Connect with us

देश

Book Review: “महाराणा: सहस्र वर्षों का संघर्ष’ एक सामान्य पुस्तक नहीं बल्कि इस्लाम परस्त वामपंथी इतिहासकारों के मुँह पर कड़ा तमाचा है”

Book Review: यह पुस्तक हिन्दुओं को क्यों पढ़नी चाहिए लेखक की इस पंक्ति से पता चला जाता है। पुस्तक का प्राक्कथन कितना जबरदस्त है इसका प्रमाण पाठक को इस पंक्ति से मिल जाएगा,”कौन लोग थे, जो राज्य व्यवस्था में बैठे इन मक्कार वामपंथियों के सहायक थे

Published

on

नई दिल्ली। आज 10 जून 2022 को सुबह देश के गृहमंत्री श्री अमित शाह ने एक पुस्तक का विमोचन किया। संयोग से यह पुस्तक मैं कल ही पढ़कर समाप्त कर चुका था। अब समीक्षा लिखने का गिलहरी प्रयास किया है। यह तथ्य अब सार्वजनिक है कि देश और धर्म विरोधी वामपंथी तथाकथित इतिहासकारों ने भारत के गौरवशाली इतिहास लेखन के साथ बहुत अन्याय किया है, बहुत छेड़छाड़ की है। इन लेखनपिशाचों ने ऐसा छद्म इतिहास गढ़ा है कि जिसे पढ़ कर किसी को देश और धर्म श्रद्धा हो ही नहीं सकती। लेखन के माध्यम से भारत के इतिहास के साथ छेड़छाड़ करने का कुचक्र पिछले 6-7 दशकों से चल रहा है। स्वाभाविक है, उसके बहुत भयानक परिणाम निकले। ये उसी विकृत इतिहास का परिणाम है एक आततायी, लुटेरे, आतंकवादी, म्लेच्छ अकबर को महान बना दिया, लेकिन महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, बाप्पा रावल जैसे शूरवीरों को कहीं कोने में फेंक दिया या उनका नामों निशान ही मिटा दिया। लेखनपिशाच वामपंथियों के ऐसे ऐतिहासिक कुकर्मों का पर्दाफ़ाश करने का काम कुछ समय से शुरू है और भारत को भारत की दृष्टि से देखने वाले लोग इतिहास के शुद्धिकरण में लगे हुए हैं। उन्ही भारत पुत्रों में से एक हैं राजस्थान की वीरभूमि से डॉक्टर ओमेंद्र रत्नू। पुस्तक का शीर्षक ही पर्याप्त है पुस्तक की विषयवस्तु समझने के लिए। जिसमें ‘महाराणा’ और ‘सहस्त्र’ ये दो शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। कारण कुछ मूढ़मति कहते हैं कि भारत हजार वर्ष तक गुलाम रहा। उनकी इस साजिश को इस पुस्तक का शीर्षक ही उखाड़ फेंक देता है। यदि भारत गुलाम रहा होता तो प्रमाणों के साथ ‘सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध’ शब्द चयन न होता। दूसरी बात युद्ध योद्धाओं ने लड़ा और वो योद्धा कहलाये ‘महाराणा’ इसलिए लेखक पुस्तक के पृष्ठ संख्या 216 पर लिखते हैं,” एक देश के दो आदर्श नहीं हो सकते -यदि अकबर महान है तो हमें प्रताप को भुलाना होगा। और यदि प्रताप महान है तो अकबर को किसी कूड़ेदान में फेंकना ही होगा।” यह पुस्तक हिन्दुओं को क्यों पढ़नी चाहिए लेखक की इस पंक्ति से पता चला जाता है। पुस्तक का प्राक्कथन कितना जबरदस्त है इसका प्रमाण पाठक को इस पंक्ति से मिल जाएगा,”कौन लोग थे, जो राज्य व्यवस्था में बैठे इन मक्कार वामपंथियों के सहायक थे।” आखिर कैसे एक ही दिन में चितौड़ के 40,000 हिन्दुओं की निर्मम हत्या करने वाला अकबर हमारे लिए महान बना दिया गया?

तीन भागों में लिखी इस पुस्तक का एक एक शब्द शोधपरक है। यह पुस्तक कोई कपोल कल्पना नहीं है गहन शोध का परिणाम है और आवश्यकतानुसार संदर्भ भी दिए गए हैं। आज यदि हिन्दुओं से यह प्रश्न पूछा जाए कि सिकंदर, तैमूर, औरंगजेब, अकबर, बाबर, हुमायूं (और न जाने इनके जैसे कितने आतंकवादी और लुटेरों के नाम) का नाम सुना है तो सौ में से 99 हिन्दू उत्तर हाँ में देंगे। कई तो इनकी जीवनी भी बताने लग जायेंगे। लेकिन यदि पूछा जाए बाप्पा रावल, रावल खुमाण, रावल जैत्र सिंह, महाराणा हम्मीर सिंह, महाराणा लक्ष्य सिंह, महाराणा कुम्भकर्ण (कुंभा) महाराणा सांगा, महाराणा प्रताप, महाराणा अमर सिंह और महाराणा राज सिंह का नाम सुना है? तो अधिकांश हिन्दू सिर खुजलाने लगेंगे या ये पूछेंगे कि ये कौन थे? आखिर ऐसा क्यों ? जिन बाप्पा रावल का नाम सुनते ही हिन्दू मूक हो जाता है या हो जाएगा, उनके बारे में ये पुस्तक कहती है,”वैसे तो किसी राष्ट्र का कोई पिता नहीं हो सकता, क्योंकि राष्ट्र, व्यक्तियों से कहीं अधिक विराट व उच्च इकाई है, परन्तु यदि इस देश को किसी को राष्ट्रपिता की उपाधि देनी ही है तो वे केवल बाप्पा हो सकते हैं।” “बाप्पा नहीं होते तो भारत इस्लामी खिलाफत का अवयव बन गया होता। न कोई वैदिक धर्म बचता न सनातन संस्कृति। इस्लामी मतांधता के अन्धकार ने समूचे विश्व को ही लील लिया होता।” लेखक के उपरोक्त शब्द हल्के में नहीं लिए जा सकते। यह पुस्तक पाठक को और विशेषकर उन लोगों के ज्ञान चक्षु खोलेगी जो ये कहते हैं कि भारत ने कभी किसी पर आक्रमण नहीं किया। यह पुस्तक उन महान योद्धा मलेच्छ संहारक बाप्पा रावल के बारे बताएगी जिन्होंने अरबी आक्रांताओ को उनके घर ‘रेत के समुद्र’ अरब तक खदेड़ा था। इतना ही नहीं अरबों को ठोकते ठोकते बाप्पा ईरान तक गए थे। जिस गजनी शहर को लेकर वामपंथी छछुंदर बहुत बात करते हैं बाप्पा ने उस गजनी शहर पर आक्रमण करके उस पर कब्जा कर लिया था। और कासिम ने जिस सलीम को गजनी का जागीरदार बनाकर रखा हुआ था, बाप्पा ने उसे हराकर उसकी बेटी से विवाह कर लिया था। उन्होंने अपने भतीजे को गजनी का संरक्षक बनाया था। अरब से वापस लौटते समय उन्होंने जगह जगह हिन्दू चौंकियाँ बनवायी थी। बाप्पा और दूसरे हिन्दू राजाओं की दूरदर्शिता के कारण ही अगले पांच सौ वर्ष तक भारत अरबी घोड़ों और आक्रमणकारियों को हराता रहा।

बाप्पा रावल के पराक्रम का प्रमाण इस बात से मिल जाता है कि हिन्दुओं से घृणा करने वाले पाकिस्तान जैसे इस्लामिक देश ने अपने प्रमुख नगर का नाम ‘रावलपिंडी’ रखा हुआ है। जो एक ऐसे हिन्दू राजा के नाम पर है जिसने अरबों की कब्र उनके घर तक जाकर खोदी है। एक पूरा अध्याय बाप्पा के पराक्रम से भरा पड़ा है। हिन्दू माता पिता स्वयं इस पुस्तक को पढ़कर यदि अपने बच्चों को बाप्पा की कहानी सुनाएंगे तो दावा है सेक्युलरिज्म का कीड़ा उनके घरों में नहीं घुसेगा। लेकिन विडंबना यह है कि हिन्दू पढ़ता नहीं है। हिन्दुओं को उर्दूवुड (बॉलीवुड) ने बहुत गंदी तरह जकड़ रखा है। क्या हिन्दू रावल खुमाण के बारे में जानते हैं? ये वही रावल खुमाण हैं जिनको अरब आक्रांताओं का ‘काल’ कहा जाता था। उन्होंने अनेकों बार अरबी आतंकवादियों को भारतभूमि से मार मारकर खदेड़ा था। ये वही खुमाण हैं जिनके नेतृत्व में कश्मीर से रामेश्वरम तक के कुल 40 राजवंशों ने एकत्र होकर अरबों को बुरी तरह हराया था। यह कोई छोटी घटना या बात नहीं है, यह घटना आज भी उन लोगों के मुँह पर तमाचा है जो यह कहते हैं कि हिन्दू कभी संगठित नहीं हो सकता या हिन्दू कभी संगठित होकर नहीं लड़ा। रावल खुमाण के नेतृत्व में भारत के 40 राजवंशों का लड़ना ‘हिन्दुओं का संगठन’ नहीं था तो और क्या था? ये वही खुमाण है जिन्होंने महमूद को कई महीनों तक बंदी बनाकर रखा था। ये वही खुमाण है जिन्होंने अपने जीवन में 24 युद्ध लड़े थे और ईराक तक जाकर अरबी लुटेरों की बैंड बजायी थी। लेकिन आज हिन्दू समाज पराक्रमी रावल खुमाण के बारे में कुछ न जानता इससे बड़ी शर्मनाक बात हो ही नहीं सकती। लेखक बाप्पा रावल और खुमाण रावल की वीरता को प्रमाणित करने के लिए विदेशी लेखक ईवान ऑस्टीन की पुस्तक के हवाले से लिखते हैं,” बाप्पा रावल और खुमाण जैसे वीरों ने अरब विस्तारवाद की रीढ़ तोड़ दी, तथा भारत पाँच सौ वर्षों तक अरबों से सुरखित रहा।” ओमेंद्र रत्नु की यह पुस्तक वामपंथी और इस्लामिक लेखनपिशाचों के ‘दिल्ली सल्तनत’ प्रपंच का भांडाफोड़ करती है। पुस्तक रावल जैत्र सिंह के जीवन से यह सिद्ध करते हैं कि ‘दिल्ली सल्तनत’ नामक कोई चीज ही भारत के इतिहास में नहीं हुई है। लेखक लिखते हैं,” पराजित मुसलमान लुटेरों को सुल्तान बताने में इस देश के इतिहासकारों को लज्जा भी नहीं आई।”

यह पुस्तक पाठक को रावल जैत्र सिंह के साथ साथ रावल तेज सिंह और रावल समर सिंह के बारे में बताएगी। हिन्दू जौहर करने वाली रानी पद्मिनी और उनके पति रावल रतन सिंह के बारे में कितना जानता है यह एक बड़ा प्रश्न चिन्ह है। थोड़ा सा बताऊं तो रावल रतन सिंह रावल जैत्र सिंह के पौत्र और रावल समर सिंह के पुत्र थे। अब विडंबना देखिये पद्मिनी के बारे में पता नहीं लेकिन पद्मावती के बारे में फ़िल्में बनाई जाती हैं। यह पुस्तक उर्दूवुड के प्रिय मलिक मोहम्मद जायसी लिखित ‘पद्मावत’ को नकारती है। लेखक लिखते हैं,” पद्मावती नाम से कोई रानी नहीं थी, यह एक काल्पनिक चरित्र है। जो मलिक मोहम्मद जायसी ने अपने काव्य के लिए बनाया था यद्यपि रानी पद्मावती से ही प्रेरित था। एक मुसलमान व्यक्ति की कल्पना को इस बात की अनुमति नहीं दी जा सकती कि जिस महान हिन्दू रानी ने अपने सम्मान और धर्म की रक्षा के लिए अकल्पनीय बलिदान दिया हो, उस महानतम रानी का नाम ही परिवर्तित कर दे। लेखक एक पद्मावत को लेकर बड़ा रहस्योद्घाटन करते हैं कि चित्तौड़ की वास्तविक घेराबंदी के 250 साल बाद जायसी ने पद्मावत लिखा था। इसलिए जायसी की रचना उस समय की घटनाओं के ऐतिहासिक पुनर्निर्माण का आधार हो ही नहीं सकती। यह पुस्तक रावल रतन सिंह और महारानी पद्मिनी के पराक्रमों पर विस्तृत विवरण देती है और इस्लाम परस्त इतिहासकारों के मुँह पर कड़ा तमाचा मारती है। इस पुस्तक के माध्यम से पाठक को मेवाड़ के राजाओं की ‘रावल’ पदवी से ‘राणा’ में बदलने की यात्रा के बारे में भी पता चलेगा। इस पुस्तक में हिन्दुओं की शिराओं में बहने वाले रक्त को खौलाने के लिए और इस्लाम परस्त वामपंथी इतिहासकारों के झूठ और भ्रम के कुत्सित जाल को तोड़ते हुए महाराणा वंश परंपरा से निकले मोहम्मद बिन तुगलग को बंदी बनाने वाले महाराणा हम्मीर सिंह (जिनके बारे में शायद ही कोई जानता है) के बारे में एक विस्तृत अध्याय है। इस पुस्तक बताती है की जिस मोहम्मद बिन तुगलग को इस्लाम परस्त वामपंथी इतिहासकार सिर पर चढ़ाकर रखते है उसे हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा के राजा पृथ्वी चंद ने बुरी तरह से हराया था और उसके 1 लाख सैनिक मार दिए थे। गोरा और बादल के पराक्रम के साथ-साथ हजारों हिन्दू स्त्रियों के जौहर की अभूतपूर्व घटना का वृत्तांत झकझोरने वाला है।इस पुस्तक में महाराणा लक्ष्य सिंह (लाखा), महाराणा कुंभकर्ण (कुंभा) और महाराणा सांगा के अद्भुत पराक्रम और जीवन के बारे में पढ़कर शीश स्वतः नमन को झुक जाता है और लेखक की लेखनी और शोध को साधुवाद देने को मन करता है। साथ ही इतिहास लेखन में इन महान हिन्दू राजाओं के साथ कुत्सित खेल करने वालों के प्रति क्रोध को रोकना कठिन लगता है।

यह पुस्तक महाराणा प्रताप की वीर गाथा का विस्तृत वर्णन करती है। जिस मुस्लिम आक्रांता अकबर को इस्लाम परस्त हिन्दू विरोधी लेखकों ने महान बताया है उस अकबर को लेखक इस पुस्तक में पिसाच और अकबर खूनी ए आजम तक लिखा है। इस पुस्तक का अध्याय 12 ” महाराणा प्रताप और अकबर: दो विरोधी जीवन मूल्यों का टकराव” पढ़ने पर लेखक की बातों की पुष्टि होती है। वहीं अध्याय के पहले पृष्ठ पर प्रताप की फोटो के नीचे लिखी हुई पंक्ति “प्रताप: वो सांचे ही टूट गए जहाँ ऐसे पुरुष ढाले जाते थे” मेरे हिन्दू हृदय को विदीर्ण करते हैं। उर्दूवुड ने साजिश के तहत ‘जोधा अकबर’ जैसी फ़िल्में बनाकर हिन्दुओं को भ्रमित करने का खेल खेला। लेखक ने इस साजिश का पर्दाफास करने का प्रयास भी किया है जिसके तहत जोधा त्रुटिवश एक दासी पुत्री हरखू बाई का नाम था। अकबर द्वारा हिन्दुओं त्योहारों को मनाना और हिन्दुओं को अपने दरबार में जगह देना केवल मात्र हिन्दुओं को भ्रमित करने की चाल थी क्योंकि उसे पता था कि हिन्दुओं को आमने-सामने के युद्ध में पराजित नहीं किया जा सकता। हल्दीघाटी के युद्ध के बारे में यदि बात की जाए तो यह कहा जाता है कि उसमें महाराणा प्रताप की पराजय हुई थी, लेकिन इस पुस्तक के अनुसार हल्दीघाटी युद्ध का परिणाम उल्टा था और उसमें महाराणा प्रताप की विजय हुई थी। इस पुस्तक के अध्याय 13 और 14 से इस बात की पुष्टि की गई है। इन अध्यायों के बारे में बहुत लिखा जा सकता है लेकिन मैं चाहूँगा कि पाठक इस ऐतिहासिक साजिश का पर्दाफ़ाश स्वयं पढ़े। और न पढ़ने की मानसिक विकृति से बाहर आये। तभी लेखक के लेखनी का प्रयास सफल होगा और हिन्दू जागरण में पाठक का सहयोग होगा। इस पुस्तक पाठकों फ़ारसी और तुर्की साहित्यों के बल पर मुगलों और इस्लामी आक्रांताओं को महान और शक्तिशाली बताने की साजिश का पर्दाफ़ास तथ्यों और संदर्भों के आधार पर किया गया गया। वास्तव में यह पुस्तक इतिहास पुनर्लेखन का एक भगीरथी प्रयास है। जिसमें राजपूतों के साथ साथ वीरभूमि राजस्थान के भील योद्धाओं का वास्तविक इतिहास भी सामने लाती है। डॉ ओमेंद्र रत्नु की इस कालजयी पुस्तक का अध्याय 17 ‘सहस्त्र वर्षों की हिन्दू दासता का घृणित झूठ’ हिन्दुओं को अलग से प्रिंट लेकर घर में रख लेना चाहिए और रोज घर में सामूहिक पाठ करना चाहिए। ताकि मुस्लिमों ने इस ने इस देश पर हजार साल राज किया यह झूठ हिन्दुओं की आने वाली पीढ़ियों तक न पहुंचे। इस अध्याय में लेखक ने हर प्रकार से ‘मुसलमानों ने भारत पर सहस्त्र वर्ष राज किया है’ इस झूठ को रौंद दिया है। लेखक लिखते हैं,”किंतु अब एक नए ही दुष्चक्र के अंतर्गत, जो आधुनिक भारत के स्वघोषित बुद्धिजीवी लेकर आए, ये लगातार नए झूठ बोल और फैला रहे हैं कि इस्लाम ने भारत पर एक सहस्र वर्षों तक राज किया। इसके साथ ही यह प्रचार भी चलता है कि यह शासन बहुत उदार लोगों का था, जो काफी समझदार थे और वे इस अविकसित भूभाग की असभ्य जनता को सभ्य बनाने आए थे। सत्य यह है कि ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ नाम के इस मिथ्या विचार को बच्चों का यौन शोषण करनेवाले और हत्यारों के एक समूह का मानवीकरण करने के लिए लाया गया है। झूठ का यह सारा जाल इसलिए बिछाया गया। ताकि इस्लामी हत्यारों के कुकृत्यों की नग्नता को सहिष्णुता व ‘दरियादिली’ की चादर से ढक दिया जाए।”

यह पूरा अध्याय पाठक को झकझोर रख देगा और सोचने की एक नई दृष्टि देगा। पाठक को हिंट देने के लिए प्रश्न के रूप में एक ‘हिंट’ दे रहा हूँ ” यदि इन हत्यारे, लुटेरों ने हजार वर्ष तक राज किया होता तो आज हिन्दू सौ करोड़ कैसे हैं? अथवा अथवा भारत में हिन्दू बहुसंख्यक कैसे? जबकि ये सत्य है कि कुछ ही दशकों में पूरा मध्य-पूर्व इस्लामिक हो गया। विचार पाठक और हिन्दुओं को करना है। पुस्तक अंतिम अध्याय ‘सिंहो का मौन: हिन्दू समाज के विकल्प’ वास्तव में एक नई शुरुआत करने को प्रेरित करता है। अंत में, यह पुस्तक भारत के विकृत इतिहास के शुद्धिकरण का भगरथी प्रयास है। लेखक ने अपने इस प्रयास में निष्पक्ष प्रामाणिकता से भारत के इतिहास के साथ हुए इस्लाम परस्त इतिहासकारों द्वारा किये छल को उजागर करने का साहसिक उद्यम किया है। यह पुस्तक दशकों से थोपी गयी भ्रांतियों और मिथकों का विध्वंश करके नई मान्यताओं, नवीन चिंतन करने और इस दिशा में कार्य करने के लिए प्रेरित करती है। भारतीय उपमहाद्वीप में विगत 1400 वर्षों से चले आ रहे हिंदू-मुस्लिम संघर्ष और उसमें हिन्दुओं की विजय के सत्य को यह पुस्तक प्रामणिकता के साथ सिद्ध और स्थापित करती है। लुटेरे, हत्यारे, बलात्कारी और मानव शरीर में रहने वाले जानवर आक्रांताओं के झुंडों से वैदिक हिंदू धर्म को अपना सर्वस्व दांव पर लगाकर सुरक्षित रखने वाले देव तुल्य महापुरुषों ‘महाराणा’ के जिस इतिहास पर धर्मविरोधियों ने मिटटी डाल दी थी, डॉ ओमेंद्र रत्नु उस वास्तविक इतिहास को बाहर लेकर आए हैं। उनकी लेखनी और शोध को नमन।

यह पुस्तक निम्लिखित लिंक से प्राप्त की जा सकती है

https://www.prabhatbooks.com/maharana.htm

Advertisement
Advertisement
Advertisement