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राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के अवसर पर उत्तर की राह देखते कुछ प्रश्न

National Science Day 2022: सुप्रसिद्ध लेखक मनोज सिंह अपनी पुस्तक Sanatan dharma vaidik gateway to the next century (Bloomsbury India) में स्टीफन हाकिंग से कुछ प्रश्न पूछते हैं जिनपर आज विचार करना आवश्यक है।

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आज 28 फरवरी है और देश राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मना रहा है। भारत रत्न और नोबेल पुरस्कार विजेता सर सीवी रमण की याद में पूरे देश में आज अनेक कार्यक्रम होंगे।पिछले कल ही देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपनी मन की बात में राष्ट्रीय विज्ञान दिवस का उल्लेख किया है। विज्ञान क्षण-क्षण प्रगति कर रहा है, सुविधाओं के नाम पर अनेक चीजें मार्केट में है। वैज्ञानिक उन्नति से लोगों के जीवन में अनेक परिवर्तन आये हैं। लेकिन ये भी सच है कि मानव जीवन में विज्ञान के कारण उथल पुथल भी बहुत हुई है। आज के दिन कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर चर्चा करना आवश्यक है। भले ही लोग इस पर बात करें या न करें लेकिन क्या यह सच नहीं है कि हर साल विश्व पर्यावरण दिवस पर हम सब देखते हैं कि दुनियाभर में पर्यावरण बचाने के आह्वान को लेकर अनेक कार्यक्रम बड़े बड़े एयर कंडीशनरलगे हॉल्स में होते हैं?एयर कंडीशनर लगे कमरों से लोग ट्वीट करते हैं या पोस्ट लिखते हैं या फिर वीडियो बनाते हैं कि पर्यावरण बचाइये?एयर कंडीशनरचलाकर पर्यवारण बचाना, यह कैसे संभव है? क्या एयर कंडीशनर पर्यावरण प्रदूषित नहीं करते?क्या पर्यावरण को बिगाड़ने में विज्ञान का कोई हाथ नहीं है? क्या ये सच नहीं है प्रकृति और विज्ञान में समन्वय होना चाहिए? क्या यह सच नहीं है कि आज विज्ञान के इस युग में प्रकृति और विज्ञान में संघर्ष चल रहा है?

आखिर ऐसी क्या गड़बड़ हो गई की स्टीफन हाकिंग जैसे वैज्ञानिक को यह बोलना पड़ा कि Humans Have 100 Years to Move to Another Planet या फिरit’s time to get the hell off planet Earth या फिर Stephen Hawking says humans must colonize another planet in 100 years or face extinction.स्टीफन हाकिंग की जैसी ही बात अलोन मस्क भी करते नज़र आये। सुप्रसिद्ध लेखक मनोज सिंह अपनी पुस्तक Sanatan dharma vaidik gateway to the next century (Bloomsbury India) में स्टीफन हाकिंग से कुछ प्रश्न पूछते हैं जिनपर आज विचार करना आवश्यक है। मनोज सिंह लिखते हैं,”क्या हॉकिंग इस बात को इस तरह से नहीं कह सकते थे कि विज्ञान और बाजार ने पृथ्वी को रहने लायक नहीं छोड़ा है?…। बहरहाल, वैज्ञानिक महोदय (स्टीफन हॉकिंग) ने अपनी सभ्यता दूसरे ग्रहों पर शिफ्ट करते समय यह स्पष्ट नहीं किया है कि उनका आशय सिर्फ मानव से है या या पूरी प्रकृति से? अगर उनका मतलब प्रकृति की सभ्यता से है, तो निश्चित रूप से इसे स्थानांतरित नहीं किया जा सकता है।

तो, ज़ाहिर है, उनका मतलब केवल मानव से ही होगा। यह कैसी स्वार्थी मानसिकता और संकीर्ण सोच है? यही मूल फर्क है विज्ञान की संस्कृति-आधुनिक सभ्यता और सनातन संस्कृति -वैदिक सभ्यता के बीच। सनातन जीवनदर्शन समस्त जीवों का ध्यान रखता है और ब्रह्म के साथ ब्रह्माण्ड की बात करता है। वैसे वैज्ञानिक महोदय, क्या आप इतना भी नहीं जानते कि मानव का अकेले अस्तित्व सम्भव नहीं।

क्या अपनी जड़ें सनातन धर्म में देखने वाले भारतीयों को मनोज सिंह के प्रश्नों पर आज के दिन विचार नहीं करना चाहिए?

दूसरा बिंदु मेडिकल साइंस से जुड़ा हुआ है। क्या ये सच नहीं है कि आज से 40-50 साल पहले देश में बीमारियां कम थी? क्या ये सच नहीं है कि आज भी पुरानी पीढ़ी के लोग स्वस्थ एवं जिन्दा है जिनकी आयु 90-110 वर्ष के बीच है? क्या ये सच नहीं है कि पुरानी पीढ़ी के इन लोगों में अधिकांश के दांत, कान, आंख आज भी सही काम करते हैं? और क्या ये सच नहीं है कि आजकल 3 साल के बच्चे को चश्मा लग रहा है? क्या ये सच नहीं है कि आज हर व्यक्ति किसी न किसी रोग से पीड़ित है? क्या ये सच नहीं है की हर व्यक्ति कोई न कोई दवा खा रहा है? और क्या ये भयंकर सत्य नहीं है कि बेहतर चिकित्सा सुविधा के नाम पर हर साल हॉस्पिटलों, चिकित्सकों, दवाईयों की संख्या बढ़ रही है? अब क्या यह प्रश्न नहीं उठना चाहिए कि यदि हॉस्पिटलों, चिकित्सकों और दवाईयों में वृद्धि हो रही है तो रोगों और रोगियों की संख्या कम होनी चाहिए? आखिर औसत आयु दर कम क्यों हो गयी? क्या इसका अर्थ यह निकाला जाए कि भारत की प्राचीन वैज्ञानिक स्वास्थ्य परम्पराएं और चिकित्सा पद्धति आज की तुलना में श्रेष्ठ थी? तभी तो लोग आज की तुलना में कहीं अधिक स्वस्थ और दीर्घायु होते थे।
वास्तव में हमारे शरीर का स्वस्थ रहना मुख्य रूप से हमारी जीवन शैली, आहार और वातवरण पर निर्भर करता है। और यह शाश्वत सत्य है कि आज का विज्ञान इन तीनों को बहुत अधिक प्रभावित करता है। क्योंकि दैनिक उपयोग की हर वस्तु लगभग वैज्ञानिक तरीकों से ही बन रही है। इस आधुनिक विज्ञान आधारित जीवन शैली में प्रकृति से निशुल्क मिलने वाली स्वास्थ्यवर्धक वस्तुएं भी आज बिजनेस बन चुकी हैं। क्या ये सच नहीं है कि आज के विज्ञान ने मनुष्य को कंज्यूमर बनाकर रख दिया है? क्या इस बात को नाकारा जा सकता है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कारण मनुष्य की सोचने की क्षमता पर दुष्प्रभाव पड़ा है?

क्या भारत के लोग यह नही जानते हैं कि प्राचीन समय से भारत में औषधि के रूप में प्रचलित हल्दी वाला दूध आज विदेशों में turmeric latte बन चुका है? क्या भारतीय जानते हैं कि वैदिक काल से चलने वाला अनुलोम विलोम प्राणायाम को विदेशी cardiac coherence breathing के नाम पर बेच रहे हैं? क्या भारतीय जानते हैं की संस्कृत पढने का दिमाग पर पड़ने वाले प्रभाव पर अनेकों शोध पत्र विदेशी छाप रहे हैं? क्या ये सच नहीं है कि कोरोना काल में विदेशों में भारतीय मसालों की मांग बढ़ी है? और अंत में क्या राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के उपलक्ष्य पर भारत सरकार और भारतीय वैज्ञानिक समुदाय को भारत के प्राचीन विज्ञान आधारित शोध पर विशेष ध्यान नहीं देना चाहिए? ताकि ‘राष्ट्रीय विज्ञान दिवस 2022 की थीम ‘दीर्घकालिक भविष्य के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी में एकीकृत दृष्टिकोण चरितार्थ होसके और आधुनिक विज्ञान धरती छोड़कर किसी दूसरे ग्रह पर जाने की बात न करे।

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