‘अध्यापक-शिक्षा’ की गुणवत्ता संपूर्ण शिक्षा-व्यवस्था की आधार कुंजी

‘शिक्षा’ न केवल एक अनुशासन है बल्कि इसके दो विशिष्ट स्वरूप हैं। एक स्वरूप इसका उदार पक्ष है जो समाज-विज्ञान के किसी भी विषय की तरह पढ़ा एवं समझा जाता है।

‘शिक्षा’ शब्द सुनते या पढ़ते ही एक स्कूल की छवि तुरंत हमारे मन-मस्तिष्क में कौंध जाती है! यह ‘शिक्षा’ को देखने-समझने का एक ‘आम’ नज़रिया है जो ‘एक आम’ व्यक्ति के मस्तिष्क में स्वतः ही उभरता है और इसमें कुछ गलत भी नहीं है। गलत यह है कि हमारी दृष्टि इससे आगे नहीं जा पाती! हम ‘स्कूल’ से आगे कभी बढ़ ही नहीं पाए! ऐसे अनेक अनुभव मेरे ‘शिक्षा-संसार’ का हिस्सा हैं। मेरे शैक्षिक और निजी जीवन में अनेक द्वंद या यूँ कहिए कि द्वंदात्मक स्थितियां हैं, जहां अक्सर ‘शिक्षा’ की बात होती रहती है।

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मैं जब भी कभी पारिवारिक माहौल में या कुछ मित्रों के बीच बैठता हूं, जिन्हें पता है कि मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हूं, तब कोई ना कोई जिज्ञासावश मुझसे यह पूछ बैठता है कि मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के किस कॉलेज में पढ़ाता हूं? जब मैं उन्हें यह बताता हूं कि मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षा-विभाग में पढ़ाता हूं, तो उनके चेहरे पर आने वाले भावों से यह स्पष्ट हो जाता है कि वे अनेक तरह के भ्रमों से घिर गए हैं। वे यह सोचने लगते हैं कि मैं विश्वविद्यालय के शिक्षा- विभाग में क्या करता हूं? क्या मैं वाकई शिक्षण-कार्य से जुड़ा हुआ एक प्रोफेसर हूं? या कोई प्रशासनिक अधिकारी, जो विश्वविद्यालय के शिक्षा-विभाग से जुड़ा हुआ है। उनके अंतर्मन को समझकर, मैं स्वयं ही स्पष्टीकरण देने लगता हूं कि ‘शिक्षा’ एक विषय है और हमारे विभाग में बी.एड/एम.एड तथा ‘शिक्षा’ के संदर्भ में शोधकार्य किया जाता है। मैं उन्हें बताता हूं कि मैं शिक्षा-संकाय में प्रोफेसर हूं, जैसे कला-संकाय है या विज्ञान-संकाय है, ऐसे ही शिक्षा-संकाय भी है। अपने अध्यापन कार्यकाल के लगभग 23 वर्ष बीत जाने के पश्चात भी मुझे अपना विषय समझाना पड़ता है, क्योंकि अधिकांश लोगों में इस विषय की जानकारी नहीं होती। मैं कई बार सोचता हूं कि लोग ‘शिक्षा’ को एक शैक्षिक विषय क्यों नहीं मान पाते फिर मैं इसका उत्तर स्वयं में ही खोजने लगता हूं। शायद हम शिक्षा क्षेत्र के लोगों ने ऐसे प्रयास ही नहीं किए कि हम ‘शिक्षा’ को एक अनुशासन के रूप में स्थापित कर पाएं। निश्चय ही ‘शिक्षा’ एक अंतःविषयक अनुशासन है, परंतु इसका यह अर्थ कभी नहीं था कि यह विषय अन्य अनुशासनों की तरह एक अनुशासन के रूप में स्थापित न हो पाएगा।

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जो लोग ‘शिक्षा’ को एक अनुशासन के रूप में मानने या जानने में असफल रहे हैं, शायद यह उनकी कमी नहीं है। यह कमी शिक्षा-विभागों एवं शिक्षा-संकायों में अध्यापन करने वाले उन सभी लोगों की भी है जो ‘शिक्षा’ को आज भी एक अनुशासन के रूप में स्थापित नहीं कर पाए। लगभग 60 वर्ष पहले जब कोठारी कमीशन ने ‘शिक्षा’ को अध्यापक-शिक्षा से जोड़कर शिक्षण को ट्रेनिंग की बजाए एक अकादमिक विषय के रूप में स्थापित करने की बात कही थी, तभी शिक्षा को एक अनुशासन का दर्जा मिलने का रास्ता साफ़ हो गया था।

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साथियों, मेरी यह समस्या मेरी स्वयं की ‘पहचान की समस्या’ में रूपांतरित हो गई है। इस अर्थ में, यह सुनिश्चित करना कठिन हो गया है कि मैं भले ही ‘एक प्रोफेसर’ हूं, लेकिन मेरा ‘काम क्या है?’ यह सवाल इसलिए भी उठता है, क्योंकि ‘शिक्षा’ को कभी किसी ने अन्य विषयों की तरह पढ़ने-पढ़ाने का दर्जा नहीं दिया! मैंने अपनी स्नातकोत्तर की उपाधि राजनीति विज्ञान विषय में हासिल की, उसके पश्चात बी.एड. एवं एम.एड. करके शिक्षा के क्षेत्र में शोधकार्य किया एवं इसी विषय में अध्यापनकार्य आरंभ करने का मौका मिल गया। एक लंबे समय से मैं यह समझता आया हूं कि किस प्रकार नियमित रूप से समाचार पत्र पढ़ने वाले या टेलीविजन पर सामयिक विषयों की बहस सुनने वाले स्वयं को ‘राजनीति विज्ञान’ का विशेषज्ञ घोषित कर देते हैं। फिर आप उनसे संघर्ष करते रहिए कि ‘राजनीति विज्ञान’ समाचार-पत्र में छपे लेखों या टेलीविजन पर आने वाले सामयिक विषयों की बहस से कहीं गहरा अनुशासन है। इस अनुशासन में अपने सिद्धांत व दर्शन शामिल है। कुछ इसी तरह की बहस व संघर्ष उन लोगों से भी करना पड़ता है जो कहते हैं कि ‘शिक्षा’ तो सभी कुछ है, परंतु आप क्या पढ़ाते हैं? मेरी चिंता इस बात को लेकर नहीं है कि शिक्षा के किसी एक पक्ष को आधा- अधूरा समझने वाले भी स्वयं को शिक्षाविद घोषित कर देते हैं, बल्कि मेरी चिंता इस बात को लेकर है कि शिक्षा के क्षेत्र में अलग-अलग स्तर पर काम करने वाले अनेक व्यक्ति भी यह मानने लगते हैं कि उन्हें पाठ्यक्रम, पाठ्य-पुस्तकों व मूल्यांकन पद्धतियों की समझ है और इस नाते वे बिना डिग्री या डिप्लोमा के शिक्षाविद है। ऐसी समझ रखने वाले बहुत छोटे से वर्ग को हम अपवाद के रूप में स्वीकार भी कर सकते हैं, क्योंकि समाज की विभिन्न चिंताओं के सरोकारों की समझ होने के लिए किसी विषय-विशेष की डिग्री होना आवश्यक नहीं है। परंतु चिंता तब बढ़ जाती है, जब कोई भौतिक शास्त्र का व्यक्ति राजनीति पर कुछ लेख लिखने पर स्वयं को राजनीति-विज्ञान का विशेषज्ञ घोषित कर देता है या मान लिया जाता है। ठीक उसी प्रकार ‘शिक्षा’ के किन्हीं विशेष बिंदुओं पर अपनी बात रख पाने की सामर्थ्य हमें शिक्षा-शास्त्री होने का भ्रम दे देता है। रोज़मर्रा की ज़िंदगी में काम आने वाला गणित समझना और उससे अपनी रोज़मर्रा की गणित संबंधी चिंताओं को निदान कर लेना हमें गणितज्ञ होने का भ्रम नहीं दे सकता। इसी प्रकार ‘शिक्षा’ की सामान्य जानकारी या परीक्षा प्रणाली पर की जाने वाली आलोचना किसी को शिक्षाविद घोषित नहीं कर सकती। दोनों बातों में स्पष्ट अंतर समझा जाना चाहिए। एक व्यावहारिक रूप से सामान्य समझ का परिणाम है जबकि दूसरी सैद्धांतिक अध्ययन एवं शोध पर आधारित विशेषज्ञता है।

मैं अगला उदाहरण ‘शिक्षा’ अनुशासन के क्षेत्र से ही देना चाहता हूं। ‘शिक्षा’ न केवल एक अनुशासन है बल्कि इसके दो विशिष्ट स्वरूप हैं। एक स्वरूप इसका उदार पक्ष है जो समाज-विज्ञान के किसी भी विषय की तरह पढ़ा एवं समझा जाता है। इसका दूसरा स्वरूप प्रोफेशनल-शिक्षा का हिस्सा है, जिसका कार्य शिक्षा-संस्थानों एवं विद्यार्थियों से जुड़ी विभिन्न समस्याओं पर शोध को बढ़ावा देना है, शिक्षण-पद्धतियों को अधिक रुचिकर बनाना है, इसे समय-अनुरूप तकनीकी से जोड़ना है। साथ ही साथ ‘शिक्षा’ का प्रोफेशनल पहलू पाठ्यक्रम के निर्धारण के सिद्धांतों एवं मूल्यांकन के विभिन्न सोपानों से जुड़े सिद्धांतों की व्याख्या करता है एवं उन्हें शोध के साथ समय/ स्थिति अनुकूल बनाता है। शिक्षा के पहले स्वरूप को बी.ए. तथा एम. ए. (एजुकेशन) के साथ बढ़ावा दिया जाता है या यूं कहें कि उदार अनुशासन के रूप में पढ़ा व पढ़ाया जाता है। वहीं इसके दूसरे प्रोफेशनल स्वरूप को बी.एड., एम.एड, डी.एड. या बी.एल.एड. के माध्यम से पहचाना जाता है। इसे हम संक्षेप में ‘अध्यापक-शिक्षा’ कहते हैं जो अध्यापक बनने के लिए वांछित प्रोफेशनल शिक्षा है। शिक्षा के उदार पक्ष का अध्ययन एवं प्रोफेशनल पक्ष का अध्ययन क्रमश एम.ए. (एजुकेशन) एवं एम.एड. से जाना जा सकता है। अब यहां यह सवाल उठता है कि जब दोनों ही स्नातकोत्तर डिग्री हैं तो फिर इनमें अंतर क्यों? जनाब, इनके अंतर को समझने के लिए आप ‘मनोवैज्ञानिक’ एवं ‘मनोचिकित्सक’ का उदाहरण ले सकते हैं। किसी-ना-किसी रूप में मनोवैज्ञानिक तो हम सभी हैं- एक अध्यापक के रूप में, माता पिता के रूप में या एक अनुभवी वयस्क के रूप में। किंतु ‘मनोचिकित्सक’ केवल सलाह-मशवरा ही नहीं देता बल्कि आवश्यक दवा भी देता है। अतः यह भी उदार-मनोविज्ञान एवं प्रोफेशनल-मनोविज्ञान के रूप में समझे जा सकते हैं।

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अपनी अब तक की बातचीत से मैं यह स्थापित करना चाह रहा था कि ‘शिक्षा’ एक अनुशासन है और अध्यापक- शिक्षा इसका एक प्रोफेशनल चेहरा है। यह चेहरा विद्यार्थियों को एक व्यवसाय-विशेष के लिए तैयार करता है। विश्व के विभिन्न देशों की ही तरह भारत में भी प्रोफेशनल-शिक्षा को बढ़ावा देने एवं समय-समय पर इसके गुणात्मक विकास के लिए विशिष्ट प्रोफेशनल नियामक संस्थाओं की स्थापना की गई है। चिकित्सा-शिक्षा के लिए मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया, कानूनी-शिक्षा के लिए बारकाउंसिल तथा इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए ए.आई.सी.टी.ई. नाम की संस्था, जिसमें प्रशासक एवं विषय-विशेष से जुड़े व्यक्ति रहते हैं। ये प्रोफेशनल नियामक संस्थाएं, प्रोफेशन-विशेष की आवश्यकताओं के अनुसार न सिर्फ़ संबंधित शिक्षण संस्थाओं को अनुमति देती हैं बल्कि साथ-ही-साथ समय के अनुरूप उस प्रोफेशनल कोर्स की आवश्यकताओं एवं चुनौतियों को भी पुन: परिभाषित करती हैं। इसी प्रकार अध्यापक-शिक्षा की संस्थाओं के नियमन के लिए एन.सी.टी.ई. नामक संस्था वर्ष 1993 में संसद के एक्ट द्वारा स्थापित की गई थी। किन्हीं अज्ञात कारणों से संस्था का ढांचा प्रशासनिक है या अकादमिक? इसे अब भी भ्रम की स्थिति में पाया जाता है। यदि हम इस संस्था को समझना चाहे, तो पाते हैं कि कभी इस संस्था के अध्यक्ष, अध्यापक-शिक्षा के विशेषज्ञ रहें है तो कभी इसकी बागडोर नौकरशाहों के हाथ में रही। अपने प्रारंभ से ही इस संस्था का अधिकांश ध्यान एवं ऊर्जा अध्यापक-शिक्षा के नए खुल रहे संस्थानों को मान्यता देने संबंधी कार्यों में ही खर्च होती रही है। यूं तो इस संस्था की चार क्षेत्रीय शाखाएं भी है, परंतु उनका ध्यान भी कमोबेश नए बी.एड संस्थानों को मान्यता देने व उनके इंफ्रास्ट्रक्चर की जांच करने में ही लगा रहा। अध्यापक-शिक्षा के स्वरूप में वांछित सुधार एवं उन्हें समय के अनुरूप बदलने जैसे महत्वपूर्ण कार्य के लिए संस्था के पास अपना एक भी अकादमिक स्थाई सदस्य या यूनिट नहीं है। अध्यापक-शिक्षा की गुणवत्ता एवं नियमितता में सुधार के लिए एन.सी.टी.ई. ‘उधार के विशेषज्ञों’ पर ही निर्भर रहती रही है। हालांकि ‘उधार के विशेषज्ञ’ बहुत कठोर शब्द है लेकिन वास्तविकता यही है जो इससे भी कठोर है!

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मेरी समझ में ‘अध्यापक-शिक्षा’ की गुणवत्ता संपूर्ण शिक्षा-व्यवस्था की आधार कुंजी है। गुणवत्ता-पूर्ण शिक्षकों के माध्यम से ही हम विद्यालयों में विद्यार्थियों तक प्रभावी रूप से पहुंच सकते हैं एवं अपनी कक्षाओं को रोचक, नवाचारी एवं आलोचनात्मक चिंतन का केंद्र बना सकते हैं। अध्यापक-शिक्षा के संस्थानों में आ रही निरंतर गिरावट का एक प्रमुख कारण इन अध्यापक-शिक्षकों की भर्ती एवं पदोन्नति के समय अपनाया जाने वाला मापदंड भी है। इस मापदंड का निर्धारण मुख्य रूप से यू.जी.सी. द्वारा किया गया है। ‘अध्यापक-शिक्षा’ में इस भर्ती एवं पदोन्नति के मापदंडों को समाज- विज्ञान के किसी भी अन्य विषय के समकक्ष रखा गया है। यह भी अध्यापक-शिक्षा संस्थानों में आ रही निरंतर गुणात्मक गिरावट का एक मुख्य कारण है।

एन.सी.टी.ई. को अपनी विशाल भूमिका को समझना होगा,जो प्रशासनिक के साथ-साथ अकादमिक भी है। इसे ‘अध्यापक-शिक्षा’ के पाठ्यक्रम, स्कूल-इंटर्नशिप के साथ-साथ अध्यापक-शिक्षा संस्थानों के क्रियाकलापों के विशिष्ट स्वरूप को ध्यान में रखते हुए अध्यापक-शिक्षकों की भर्ती एवं पदोन्नति के नियमों में वांछित एवं अपरिहार्य परिवर्तन करने होंगे। ये परिवर्तन न केवल अध्यापक-शिक्षकों को प्रेरित करें बल्कि उनकी प्रोफेशनल-ग्रोथ में भी स्वीकार्य हों।

‘शिक्षा’ को एक अनुशासन का दर्जा देना, अध्यापक-शिक्षा के संस्थानों में प्रशासनिक एवं अकादमिक कार्यों की समय-समय पर समीक्षा करना तथा अध्यापक-शिक्षको की भर्ती एवं पदोन्नति के नियमों को अध्यापक-शिक्षा संस्थानों की कार्य-संस्कृति एवं आवश्यकताओं के अनुरूप परिवर्तित करना एक वृहद शैक्षिक सुधार है, जिसकी नितांत आवश्यकता है। इन सुधारों कों लाने में एन.सी.टी.ई. को अपनी महत्वपूर्ण भूमिका को न सिर्फ़ समझना होगा, बल्कि उसके लिए बिना किसी विलंब के सार्थक प्रयास भी करने होंगे।

इस लेख के लेखक प्रोफेसर पंकज अरोड़ा, केंद्रीय शिक्षा संस्थान, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली में कार्यरत हैं। (प्रस्तुत लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी हैं)

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