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मायावती न खुद जीत पाईं न ही प्रतिद्वंद्वियों के वोट काट सकीं

बसपा के वोटों में 2019 के मुकाबले लगभग 10 प्रतिशत की कमी बताती है कि वंचित वर्ग में भी आधी से अधिक हिस्सेदारी रखने वाले जाटव, कुरील और रैदास जैसी बिरादरी के वोट सपा और कांग्रेस गठबंधन की तरफ खिसक गए हैं

लोकसभा के इस चुनाव में बसपा अपना एक भी उम्मीदवार नहीं जिता पाई । प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटों में 20 पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारने के बावजूद मायावती मुस्लिमों को अपने पाले में पहले की तरह नहीं खींच पाईं। उधर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मायावती की नीतियों को चुनौती देते हुए उभरे चंद्रशेखर ने दलित वर्ग बहुल नगीना सीट पर जीत का झंडा गाड़ प्रदेश की वंचितों और शोषित वर्गों की सियासत में मायावती के नेतृत्व को चुनौती ऊपर से दे दी है।

दलित चेतना को राजनीति में प्रतिनिधित्व देने के संकल्प को लेकर कांशीराम की देखरेख में 18 अप्रैल 1984 को गठित बहुजन समाज पार्टी की चार दशक की राजनीतिक यात्रा के चालीसवें वर्षगांठ वाले साल पर ये चुनावी संदेश बसपा के सामने अस्तित्व के संकट का संकेत हैं । शायद इसी से चिंतित होकर ही बसपा सुप्रीमो मायावती ने भविष्य में मुस्लिमों को काफी सोच-समझकर टिकट देने की बात कही है।

दरअसल, मायावती की चिंता की वजह जानने के लिए बसपा की चार दशक की फर्श से अर्श और फिर आसमान से जमीन पर आ गिरने का घटनाक्रम जानना जरूरी हो जाता है। खासतौर से तब जब इस बार के लोकसभा चुनाव में बसपा के वोट में लगभग 10 प्रतिशत की गिरावट दिख रही हो। इस पर नजर डालना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यह दलित वर्गों की राजनीतिक चेतना की दिशा व दशा तथा मुस्लिम मतदाताओं की भावी मनोदशा बताने वाली है। साथ ही यह भी समझाने वाली है कि ऐसा हुआ क्यों । खासतौर से मायावती ने जिस तरह मुसलमानों को बहुत सोच-समझकर टिकट देने की बात कही है तो क्या उन्हें अब अपनी गलतियों का एहसास होने लगा है या फिर चंद्रशेखर की जीत ने उन्हें भविष्य को लेकर काफी चिंता में डाल दिया है । इसलिए वह वंचित समाज को अपनी गलती सुधारने का आश्वासन दे रही हैं ।

मायावती को क्या अब ये आभास हो रहा है कि उनकी नीतियों और फैसलों ने ही उनके मूल आधार लगभग 20 प्रतिशत वंचित वोट बैंक पर उनकी पकड़ ढीली कर दी है । जिसकी वजह से वह चुनावी गणित में बहुत उलटफेर करने की ताकत में नहीं रही हैं, तभी तो लोकसभा की 80 में 20 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारने के बावजूद वह इस लोकसभा के चुनाव में न एक उम्मीदवार जिता पाईं और न अपना वोट बैंक बचा पाईं। चुनावी गणित में उलटफेर तो दूर उल्टे 2019 के चुनाव की तुलना में वह लगभग 10 प्रतिशत वोट और गवां बैठीं । इसीलिए चंद्रशेखर जैसे चेहरों के साथ वंचित समाज की जुटान तेज होती जा रही है ।

प्रदेश में एक बार पूर्ण बहुमत और तीन बार भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री रहीं मायावती की छवि को उन पर लगने वाले घोटालों के आरोपों ने भी काफी कुछ नुकसान पहुंचाया है ।मायावती ने अगड़ी जातियों के साथ वंचितों व पिछड़ों को जोड़कर अद्भुत सोशल इंजीनियरिंग से 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाकर भाजपा, सपा और कांग्रेस जैसे दलों को हाशिए पर धकेल दिया था । घोटालों के आरोपों और मनमाने फैसलों के चलते वह 2012 आते-आते जनसमर्थन गंवाने लगीं । अगड़ी और पिछड़ी जातियां छिटक गईं लेकिन दलित समाज के लोग उनके साथ मजबूती से डटे रहे। जिसकी बदौलत वह चुनावी गणित की धुरी बनी रही। मायावती ने दलित वर्गों के समर्थन को अपनी ताकत तो समझा लेकिन राजनीति में उनके प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की चिंता नहीं की। उनके वोट की ताकत का इस्तेमाल सिर्फ सियासी मोलभाव के लिए किया। किसी को जिताने और हराने के की राजनीति ने उनकी विश्वसनीयता को काफी चोट पहुंचाई। जिस तरह इस चुनाव में बसपा ने सबसे ज्यादा 20 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे तो यह संदेश चला गया कि बसपा का मकसद केंद्र सरकार में भूमिका निभाना नहीं बल्कि मुस्लिम चेहरों के सहारे मुस्लिम और दलित जातियों के वोटों की लामबंदी कर अपनी राजनीतिक ताकत बनाए रखना है।

मायावती की असली चिंता मुस्लिम उम्मीदवारों की पराजय नहीं बल्कि दलितों के वोट पैटर्न में दिखा बदलाव है। जातियों के वोटों में बिखराव है। अभी तक आमतौर पर चुनावी गणित साधने के लिए मुस्लिम या अन्य जातियों के मतदाता 20 प्रतिशत वंचित समाज के वोट पाने की जतन में रहते थे पर, बसपा के वोटों में गिरावट बता रही है कि इस बार दलित समाज के वोट मुस्लिम और अन्य पिछड़ी जातियों के वोटों के साथ लामबंद हुए हैं । यह बदलाव ही मायावती को शायद डरा रहा है। बसपा के वोटों में 2019 के मुकाबले लगभग 10 प्रतिशत की कमी बताती है कि वंचित वर्ग में भी आधी से अधिक हिस्सेदारी रखने वाले जाटव, कुरील और रैदास जैसी बिरादरी के वोट का सपा और कांग्रेस गठबंधन की तरफ खिसक गए हैं। जो मायावती का मुख्य आधार रहे हैं।

पराजय मायावती की चिंता नहीं है । मायावती पराजित तो 2014 के लोकसभा चुनाव में भी हुई थी लेकिन उत्तर प्रदेश में उन्हें लगभग 19 प्रतिशत वोट मिला था । वर्ष 2019 के सपा के साथ गठबंधन करके चुनाव मैदान में उतरी तो भी उनका वोट लगभग 19 प्रतिशत बना रहा । उन्होंने 10 सीटें भी जीत ली थीं । पर, 1996 के बाद पहली बार लोकसभा के किसी चुनाव में बसपा को 10 प्रतिशत से भी कम मत मिले हैं । जिससे मायावती चिंतित है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि उनके मतों में गिरावट और चंद्रशेखर जैसे नेताओं का उभार उनकी राजनीति पर विराम न लगा दे।

डिस्कलेमर: उपरोक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं ।