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Real आसमानी Fighters ने दिया Reel Fighters को Thumbs up, फिल्म के ये 5 Points जानकर हैरान रह जाएंगे आप

IAF Officers Loved Fighter Film: फाइटर एक ऐसी फ़िल्म है जो बस राष्ट्रवाद तक ही सिमट कर नहीं रहती है बल्कि अपने आप को उससे आगे लेकर जाती है। फ़िल्म का बजट 250 करोड़ है, आदिपुरुष का बजट 600 करोड़ था लेकिन फ़िल्म में वो पैसा कहां लगा? इसपर इनक्वायरी कमीशन बिठानी चाहिए। वहीं सिद्धार्थ की फ़िल्म फाइटर में ढाई सौ करोड़ कहां ख़र्च हुए हैं वो साफ़-साफ़ पता चलता है। यही कारण है कि ये फिल्म इंडियन एयरफोर्स को भी बेहद पसंद आई है।

नई दिल्ली। एक साल पहले इन्हीं दिनों में मेहमाननवाजी के लिए पठान को बुलाने वाले सिद्धार्थ आनंद एक बार फिर फाइटर के साथ हाज़िर है। फ़र्क़ बस इतना है कि उस वक़्त पार्टी ज़मीन पर थी और इस बार जश्न आसमान में है। अब तक समझ चुके होंगे आप कि हम हालिया रिलीज़ फ़िल्म फाइटर के बारे में बात करेंगे। फाइटर की बात करने से पहले थोड़ा फ़्लैशबैक में चलते हैं जहां हॉलीवुड में साल 1986 में एक फ़िल्म आई थी टॉपगन, जिसमें ऐसे ही एक हैंडसम हंक एयरफ़ोर्स पायलट मैवरिक यानी टॉम क्रूज को दुनिया ने पहली बार इस तरह का एरियल कॉम्बैट करते देखा था। अब आ जाते हैं प्रेजेंट डे में तो हां कहना ग़लत नहीं होगा कि डायरेक्टर सिद्धार्थ आनंद ने फाइटर बनाने से पहले टॉप गन जैसी टॉप हॉलीवुड फ़िल्म को घोल कर पिया है, जिसकी झलक फ़िल्म में साफ़ नज़र आती है। लेकिन सवाल ये है कि क्या वो इसे सही एक्ज़क्यूट कर पाये हैं तो इसका जवाब भी काफ़ी हद तक ‘हां’ है। फाइटर एक ऐसी फ़िल्म है जो बस राष्ट्रवाद तक ही सिमट कर नहीं रहती है बल्कि अपने आप को उससे आगे लेकर जाती है। फ़िल्म का बजट 250 करोड़ है, आदिपुरुष का बजट 600 करोड़ था लेकिन फ़िल्म में वो पैसा कहां लगा? इसपर इनक्वायरी कमीशन बिठानी चाहिए। वहीं सिद्धार्थ की फ़िल्म फाइटर में ढाई सौ करोड़ कहां ख़र्च हुए हैं वो साफ़-साफ़ पता चलता है। यही कारण है कि ये फिल्म इंडियन एयरफोर्स को भी बेहद पसंद आई है।

मशहूर जर्नलिस्ट भट्ट अपने एक्स अकाउंट पर लिखती हैं कि- ”अपने सूत्रों से पता चला कि फाइटर को IAF द्वारा पसंद किया जा रहा है। उन्होंने फिल्म की स्क्रीनिंग पर स्टैंडिंग ओवेशन दिया है” आगे भट्ट कहती हैं कि- ”मुझे अफसरों से सुनने मिला कि वो कह रहे थे कि फाइनली बॉलीवुड ने इस फिल्म को सही तरह से बनाया’ आपको बता दें कि मीरा भट्ट ने ही ये साफ़ किया कि फिल्म निर्माताओं की टीम में से एक पूर्व सेना अधिकारी और एयरफोर्स अधिकारी का बेटे हैं जिन्होनें फाइटर की स्ट्रोरी और स्क्रीनप्ले पर काम किया है और यही वजह है कि फिल्म में इंडियन एयरफोर्स की डिटेलिंग पर बखूबी काम किया गया है जो फिल्म में साफ़ नजर आता है और ये फिल्म इंडियन एयरफोर्स के अफसरों को भी भा रही है बहरहाल, ये सिर्फ एक पॉइंट नहीं है जो इस फिल्म को खास बनाती है तो चलिए नजर डालते हैं फिल्म के कुछ और जरुरी पॉजिटिव पॉइंट्स पर…

फिल्म का दूसरा पॉजिटिव पॉइंट है इसका किंग साइज विज़ुअल। फ़िल्म मे एयरफ़ोर्स कॉम्बेट, डॉग फाइट सबको काफ़ी शानदार तरीक़े से दिखाया गया है। लंबे-लंबे एयर कॉम्बेट तो है ही लेकिन इसके क्लोजअप विज़ुअल भी कमाल हैं। मसलन जब इंटरवल से पहले ताज और बैस का एयर क्रैश होता है तो उसे एक लॉन्ग शॉट में दिखाया जा सकता था लेकिन उससे सिर्फ़ एयरक्राफ्ट दिखता लेकिन वहां का क्लोज़ अप इतना कमाल है कि आपको एयरक्राफ्ट के भीतर मौजूद पायलट भी नज़र आते हैं। ये फ़िल्म आपको रीयलिस्टिक वर्ल्ड में लेकर जाती है। जिसका मेन रीजन है कि इस फ़िल्म के स्पेशल इफ़ेक्ट को DNEG नाम की कंपनी ने मैनेज किया है। ये वही कंपनी है जिसने जेम्स बॉन्ड और the dyun जैसी फ़िल्मों में स्पेशल इफ़ेक्ट दिया था। यही वजह है कि फ़िल्म के विज़ुअल और वीएफ़एक्स थ्री डी छोड़िए टू डी में भी टॉप क्लास लगते हैं।

फाइटर का तीसरा पॉज़िटिव पॉइंट है इसकी कास्टिंग। ग्रीक गॉड ऋतिक रोशन बिना किसी शक एयरफ़ोर्स यूनिफार्म में शानदार लगे हैं और सिद्धार्थ ने भी ऋतिक के चार्म और उनके लुक को फ़िल्म में पूरी तरह से भुनाया है, फिर चाहे ऋतिक रोशन का एयरफ़ोर्स के चेंजिंग रूम में टॉवल सीन हो या पायलट की वर्दी, हर लुक में ऋतिक से नजरें नहीं हटती। वो पूरी तरह से शो स्टॉपर हैं। उनके सामने दीपिका पर भी कई बार नज़र नहीं पड़ती। ऋतिक रोशन के फ़ैन्स के लिए डेफ़िनेटली ये फ़िल्म हॉपलेसली एंटरटेनर साबित होगी।

 

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फ़िल्म का चौथा पॉज़िटिव पॉइंट- इसके डायलॉग हैं। हां ये डायलॉग थोड़े क्रिंज हैं लेकिन राइटर को पता है कहां तालियां बजेगी और कहां सीटियां, और उस हिसाब से डायलॉग लिखे गए हैं। मसलन, देश के प्रधानमंत्री कहते हैं- समय आ गया है बताने का कि बात कौन है? हम जानते हैं कोई पीएम ऐसे बात नहीं करते और ये काफ़ी टेकी साउंड करता है। पर सच मानिए तालियां भी इसी पर बजती है। फिर जब क्लाइमेक्स फाइट में ऋतिक रोशन  पाकिस्तानी आतंकवादी को जय हिन्द का मतलब समझाते हैं। फिर वो तुमने कश्मीर ऑक्यूपाई किया है मालिक हम है। अगर हम भी ऐसे करें तो पूरा पाकिस्तान आईओएपी होगा- इंडिया ऑक्यूपाई पाकिस्तान ऑब्वियस्ली ये डायलॉग ऑलरेडी पॉपुलर हो चुका है। इसके बाद ऋतिक रोशन एक जगह मुजाहिदीन को कहते हैं- तू आतंकवादी है ख़ुद को शहीद मत समझना। कुल मिलाकर ये डॉयलॉग्स पब्लिक के मूड के हिसाब से फिट बैठते हैं।

पांचवा और मेन पॉइंट- फ़िल्म का ट्रेलर देखकर लगा था कि फ़िल्म पुलवामा और बालकोट से लिंक्ड है। सेम उड़ी वाला फॉर्मेट होगा। पहले अटैक फिर रिवेंज और खेल ख़त्म घर जाओ। लेकिन फ़िल्म देखकर पता चलता है कि ट्रेलर बस फर्स्ट हाफ का था क्यूंकी पिक्चर अभी बाक़ी है मेरे दोस्त। फ़िल्म को ईज़ली पुलवामा और बालकोट पर ख़त्म कर के सिद्धार्थ आनंद पाकिस्तान और राष्ट्रवाद का मुद्दा भुनाकर ग़दर की तरह करोड़ों कमा सकते थे लेकिन वो इससे आगे गए। मैं आपको बता दूं फाइटर सिर्फ़ रियल स्टोरी बेस्ड फ़िल्म नहीं है बल्कि फिक्शन का फ़्यूज़न भी है जो आपको फ़िल्म देखने के बाद पता चलेगा। पर प्लॉट ट्विस्ट ये है कि पुलवामा और बालकोट फर्स्ट हाफ़ में ही निपटा दिया जाता है। असली कहानी इसके बाद सेकंड हाफ़ में शुरू होती है।

 

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फ़िल्म का एक और अहम पॉइंट कि फ़िल्म सोशल बैरियर्स को तोड़कर एक मैसेज भी देती है। मैसेज लड़कियों के एयरफ़ोर्स में, आर्मी में फ्रंटलाइन जॉब के लिए। फ़िल्म में दीपिका का किरदार मीनल राठौर इसीलिए भी ज़रूरी है क्योंकि वो एक ऐसी लड़की हैं जिसके पिता नहीं चाहते थे कि वो एयरफ़ोर्स पायलट बने। उन्हें लगता था ये काम लड़कियों का नहीं और सच मानिए आज भी लोग ये सोचते हैं कि लड़कियां ऐसे जॉब्स के लिए नहीं हैं। यही वजह है कि आज भी एयरफ़ोर्स और आर्मी जॉइन करने लड़कों के मुक़ाबले लड़कियों के कम एप्लिकेशंस आते हैं। फ़िल्म में ऋतिक रोशन कहते हैं कि दुश्मन की गोली औरत और मर्द तो नहीं देखती। ऐसे में फाइटर के लार्जर देन लाइफ एक्सपीरिएंस को देख कर हो सकता है एयरफ़ोर्स में युवाओं और लड़कियों के ज़्यादा एप्लीकेशन आने लगे जैसे टॉपगन के वक्त अमेरिका में हुआ था। हां एयरफ़ोर्स पायलट की लाइफ फाइटर के पैटी की तरह ग्लैमरस नहीं होती पर पायलट के रिस्क को सिद्धार्थ की ये फ़िल्म बखूबी बयान करती है।