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UP Politics: ‘लाल टोपी लगाने से…नहीं आता’; चाचा शिवपाल यादव का अखिलेश यादव पर तीखा हमला, जानिए क्या कहा

UP Politics: अखिलेश यादव और उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव के बीच मन मुटाव की ख़बरें अब खुलकर सामने आने लगी है। चाचा शिवपाल बिना नाम लिए भतीजे अखिलेश पर निशाना साधते नजर आ रहे हैं। बीते गुरुवार को शिवपाल यादव ने एक बार फिर बिना नाम लिए अखिलेश पर तंज कसा है।

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akhilesh sivpal

नई दिल्ली। समाजवादी पार्टी के कर्ता-धर्ता अखिलेश यादव और उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव के बीच मनमुटाव की ख़बरें अब खुलकर सामने आने लगी है। चाचा शिवपाल बिना नाम लिए भतीजे अखिलेश पर निशाना साधते नजर आ रहे हैं। बीते गुरुवार को शिवपाल यादव ने एक बार फिर बिना नाम लिए अखिलेश पर तंज कसा है।

लाल टोपी पर ये बोले शिवपाल

पिछले कुछ वक़्त से अखिलेश यादव बीजेपी से ज्यादा अपने चाचा शिवपाल के यादव के निशाने पर आ रहे हैं। राजनितिक गलियारों में ये हवा तेज हो गयी है कि चाचा शिवपाल को भी लाल रंग रास नहीं आ रहा है। एक न्यूज चैनल से बातचीत करते हुए शिवपाल ने कहा “कोई किसी की नहीं सुनता है। कोई किसी को पसंद है, कोई किसी को पसंद है। लेकिन हम इतना जरूर जानते हैं कि समाजवाद विचारों से आता है, लाल टोपी लगाने से समाजवाद नहीं आता है।”

शिवपाल यादव ने बीते दिनों समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव और  डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य  के बीच हुई आपसी नोकझोंक पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा “विधानसभा में जब चलती है तो नोकझोंक होती है। जब नोकझोंक होती है तो संसदीय भाषा का पालन होना चाहिए। हमेशा सदन नियमों से और परंपराओं से चलता है। अगर कोई भी सदस्य है तो उसे संसदीय भाषा का प्रयोग करना चाहिए। ऐसा ही मैंने देखा है और यही सीखा है।”

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सत्ता पक्ष ने शुरू किया विवाद

चाचा शिवपाल ने आगे कहा “जो जितने बड़े पद पर होता है उन्हें हमेशा गरिमा का ध्यान रखना चाहिए। हालांकि इसकी शुरूआत तो सत्ता पक्ष से ही हुई थी। जिसपर विपक्ष उत्तेजित हो गया। सत्ता पक्ष को उस भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिए था। खास कर सीनियर सदस्यों को तो ऐसा नहीं करना चाहिए था।” शिवपाल यादव ने बातचीत में आगे कहा, “कभी-कभी कुछ बातों पर उत्तेजना तो जरूर होती है। लेकिन ऐसे वक्त पर अध्यक्ष की जिम्मेदारी हो जाती है। वे सदस्यों को संभालते हैं। हमेशा वे ही संभालते भी हैं। कोई भी सदस्य हो चाहे पक्ष हो या विपक्ष हमेशा संसदीय भाषा का पालन होना चाहिए। हालांकि कभी-कभी विधानसभा में ऐसा होता रहता है। ये शुरुआत कहीं ना कहीं से होती है। जब दोनों पक्षों से शुरुआत होती है तो कोई ज्यादा कोई कम बोलता है।”

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