किया। स्वामी दयानंद, विवेकानंद आदि ने सभी पर हमला बोला था। रामानुज ने भक्ति और दर्शन को समता और ममता का साधन बनाया है।

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प्रकृति सदा से है। आनंद सभी प्राणियों की आदिम अभिलाषा है। चार्ल्स डार्विन ने ‘दि ओरीजिन ऑफ दि स्पेसिस एंड दि रिजेन्टमेन्ट’ में लिखा “प्राणियों को भावोत्तेजक में आनंद आता है।” भावोत्तेजक के उपकरण प्रकृति में हैं। यहां रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्श का अविनाशी कोष है। भाव का केन्द्र मनुष्य का अंतःकरण है। भारत ने यही सब देखते, सुनते, समझते एक आनंदमगन लोकमंगल अभीप्सु जीवन दृष्टिका विकास किया। इसी का नाम भारतीय संस्कृति है। वैदिककाल और उसके पहले के पूर्वजों ने देखे गए दृश्यों व सुने गए शब्दों को स्मृति में संजोया। उन्हें एक पीढ़ी ने दूसरी पीढ़ी को सुनाया। जानना और सुनाना, सुने गए को याद करना उपिनषदों में ‘व्रत’ कहा गया। ‘श्रुति और स्मृति’ के दो महान उपकरणों के कारण भारतीय संस्कृति का प्रवाह अविच्छिन्न है। सो भारतीय संस्कृति में श्रुति और स्मृति की विशेष महत्ता है। श्रुति और वेद पर्यायवाची हैं भी। मस्तिष्क में शब्द और रूप ज्ञान का संरक्षण स्मृति है। इसका पढ़ना, लिखना, बोलना और पुनर्सृजन करना भी संस्कृति है। स्थापत्य आदि भौतिक उपायों से इसे स्मृति योग्य बनाए रखने का नाम ‘स्मारक’ है। ‘स्मारक’ सांस्कृतिक स्मृति के पुत्र हैं। स्मारक सत्य शिव और सुंदर के प्रेरक हैं। मंदिर उपासना आराधना के केन्द्र हैं। वे भी श्रुति स्मृति में रहते हैं। मंदिर भी इसी श्रेणी में आते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रेरणा से गुजरात के केवडिया में स्टैचू ऑफ यूनिटी का निर्माण स्मरणीय है। केवडिया में राष्ट्रनिर्माता सरदार पटेल की सुन्दर प्रतिमा है। यह प्रतिमा हम सबको राष्ट्रीय एकता का संदेश देती है। मैंने स्वयं उक्त प्रतिमा के दर्शन किये। यह अद्भुत है। पटेल की यह प्रतिमा उनके विचार के अनुरूप राष्ट्र निर्माण का संदेश देती है।

प्रधानमंत्री जी ने अभी पिछले सप्ताह महान संत रामानुजाचार्य की 216 फीट ऊंची प्रतिमा का अनावरण किया है। इस विशाल प्रतिमा का नाम स्टैचू ऑफ इक्वालिटी रखा गया है। रामानुजाचार्य (तेलंगाना) संत थे। उन्हीं की स्मृति में यह प्रतिमा बनाई गई है। संत की यह प्रतिमा एकता और मानवता की प्रेरक है। ग्यारहवी सदी के रामानुजाचार्य महान सामाजिक कार्यकर्ता थे। उन्होंने एकता और मानवता का संदेश आजीवन दिया। वे भारतीय दर्शन के विद्वान व प्रचारक थे। भारतीय दर्शन की एक धारा अद्वैत या वेदांत कहलाती है। वादरायण इसके प्रवर्तक थे। इसी तरह अद्वैत से मिलती जुलती लेकिन अद्वैत से भिन्न एक दार्शनिक धारा विशिष्टताद्वैत थी। इसके प्रवर्तक रामानुज थे। उनका संदेश मानवीय गरिमा व एकता से जुड़ा था। रामानुजाचार्य अपने विशिष्टताद्वैत दर्शन में ईश्वर को महत्वपूर्ण मानते थे। उनके हजारों शिष्य थे। ईश्वर और संसार, भक्ति और द्वैत तथा भक्ति और अद्वैत जैसे गूढ़ विषयो पर उनकी अनुभूति गहन थी। यह स्मारक सारी दुनिया के लिए प्रेरक होगा। इसे ठीक ही स्टेचू ऑफ इक्वालिटी कहा गया है।

Statue Of Equality
भारतीय समाज में विषमता थी। जाति पांति के विभाजन भी थे। उधर वैदिक काल में उपनिषद् लिखे गए। उपनिषदों ने विषमता पर प्रहार किया। स्वामी दयानंद, विवेकानंद आदि ने सभी पर हमला बोला था। रामानुज ने भक्ति और दर्शन को समता और ममता का साधन बनाया है। समता आज भी एक लक्ष्य है। इस लक्ष्य के लिए हमारे पूर्वज संतों ने लगातार काम किया है। रामानुज भी ईश्वर प्राप्ति के साथ परस्पर समता और प्रीति का संदेश दिया था। अब तक दस शताब्दियां बीत गई हैं। रामानुज 11वी शताब्दी में सक्रिय थे। उनके नाम पर बना स्टैचू ऑफ इक्वालिटी सारी दुनिया को प्रेरित करेगा और हम भारत के लोगों को रामानुज के व्यक्तित्व, अनुभूति और दर्शन, प्रेम और भक्ति सहित सभी मानवीय गुणों के लिए प्रेरित करता रहेगा। भारत में अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा वाले स्मारकों को भी बचाए रखने की चुनौती है। सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व के अनेक स्मारक लापता हैं। यह बात कुछ पहले संसद में भी चर्चा का विषय थी। हम भारत के लोग संस्कृति को महत्व देते हैं। संस्कृति राष्ट्रजीवन की मुख्यधारा है। संस्कृति राष्ट्रीय अखण्डता और एकता का मुख्य सूत्र है। संस्कृति को श्रुति और स्मृति में बनाए रखने के लिए अतिरिक्त सजगता की जरूरत है। प्राचीन सांस्कृतिक प्रतीको का संरक्षण और नए प्रतीकों का सृजन होना चाहिए। रामानुज की प्रतिमा का निर्माण ऐसा ही उल्लासपूर्ण सृजन है।

संस्कृति और इतिहास बहुत भिन्न नहीं हैं। इतिहास अतीत का यथातथ्य विवरण होता है। इसमें हर्ष, विषाद और प्रसाद मिले जुले होते हैं। इतिहास इसीलिए मार्गदर्शक होता है। संस्कृति इसी इतिहास का प्रसाद भाग है। इतिहास का ‘मधुमय मधुरस’ प्रवाह संस्कृति है। यह इतिहास का समग्र अनुकरणीय हिस्सा है। हम भारतवासी वास्तविक इतिहास बोध से दूर हैं। पुरातत्व में ढेर सारी सामग्री है। इस सामग्री का विवेचन और विश्लेषण भी यूरोपीय दृष्टि से किया जाता रहा है। हड़प्पा खोदाई से आर्य आक्रमण के भ्रामक नतीजे निकाले गए थे। ऋग्वेद की सभ्यता को हड़प्पा से भिन्न और परवर्ती बताया गया। भारत के प्राचीन अभिजन पूर्वज आर्य विदेशी आक्रमणकारी कहे गए। हड़प्पा सभ्यता प्राचीन सिद्ध की गई। ऋग्वैदिक कालीन सभ्यता को अविकसित पिछड़ी सभ्यता भी कहा गया। भाषा विज्ञानी क्रूरता भी अपनाई गई। संस्कृत को कल्पित भारोपीय भाषा का विस्तार बताया गया। भारोपीय भाषा का आज तक पता नहीं। बोलने वालों का भी नहीं।

स्मारक सभ्यता और संस्कृति के पुरातात्विक साक्ष्य हैं। भारत सांस्कृतिक संपदा में अग्रणी राष्ट्र है। यहां विश्व धरोहरों की सूची में अब 35 स्थल हैं। इटली यूरोपीय पुनर्जागण का केन्द्र था। इटली में 51 स्थल हैं। भारत ने 46 और स्थलों को विश्वसूची में सम्मिलित कराने का आग्रह किया है। कुम्भ को हाल में ही यूनेस्को ने विश्व विरासत सूची में सम्मिलित किया है। भारत का स्थापत्य भी अति प्राचीन है। ऋग्वेद में वरूण के घर को 100 खम्भों वाला बताया गया है। इन्हें घटाकर भी सोंचे तो वैदिक काल में खम्भों वाले घर मानने ही पड़ेंगे। यहां लाखों मंदिर, किले और सुंदर भवन, सभागार थे। महाभारत व रामायण में बड़े सभागारों व भवनों के उल्लेख हैं। पाटलिपुत्र, काशी, मथुरा, उज्जयनी संसार के प्राचीन नगर थे और अयोध्या भी। मध्यकाल में यहां विदेशी हमलावरों ने लाखों मंदिर ध्वस्त किए। संप्रति एएसआई के जिम्मे 3686 स्मारकों की जिम्मेदारी है। अनियोजित नगरीकरण व विकास ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्व के स्मारकों को लील रहा है। भारत को इन्हें हर हाल में बचाना चाहिए। सांस्कृतिक महत्व के अन्य स्मृति स्थलों की खोजबीन भी जारी रहनी चाहिए और उनके स्मारक निर्मित किए जाने चाहिए।

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