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अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस: क्या मातृभाषा या फिर राष्ट्रभाषा के बिना भारत विश्वगुरु या वैश्विक महाशक्ति बन पाएगा?

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस: अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने की घोषणा यूनेस्कोद्वारा वर्ष 1999 में की गई थी और वर्ष 2000 में पहली बार 21 फरवरी के दिन को “अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस” के रूप में मनाया गया था। यूनेस्को के अनुसार भाषा और बहुभाषावाद समावेश को आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

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नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र 21 फरवरी को “अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस” मनाता है साधारणतः लोगों को यह पता ही नहीं होता है। सोशल मीडिया के इस युग को धन्यवाद कि अब हर घटनाक्रम सार्वजनिक हो जाता है। मातृभाषा का अर्थ कदाचित मां से बच्चे को मिलने वाला भाषा ज्ञान नहीं होता है बल्कि शिशु का पालन पोषण जिस परिवेश में होता है उस परिवेश की भाषा को मातृभाषा शब्द से इंगित किया जाता है। आम तौर पर मातृभाषा को लेकर जो धारणा है वह यह है की बच्चे को मां से जो भाषा ज्ञान मिलता है वह मातृभाषा है। मुझे इस धारणा में थोड़ा अधूरापन दिखता है। कारण अकेली मां ही बच्चे के जन्म के लिए उत्तरदायी नहीं होती, पिता की भी भूमिका होती है। इसके साथ ही परिवेश की भी भूमिका होती है। यदि मान लिया जाए की मातृभाषा का अर्थ मां जो भाषा बोलती है वही होता है तो फिर क्या इसका अर्थ यह हुआ कि यदि माता पिता की भाषा संबंधी पृष्ठभूमि अलग अलग है तो बच्चा केवल वही भाषा बोलेगा जो माता बोलती है? मुझे लगता है ऐसा होना निश्चित नहीं है। कदाचित मातृभाषा का अर्थ परिवेश में प्रचलित भाषा ही होता है। मातृभाषा हर व्यक्ति के लिए गर्व की वस्तु होती है। मातृभाषा सीखने के लिए व्यक्ति को किसी पाठशाला या कक्षा की जरुरत नहीं पड़ती बल्कि स्वत: ही बच्चे को परिजनों द्वारा नैसर्गिक रूप से उपहार में मिलती है। जन्म लेने के बाद बच्चा सबसे पहले जिस भाषा को सीखता है कदाचित उसे ही उसकी मातृभाषा कहा जाता है। मातृभाषा किसी भी देश या समाज के लिए उसकी पहचान की तरह होती है। उस देश या राष्ट्र का दायित्व है कि वह अपनी मातृभाषा का संरक्षण और संवर्धन करे। भारत के परिप्रेक्ष्य में कहा जाए तो यहां पर थोड़ी सी दूरी के बाद ही भाषा बदल जाती है, हमें भाषा का ‘बोलियां’ स्वरुप दिखता है। हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा जरुर है लेकिन इसके साथ ही स्थानीय बोलियों का अपना एक विशिष्ट महत्व है।

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस

आज  21 फरवरी है और विश्व भर में “अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस” मनाया जा रहा है। आम तौर पर लोगों को पता नहीं होता कि यह दिवस क्यों मनाया जाता है? इस प्रश्न का सरल सा उत्तर है विश्व भर में अपनी भाषा-संस्कृतिके प्रति लोगों में भाव निर्माण करना और जागरुकता का प्रसार करना। अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने की घोषणा यूनेस्को द्वारा वर्ष 1999 में की गई थी और वर्ष 2000 में पहली बार 21 फरवरी के दिन को “अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस” के रूप में मनाया गया था। यूनेस्को के अनुसार भाषा और बहुभाषावाद समावेश को आगे बढ़ाया जाना चाहिए। हम प्रायः सुनते रहते है कि बच्चे की प्रारम्भिक शिक्षा उसकी प्रथम भाषा या मातृभाषा में होनी चाहिए क्योंकि यही भाषा सीखने की नींव होती है। यूनेस्कों लोगों को एक से अधिक भाषा सीखने और उपयोग करने के साथ साथ अपनी मातृ भाषा के बारे में अपने ज्ञान को बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित करता है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार मातृ भाषा का महत्व समझना है तो वह कहता है कि दुनिया में हर दो सप्ताह में एक भाषा गायब हो जाती है, जिसके कारण सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत नष्ट हो जाती है। इसलिए सभी भाषाओं का संरक्षण और संवर्धन अत्यावश्यक है क्योंकि यह ज्ञान, शांति, अधिकार और विविधता के भाव को बनाये रखती हैं। इस दिन दुनिया भर में मातृभाषा के सम्मान को लेकर अनेक आयोजन होते हैं। इतिहास पर दृष्टि दौड़ाएं तो हमें पता चलता है कि अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के आयोजन का श्रेय भारत के पड़ोसी देश बांग्लादेश को जाता है।

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का इतिहास

हम जानते हैं कि बांग्लादेश जिसकी भाषा बांग्ला थी, सन 1971 के पहले तक पाकिस्तान का भाग था और इसे पूर्वी पाकिस्तान के नाम से जाना जाता था।लेकिन पाकिस्तान ने तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) पर उर्दू थोप दी थी। सन 1948 में पाकिस्तान की संविधान सभा में उर्दू को राजभाषा घोषित किया था। लेकिन उस समय पूर्वी पाकिस्तान के बांग्ला सदस्यों ने इस निर्णय का कड़ा विरोध किया था लेकिन उनकी बात अनसुनी कर दी गईं थी। इसके परिणामस्वरूप सन1952में मातृभाषा के अस्तित्व को यथावत बनाये रखने को लेकर सम्पूर्ण पूर्वी पाकिस्तान में आंदोलन भड़क उठा। इस आंदोलन में ढाका विश्वविद्यालय के छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उग्र आंदोलन किया। इस आंदोलन के तहत हुए एक प्रदर्शन में पाकिस्तानी फौज ने गोलियां बरसाईं जिसके कारण 21 फरवरी सन 1952 को पांच लोगों की मृत्यु हो गयी थी। बांग्लादेश में इन पांच लोगों की स्मृति में तभी से 21 फरवरी का दिन मातृभाषा-दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। सन 1971 में भारत के प्रयासों से बांग्लादेश के निर्माण के बाद यह मांग निरंतर उठती रही कि मातृभाषा-दिवस को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता दिलवाई जाए। शेख हसीना के नेतृत्व में बांग्लादेश सरकार ने वर्ष 1999 में यूनेस्को से 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस घोषित करवा लिया। पहली बार वर्ष 2000 में दुनिया भर में अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया गया।

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर भाषा संबंधी कुछ महत्वपूर्ण तथ्य

दुनिया में इस समय लगभग 7000 से ज्यादा मातृभाषाएं और स्थानीय बोलियां प्रचलित हैं। ऐसी भी अनेक भाषाएं या बोलियां हैं जिनकी न तो कोई लिपि है न ही कोई व्याकरण है, इनमें पुस्तकें भी प्रकाशित नहीं होती हैं और न ही कोई अखबार आदि भी प्रकाशित होता है। लेकिन ये भी सत्य है कि इस सबके बाबजूद वे सभी भाषाएं या बोलियां अभी जीवंत हैं और प्रचलन में हैं। अधिकांश रिपोर्टों के आधार पर और 1961 की जनगणना के अनुसार भारत में 1652 भाषाएं प्रचलन में हैं।

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का महत्व तब बढ़ जाता है जब हमें पता चलता है कि संयुक्त राष्ट्र के अनुसार कि हर दो सप्ताह में एक भाषा अपनी सम्पूर्ण सांस्कृतिक और बौद्धिक धरोहर के साथ विलुप्त हो जाती है। वहीं एक चिंताजनक आंकड़ा यह भी है दुनियाभर में प्रचलित लगभग 7000 से अधिक भाषाओं में से लगभग 43 % भाषाओं पर गायब होने का खतरा मंडरा रहा हैं। इनमें से केवल कुछ सौ भाषाओं का उपयोग वास्तव में शिक्षा प्रणालियों और सार्वजनिक क्षेत्र में किया जाता है। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि डिजिटल दुनिया में सौ से भी कम का उपयोग किया जाता है। वैश्विक स्तर पर मातृभाषा का उपयोग अभी भी शिक्षा ग्रहण करने के लिए नहीं होता है। वहीं यह भी कड़वा सत्य है कि अंग्रेजी भाषाका संचार के लिए दुनिया भर एकछत्र राज है। जिसे कदाचित भाषा संबंधी विविधता और वैशिष्ट्य के लिए गंभीर खतरा माना जाना चाहिए। अंग्रेजी भाषा सीखने में कोई बुराई नहीं है।  लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं होना चाहिए कि इसके कारण अन्य भाषाओं का अस्तित्व ही खत्म कर दिया जाए।

क्या मातृभाषा या फिर राष्ट्रभाषा के बिना भारत विश्वगुरु या वैश्विक महाशक्ति बन पाएगा?

आज के दिन हमें मातिभाषाओं की वर्तमान अवस्था पर विचार करना चाहिए। बाकी दुनिया में क्या चल रहा है यूनेस्कों के दो सप्ताह वाले ब्यान से हमें पता चल जाता है। यदि हम बात करे दक्षिण एशिया कि तो यह प्रश्न उठत्ता है कि भूटान और नेपाल के आलावा कौन सा पडोसी देश है, जहां उसकी मातृभाषा अथवा राष्ट्रभाषा का परचम लहरा रहा है? आज शायद नेपाल और भूटान में ही उनकी मातृभाषाओं में उनके अधिकांश काम होते हैं। मैंने स्वयं नेपाल में देखा है क्योंकि मेरे ससुराल वहां हैं। इसी कारण इन देशों के लोगों को अपनी भाषा, संस्कृति और जीवन-पद्धति पर गर्व भी है। जहां तक भाषा संबंधी भारत की बात आती है तो कहने को तो भारत में हिंदी को राष्ट्रभाषा की उपाधि प्राप्त है लेकिन उसके साथ यहां बहुत हीं निम्न दर्जे का वर्ताव होता है। भारत में हिंदी की अवस्था कैसी है इसका अंदाजा आप यहां से लगा सकते हैं कि संसद की अधिकांश कार्यवाही अंग्रेजी में ही होती है। कुछ दिन पहले ही कांग्रेसी सांसद शशि थरूर द्वारा केंद्रीय मंत्री ज्योतिराजे सिंधिया को हिंदी भाषा में बोलने पर आपत्ति दर्ज कराई गयी थी। आज भी कानून अंग्रेजी में बनते हैं, न्यायालयों की प्रक्रिया अंग्रेजी में होती है। हिंदी या अन्य मातृ भाषायें तभी सुनने में आती हैं जब लोगों को अंग्रेजी भाषा नहीं आती है। बल्कि अब तो हिंगलिश का भी प्रचलन शुरू हो गया है। स्थिति इतनी बिगड़ गयी है कि यदि आज के बच्चों के चौहत्तर लिखने को बोल दिया जाए तो वे आसमान देखने लगते हैं। मैं अंग्रेजी विरोधी नहीं हूं परन्तु अंग्रेजी सीखने का अर्थ मातृभाषा या राष्ट्रभाषा का विलुप्त होना नहीं होता।

मुझे लगता है कि अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने  का अर्थ यह नहीं है कि लोग अन्य भाषाओं सीखना बंद कर दें। वे सभी भाषाएं सीखे लेकिन अपनी मातृभाषा और राष्ट्रभाषा अपरिहार्य रूप से सीखें। और जहां तक विदेशी भाषाओं का प्रश्न है, उन्हें भी आवश्यकतानुसार सीखना चाहिए। उनका उपयोग वैश्विक स्तर पर व्यापार, डिप्लोमेसी और अनुसंधान आदि के लिए आवश्यक है। लेकिन यहां यह भी ध्यान देना आवश्यक है कि इन तीनों उद्यमों (व्यापार, डिप्लोमेसी और अनुसंधान) में देश में कितने प्रतिशत लोग कार्यरत हैं ? इस प्रश्न का उत्तर यदि ढूंढेंगे तो पता चलेगा बहुत कम लोग। यह संख्या मुश्किल में लाखों में होगी। दूसरी तरफ यदि हम भारत की जनसंख्या के आंकड़ों को देखें तो ये लगभग 130 करोड़ को पार चुका है। अब प्रश्न उठता है कि क्या 100 करोड़ से अधिक लोगों पर अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषा को थोपना कितना सही है? मैकाले ने तो साफ़ साफ कहा था कि उनके अंग्रेजी स्कूलों का उद्देश्य ब्रिटिश शासन के गुलाम तैयार करना है। दूसरे यह बात भी सत्य है कि भारत के शिक्षा जगत में अंग्रेजी भाषा की अनिवार्यता के कारण हर साल करोड़ों की संख्या में विद्यार्थी परीक्षाओं में अनुत्तीर्ण होते हैं। क्या इसके कारण उनका मनोबल नहीं गिरता है? क्या इससे उनका भविष्य प्रभावित नही होता? क्या हर साल परीक्षा परिणाम आते हैं तो बच्चों द्वारा आत्महत्या के समाचार हम नहीं पढ़ते या सुनते? क्या भारत में टॉक इंग्लिश वॉक इंग्लिश संस्कृति की आवश्यकता है? दूसरे प्रश्न यह भी उठता है कि पूरी दुनिया में ब्रिटेन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की और आधे कनाडा के आलावा (आधा कनाडा फ्रांसीसी बोलता है) अंग्रेजी भाषा का वर्चश्व कहां हैं? दुनिया की महाशक्तियां कहलाने वाले देश चीन, फ्रांस, जर्मनी, जापान, यहां तक कि इटली जैसे देशों में सारा महत्वपूर्ण काम उनकी अपनी भाषा में ही होता है। तो फिर भारत में ऐसा करने में क्या समस्या है? वैश्विक इतिहास पर दृष्टि डालें तो पता चलता है कि कोई भी देश आज तक विदेशी भाषा के बल पर महाशक्ति नहीं बना है। इसका श्रेय केवल और केवल मातृभाषा या उस देश की राष्ट्रभाषा को जाता है। लेकिन भारत के साथ मामला उल्टा है। यहां हर जगह अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषा का प्रभुत्व है। परिस्थिति इतनी गंभीर है कि संस्कृत में मंत्रिपद की शपथ लेने वाले प्रताप सारंगी जैसे मातृभाषा के पैरोकार के ट्वीट भी अंग्रेजी में आते हैं। बच्चों को ‘हाथ’ शब्द सीखाने की जगह ‘हैँण्डू’ और ‘नाक’ की जगह ‘नोजू’ सिखाया जाता है। दूसरा बड़ा प्रश्न उठता है कि क्या हम अंग्रेजी भाषा का उपयोग फ्रांस,जर्मनी, चीन, रूस और जापान जैसे देशों के साथ कर सकते हैं?  क्या हम अंग्रेजी के उपयोग से इन देशों के साथ व्यापार, डिप्लोमेसी और अनुसंधान कार्यों में पूरा लाभ उठा सकते हैं? यदि हां तब अच्छी बात है लेकिन यदि न तो फिर अंग्रेजी को इतना महत्व क्यों?

क्या इस देश के नीति निर्धारकों और सरकारोंको यह नहीं लगता है कि इस अंग्रेजी भाषा के कारण देश में मौलिकता और संस्कृति का कितना क्षय (हानि) हुआ है। क्या भारत आज भी अंग्रेजी की कॉलोनी नहीं है? सुप्रसिद्ध पुस्तक “डिकोलोनाईजिंग डी माइंड” में केन्या के सुप्रसिद्ध लेखक थियोंगो लिखते हैं, “सांस्कृतिक बम सबसे बड़ा शस्त्र है जो दिन प्रतिदिन छोड़ा और चलाया जाता है, संस्कृति बम का प्रभाव लोगों के अपने नाम, भाषा, वातावरण, संघर्ष, परम्परा अपनी एकता अपनी क्षमताओं और अंततः अपना अपनत्व सब कुछ समाप्त कर देता है।” क्या अंग्रेजी भाषा थियोंगो के अनुसार सांस्कृतिक बम के लिए उत्प्रेरक नहीं है? क्या ये सच नहीं है कि इस अंग्रेजी की अनिवार्यता के कारण अधिकांश भारत के लोग नकलची बन गयें हैं? यह सत्य है कि भारत के मुट्ठी भर लोगों की उन्नति में अंग्रेजी भाषा का योगदान है लेकिन क्या यह सत्य नहीं है कि भारत की 100 करोड़ से भी अधिक गरीब, पिछडी, ग्रामीण, मजदूर वर्ग और वंचित वर्ग  का उद्धार अंग्रेजी से नहीं हो सकता? मुझे लगता है कि यह विशाल कार्य मातृभाषा या राष्ट्रभाषा के बिना नहीं हो सकता है। अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के इस उपलक्ष्य पर आईये आज चिंतन करते हैं कि क्या मातृभाषा या स्वभाषा या फिर राष्ट्रभाषा हिंदी के बिना भारत विश्वगुरु या वैश्विक महाशक्ति बन पाएगा? साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मातृभाषा हाथ होता है और अन्य भाषायें उस हाथ में हथियार का काम करती हैं। यदि हाथ ही दुर्बल होगा तो हथियार भी नही चलेगा।

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