नागा शांति-वार्ता में गतिरोध की वजहें

नागा शांति-वार्ता के सफल हो जाने की स्थिति में इस संगठन और इसके स्वयम्भू नेता को अप्रासंगिक हो जाने का डर है; क्योंकि यह संगठन वास्तव में बहुसंख्यक नागा समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करता।

Avatar Written by: September 8, 2020 5:41 pm
National Socialist Council of Nagalim

नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ़ नागालिम (आईएम)  के महासचिव थुंगालेंग मुइवा की हठधर्मिता और अड़ियल रवैये के चलते एक बार फिर नागा समुदाय के साथ जारी शांति वार्ता में गतिरोध पैदा होने की आशंका पैदा हो गयी है।  दरअसल, एन.एस.सी.एन. (आईएम) और उसके सर्वसत्ताधिकारी महासचिव थुंगालेंग मुइवा की महत्वाकांक्षा और सत्ता-लालसा के चलते यह गतिरोध पैदा हो रहा है। नागालैंड में कार्यरत इस हिंसावादी सशस्त्र संगठन की अपनी भूमिगत सेना और समानांतर सरकार है। इसका नागालैंड में अपना समानांतर राज चलता है। इस संगठन को भारत-विरोधी देशों से भरपूर शह, सहयोग और समर्थन मिलता रहता है। नागा शांति-वार्ता के सफल हो जाने की स्थिति में इस संगठन और इसके स्वयम्भू नेता को अप्रासंगिक हो जाने का डर है; क्योंकि यह संगठन वास्तव में बहुसंख्यक नागा समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करता। अपनी सशस्त्रसेना और अन्यान्य हथकंडों के कारण यह संगठन यह सन्देश देने में जरूर सफल रहा है कि वही सम्पूर्ण नागा समुदाय का एकमात्र प्रतिनिधि संगठन है और वही नागाओं के हितों का सबसे बड़ा संरक्षक है।

Thuingaleng Muivah

किन्तु ध्यान पूर्वक देखने से पता चलेगा कि यह संगठन नागाओं में अत्यन्त अल्पसंख्यक मणिपुर के तन्ग्खुल समुदाय का ही प्रतिनिधित्व करता है। न सिर्फ इस संगठन के सर्वेसर्वा मुइवा स्वयं इसी समुदाय से आते हैं, बल्कि समस्त नागाओं का प्रतिनिधि संगठन होने का दम भरने वाले इस संगठन के अधिकांश महत्वपूर्ण पदों पर तन्ग्खुल समुदाय के लोग ही काबिज हैं। शांति-वार्ता के सफल होने और पूरे नागालैंड में लोकतान्त्रिक प्रक्रिया बहाल हो जाने की स्थिति में इन्हें अपने  “अप्रासंगिक” हो जाने का खतरा शांति-वार्ता में गतिरोध पैदा करने को विवश करता प्रतीत हो रहा है। नागा हितों की आड़ में स्वयं अपने और तन्ग्खुल समुदाय के वर्चस्व को बनाये /बचाए रखना इनकी मूल चिंता है। यदि भारत सरकार और शांति-वार्ताकार और नागालैंड के राज्यपाल आर एन रवि ने सूझबूझ से काम लिया तो इस बार इन्हें सफलता हाथ नहीं लगेगी क्योंकि नागाओं के बहुत बड़ी आबादी इनके वास्तविक मंसूबों और हथकंडों को समझने लगी है।  साथ ही, दो-तीन दशक से इस संगठन द्वारा की गयी हिंसा, डर और दहशत से बाहर निकलकर अपनी आकांक्षाओं और सपनों को स्वयं अभिव्यक्त करना चाहती है।

मगर यह चिंता की बात तो है ही कि व्यक्ति-विशेष (थुंगालेंग मुइवा) ने अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए एक बार फिर शांति वार्ता में पलीता लगाने का षड्यंत्र शुरू कर दिया है। ठीक ऐसा ही इस व्यक्ति ने सन 1966 में नागा समस्या के समाधान के समय भी किया था।  भारत के भगोड़े फीज़ो ने ब्रिटेन में शरण लेकर सन 1965 में मणिपुर के तन्खुल समुदाय के मुइवा को नागा नेशनल कौंसिल (NNC) का महासचिव बना दिया था। फीज़ो की अनुपस्थिति और उसके अटूट विश्वास का भरपूर लाभ लेते हुए मुइवा ने अपनी स्थिति को बहुत जल्दी और बहुत मजबूत कर लिया था। सन 1966 में होने वाले शांति-समझौते के समय सेमा और अंगामी जैसे दो बड़े समुदायों में आपसी फूट और अविश्वास पैदा करके उसने शांति-वार्ता को विफल करा दिया था।  सन 1979 तक भूमिगत नागा सेना को क्रमशः अपने प्रभाव में लेकर और NNC में तख्ता पलट करते हुए उसने सत्ता हथिया ली।  सन 1980 में इस महत्वाकांक्षी व्यक्ति ने नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ़ नागालिम का गठन करके अपने  ‘गॉडफादर’ रहे फीज़ो को भी किनारे कर दिया था।

National Socialist Council of Nagalim

थुंगालेंग मुइवा के संगठन NSCN(।M) ने अब एक बार फिर अपनी पुरानी मांग को आगे किया है। यह संगठन अब एक बार फिर नागालैंड के लिए अलग झंडे और अलग संविधान की मांग कर रहा है। वास्तव में यह मांग भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता को सीधी चुनौती देने जैसा है। 5 अगस्त, 2019 को जिस मोदी सरकार ने आज़ादी के समय से चले आ रहे जम्मू-कश्मीर के अलग झंडे और अलग कानून को समाप्त करके राष्ट्रीय एकीकरण के स्वप्न को साकार किया है; वह भला देश तोड़ने की ऐसी अलगाववादी मांग को कैसे मान सकती है। यह संगठन और इसका अतिमहत्वाकांक्षी और धूर्त नेता मुइवा भी इस बात को अच्छी तरह जानता है कि भारत सरकार इस मांग को कभी नहीं मानेगी। परन्तु उसने यह मांग दबाव बनाने और अपने लिए अधिक से अधिक सुविधाएं और  ‘विशेषाधिकार’ प्राप्त करने केलिए रखी है। या तो सरकार उसकी नाजायज मांगों को मानेगी या शांति-वार्ता में गतिरोध पैदा हो जायेगा और वह अंततः टूट जायेगी। दोनों ही स्थितियों में यह संगठन अपना फायदा देख रहा है। वस्तुतः मुइवा दोनों हाथों में लड्डू रखना चाहता है। आम नागा के हितों और विकास से उसका कुछ भी लेना-देना नहीं है। इसी प्रकार उसने शांति-वार्ताकार श्री आर एन रवि को बदलने की भी मांग की है, क्योंकि वे इस संगठन के अलावा नागाओं के अन्य प्रतिनिधि संगठनों को भी वार्ता के दायरे में शामिल करने की पहल की है। साथ ही, उन्होंने भूमिगत संगठनों द्वारा की जानेवाली गैरकानूनी वसूली और अन्य गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए स्थानीय सरकार पर दबाव बनाया है। ऐसा करने से एन.एस.सी.एन. (आईएम) का एकाधिकार और वर्चस्व खतरे में पड़ता है। इसलिए पुनः जंगलों में लौटने की गीदड़-भभकी के साथ-साथ छिट –पुट संगठनों से प्रायोजित आन्दोलन, प्रदर्शन, बयानबाजी भी करायी जा रही है।

National Socialist Council of Nagalim

शांति-वार्ता के लम्बा खिंचने की स्थिति में युद्ध-विराम जारी रहेगा जिसका फायदा उठाकर यह संगठन न सिर्फ खुद को पुनः संगठित और मजबूत करना चाहता है; बल्कि अपनी लेवी (वसूली) आदि गैर-क़ानूनी गतिविधियों का भी निर्विघ्न संचालन करते रहना चाहता है। वह गतिरोध की समयावधि का उपयोग अन्य नागा संगठनों और शांतिपूर्ण ढंग से समाधान चाहने वाले नागा समूहों को ठिकाने लगाने या किनारे करने के लिए भी करना चाहता है। अन्य नागा संगठनों (जिनमें से कई सशस्त्र संगठन भी हैं)  को केंद्र की अलग-अलग सरकारों ने लगातार उपेक्षित किया है, क्योंकि उनकी हिंसात्मक और विनाशक शक्ति एन.एस.सी.एन.(आईएम) जितनी नहीं है। हालांकि, वे बड़े नागा समुदायों और बहुसंख्यक नागाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। केंद्र सरकार को इस सत्य को स्वीकार करने की आवश्यकता है कि शांति-वार्ता के फलागम को चिरस्थायी और व्यापक बनाने के लिए सभी स्टेक होल्डर्स की भागीदारी आवश्यक है। कहावत है कि जो फेरी वाला जितनी जोर से आवाज़ लगाता है, उसका सामान उतना ही ज्यादा बिकता है। मुइवा और उसके संगठन ने इस कहावत का सर्वाधिक दोहन किया है।

National Socialist Council of Nagalim

नागालैंड में 14  नागा समुदाय निवास करते हैं। नागालैंड में रहने वाले इन नागाओं की संख्या उनकी कुल जनसंख्या का 80 प्रतिशत है। इन अलग-अलग समुदायों के अपने बहुत से सक्रिय और सशक्त संगठन हैं। वे समुदाय विशेष के विशिष्ट इतिहास,  सांस्कृतिक वैशिष्ट्य और आशा-आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। नागालैंड गांव बूढ़ा फेडरेशन (जो कि नागालैंड के 14 नागा समुदायों के गांव प्रमुखों की सर्वोच्च संस्था है) ने निडरतापूर्वक आगे आकर केंद्र सरकार से अपील की है कि नागा समस्या के समाधान में ‘अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने वाले’ चरमपंथी संगठन एनएससीएन (आईएम) को आवश्यकता से अधिक महत्व न दिया जाये और नागा समुदाय के अन्य प्रतिनिधि संगठनों की भी सुनवाई की जाये। नागा समुदायों के बीच मणिपुर के तन्ग्खुल समुदाय के वर्चस्व वाले संगठन एन.एस.सी.एन. (आईएम) की विश्वसनीयता में क्रमशः गिरावट आयी है। हालांकि,  इस समुदाय के प्रति अविश्वास और प्रतिद्वंद्विता का इतिहास बहुत पुराना है । आपसी भरोसे और एकता में कमी का मूल कारण मुइवा की पृष्ठभूमि, उसकी कार्यशैली और एन.एन.सी. और एन.एस.सी.एन. के शीर्ष पर पहुंचने के लिए उस के द्वारा बहाया गया अपने ही नागा भाइयों का खून है। एक और वजह इस संगठन में अन्य नागा समुदायों की उपेक्षा और दोयम स्थिति है। इस संगठन के प्रति उपजी घृणा की जड़ में इसकी धौंस-पट्टी और हिंसा के बल पर दूसरे समूहों और समुदायों की आवाज़ को दबाने की प्रवृत्ति भी है। एन.एस.सी.एन. पर काबिज तन्ग्खुल नेतृत्व के प्रति घृणा, अविश्वास और अस्वीकार्यता का आलम यह है कि उसके कैडर और कॉलोनियों पर अनेक बार सेमा, लोथा, अंगामी, आओ आदि समुदायों द्वारा घातक हमले किये गए हैं। ये हमले विश्वसनीयता की कमी और घृणा का ही प्रतिफल हैं। अन्य नागा समुदायों और संगठनों में इस संगठन के प्रति आक्रोश और असंतोष का भाव इसलिए भी है क्योंकि इसने अपनी हिंसक कार्रवाइयों की वजह से देश और दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करके स्वयं को समस्त नागाओं का प्रतिनिधि और संरक्षक संगठन प्रचारित कर रखा है, जबकि वास्तविकता ऐसी नहीं है।

इसमें दो राय नहीं कि एन.एस.सी.एन.(आईएम) सर्वाधिक कुख्यात, हिंसक और उग्रसंगठन है। किन्तु वही नागाओं का एकमात्र प्रतिनिधि संगठन नहीं है। वह व्यापक नागा जनाकांक्षाओं की आवाज़ भी नहीं है।  यूं भी इस संगठन का मुखिया मुइवा एक भरोसेमंद और नागाहितों के लिए समर्पित व्यक्ति नहीं है। उसकी विश्वसनीयता संदिग्ध है। उसकी पहली प्राथमिकता स्वहित है। पिछले तीन दशक में उसने अलग-अलग अवसरों पर अलग-अलग बहानों से शांति-प्रयासों को पलीता लगाया है, ताकि अपना महत्व बनाये रखकर अपनी स्वार्थ-सिद्धि करता रह सके।  इस बार की उसकी चाल नयी नहीं है। लेकिन यह भी सच है कि नागा लोगों को बरगलाने, भड़काने, डराने और दुष्प्रचार करने की कला में भी यह संगठन और इसका मुखिया सिद्धहस्त हैं।  भारत सरकार और शांति-वार्ताकार आर एन रवि को उपरोक्त सभी बातों को ध्यान में रखते हुए शांति-प्रयास जारी रखने की आवश्यकता है।  उल्लेखनीय यह भी है कि अब नागालैंड की आम जनता, ख़ासकर युवा पीढ़ी अनवरत संघर्ष और हिंसा से मुक्ति चाहती है और विकास और बदलाव चाहती है। वह उसी संगठन का साथ देगी जो समाधान की दिशा में कदम बढ़ाएगा और उनके सपनों को साकार करने की जमीन तैयार करेगा।

(इस लेख के लेखक प्रो. रसाल सिंह हैं जो जम्मू केन्द्रीय विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर और अधिष्ठाता, छात्र कल्याण हैं, लेख में व्यक्त सारे विचार लेखक के निजी हैं ।)