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Safforn Terror: भगवा आतंकवाद साज़िश का परत दर परत पर्दाफाश करती कंवर खटाना की ‘द गेम बिहाइंड सैफ्रन टेरर’ पुस्तक

पुस्तक के अंत में लेखक ने एक पृष्ठ भविष्य के खेल के बारे में लिखा है जो पाठक को बड़े ही ध्यान से पढ़ना चाहिए क्योंकि भारत को घाव देने का पाकिस्तानी और आईएसआई का खेल अभी भी सतत चल रहा है। भारत में अभी भी पाकिस्तान के पाकिस्तान के गुर्गे हर जगह हैं। पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे आये दिन सोशल मीडिया पर गूंजते रहते हैं।

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नई दिल्ली। अंग्रेजी भाषा में एक पुस्तक हाथ लगी, जिसका शीर्षक है,’द गेम बिहाइंड सैफ्रन टेरर‘। लेखक हैं सेना और इंटेलिजेंस कॉर्प्स में लगभग 3 दशकों तक सेवा करने वाले श्री कंवर खटाना। जैसे ही ‘सैफ्रन टेरर शब्द पढ़े तुरंत दिमाग में आरवीएस मणि जी का नाम घूमने लगा।’यहाँ एक बात बताना आवश्यक समझता हूँ कि गृह मंत्रालय के पूर्व अवर सचिव आरवीएस मणि की सारी पुस्तकें मैंने पढ़ी हैं और उन पर मेरी समीक्षा और ट्विटर थ्रेड भी हैं। मणि जी की लेटेस्ट पुस्तक Deception: A Family That Deceived the Whole Nation का हिंदी अनुवाद भी मैंने ही किया है। जल्दी ही पुस्तक प्रकाशित होने वाली है। इसलिए सैफ्रन टेरर विषय की जानकरी मुझे है।

‘द गेम बिहाइंड सैफ्रन टेरर’ पुस्तक के शुरुआत में ही जो पढ़ने को मिला, वह स्वयं को देशभक्त, राष्ट्रभक्त और विशेषकर हिन्दू कहलाने वालों के लिए इस पुस्तक को पढ़ने के लिए उत्प्रेरक का काम करने वाला है। पाठक यह तथ्य जाने इसलिए मैं विवश होकर वह पैरा यहाँ लिख रहा हूँ, आइए देखते हैं क्या लिखा है,”क्षुद्र राजनीतिक लाभ और करियर के लालच में, इस्लामिक आतंकवादियों द्वारा किए गए अपराध की अनदेखी की गई। उन्होंने सेना में सेवारत वरिष्ठ अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित के उज्ज्वल करियर और जीवन को बर्बाद कर दिया और मुखबिरों के उनके कुशल नेटवर्क के काम को नष्ट कर दिया, जो आतंकवाद पर व्यापक खुफिया जानकारी दे रहा था। यह सब भारत में हिंदू आतंकवाद को प्रदर्शित करने और एक वफादार वोट बैंक बनाने के लिए मुस्लिम समुदाय को खुश करने अथवा तुष्टिकरण करने के लिए किया गया, जबकि इसका कोई अस्तित्व ही नहीं था। राष्ट्रीय और सामाजिक हितों का परित्याग कर दिया गया था। यह अपने भारतीय सेना के उत्कृष्ट इतिहास में पहली बार था कि भारतीय सेना को अपने अधिकारी वर्ग में आतंकवादियों को पनाह देने के लिए कलंकित किया गया था। लेकिन क्या यह साज़िशकर्ताओं की अंतरात्मा को चुभा? नहीं, बिलकुल नहीं।”

संवाद शैली में लिखी गई 349 पृष्ठ की छोटे-छोटे 21 अध्यायों वाली इस पुस्तक की सारगर्भित छोटी सी भूमिका यह समझने के लिए अपने आप में पर्याप्त है कि यह पुस्तक पाठक के सामने क्या रहस्योद्घाटन करने वाली है। बहुत से नाम ऐसे मिलेंगे जो इस पुस्तक की सामग्री को सत्य और प्रमाणित बनाने के लिए पर्याप्त हैं। लेखक ने भले ही इसे ‘फिक्शनल’ कार्य बताया है, जिसके पीछे दूसरे कारण हो सकते हैं, और जागरूक पाठक उन्हें समझ सकता है और लेखक को इसकी स्वतंत्रता देता है।

अध्याय 1 की शुरुआत नई दिल्ली, 24 अकबर रोड, 1 जनवरी 2006 से होती है। जहाँ कांग्रेस के दिग्गज नेताओं अहमद पटेल, चिदंबरम, ए. अंटोनी, दिग्विजय सिंह आदि के साथ कांग्रेस की शक्तिशाली अध्यक्षा, राहुल, प्रियंका का जिक्र है और बाद में अध्यक्षा का दिग्गज नेताओं के साथ वार्तालाप है। जिसमें चुनावों में कांग्रेस की जीत सुनिश्चित करने, वोट बैंक बढ़ाने, मुस्लिमों को खुश करने आदि अनेक मुद्दों पर अध्यक्षा के निर्देशों का जिक्र है और भाजपा से निपटने के लिए रणनीति के बारे में बात की गई हैं।

पाठक जैसे-जैसे आगे बढ़ेंगे उनको इस पुस्तक में ‘भगवा आतंकवाद’, हिन्दू आतंकवाद’ आदि मिथक के निर्माण के पीछे होने वाली साज़िश का परत दर परत पता चलेगा। भगवा आतंकवाद एक मिथक था ऐसा आरवीएस मणि ने अपनी पुस्तक में बताया था और यह दावा भी किया था कि कांग्रेस ने सत्ता पर कब्जा करने के लिए यह साज़िश रची थी। खटाना की यह पुस्तक भी उसी दावे पर पृष्ठ दर पृष्ठ मोहर लगाती दिखेगी।

वर्ष 2006 में आरएसएस कार्यालय नागपुर पर हमला तब हुआ था जब भारतीय प्रतिनिधिमंडल पकिस्तान गया हुआ था। और 26/11/2008 मुंबई हमला भी उस समय हुआ था जब भारतीय प्रतिनिधिमंडल पकिस्तान गया हुआ था। यह कोई संयोग तो नहीं हो सकता है बल्कि एक योजनाबद्ध प्रयोग था।

इस पुस्तक में विदेशी आतंकवादी गुटों का उपयोग करके भारत में उपरोक्त हमले कैसे किये गए थे और क्यों किये गए थे, साजिश कैसे और क्यों रची गई थी, इसका खुलासा किया गया है। पाकिस्तानी खुफ़िया एजेंसी आईएसआई भारत में कैसे काम करती है इस पुस्तक से पाठक समझ सकता है। यह पुस्तक पाठक को यह भी बताएगी कि पाकिस्तानी सेना ही पाकिस्तान में सुप्रीम पावर है और यह पाकिस्तानी सरकार को कैसे कठपुतली की तरह नियंत्रित करके नचाती है। यह जानकारी पाठक को झटका देगी। क्योंकि भारत में तो वामपंथी और कांग्रेस आये दिन सेना का भी राजनीतिकरण करते रहते हैं।

यह पुस्तक पाठक को यह भी बताएगी कि जनरल मुशर्रफ और अशफाक परवेज़ की भारत में आतंकवादी हमले करने की योजना जनरल जिया उल-हक की भारत को हज़ारों घाव देने की ख़ूनी साज़िश के अनुरूप ही था।

इस पुस्तक में 2008 में महाराष्ट्र के मालेगांव में विस्फोट मामले में फसाये गए कर्नल पुरोहित पर विस्तार से लिखा गया विवरण पाठक को झकझोर देगा। मैंने आरवीएस मणि की पुस्तकों में भी कर्नल पुरोहित की प्रशंसा पढ़ी है। कर्नल पुरोहित के साथ राजनितिक स्वार्थों के लिए जो किया गया वह झूठ स्थापित करने के प्रयासों की पराकाष्ठा है। कर्नल पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा सिंह को महाराष्ट्र आतंकवाद विरोधी दस्ते (एटीएस) का नेतृत्व कर रहे हेमंत करकरे द्वारा लगातार प्रताड़ित किया गया था। हेमंत करकरे वही पुलिस अधिकारी था जो गृहमंत्री शिवराज पाटिल के कक्ष में दिग्विजय सिंह के साथ मिलकर आरवीएस मणि से हिन्दू आतंकवाद स्थापित करने के प्रयास में पूछताछ कर रहा था।

पुस्तक के अध्याय 6 में पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के मुख्यालय का वार्तालाप है जिसमें अधिकारीयों की बातचीत में यह खुलासा हुआ है कि उनके पास भारत में खुफिया संसाधन और सूत्र भी हैं। खुलासे में यह भी पता चलता है कि उनके पास कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, मीडिया, सरकार और राजनीतिक दलों में भी एजेंट हैं। इसके साथ उनके पास भारत में दो महत्वपूर्ण जासूस भी हैं। जिनके कोड नाम ‘अल्फा’ और ‘डेल्टा’ हैं। ‘अल्फा’ कांग्रेस के एक अनुभवी राजनेता हैं और गांधी वंश के बहुत करीब हैं। उसके पास सरकारी नीतियों को प्रभावित करने की क्षमता है और ‘डेल्टा’ भारत और मुस्लिम दुनिया में एक प्रभावशाली सुशिक्षित इस्लामी उपदेशक है।

पुस्तक आपको यह भी बताएगी कि बेनज़ीर भुट्टो के साथ साथ क्या खेल हुआ था। यह पुस्तक पाकिस्तानी मस्तिष्क को समझने में भी मदद करती है। पुस्तक के अध्याय 11 में पाठक को हाफिज़ सईद और डेविड हेडली की भूमिका के बारे में बताएगा। पुस्तक के अनुसार डेविड हेडली को 25000 डॉलर दिए गए थे। इस अध्याय में आतंकी हाफ़िज़ सईद के हवाले से आतंकवादियों को दी जाने वाली 147 दिनों की 6 चरणों की ट्रेनिंग का सम्पूर्ण विवरण दिया गया है। आतंकी ट्रेनिंग के इन 6 चरणों को पढ़कर पाठक समझ सकता है कि इस्लामिक आतंकी कितने खतरनाक होते हैं।

समीक्षा लम्बी न हो इसलिए यदि संक्षिप्त में लिखूं तो इस पुस्तक में वर्ष 2007 आरएसएस मुख्यालय पर हुए आतंकी हमले, समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट, मालेगांव ब्लास्ट आदि कई आतंकवादी हमलों के बारे में विस्तार से लिखा गया है साथ ही 26/11 के मुंबई आतंकवादी हमलों, हमलों के लिए आतंकवादियों के चयन, कराची में पाकिस्तानी सेना के तहत उनके प्रशिक्षण, उनकी मुंबई की समुद्री मार्ग से यात्रा आदि का विस्तार पूर्ण वर्णन किया गया है। पुस्तक यह भी बताती है ये सारे आतंकी हमले केवल पाकिस्तानी आईएसआई और उनके आतंकी गुर्गों का ही कमाल नहीं था बल्कि उनको भारत के भीतर से समर्थन और सहयोग मिला था।

खटाना की पुस्तक में अनेक खुलासे हैं, जिन्हे मैं चाहता हूँ पाठक स्वयं पढ़े और जाने कि देश के साथ और खासकर हिन्दुओं के साथ कितना बड़ा धोखा हुआ है। पुस्तक का अध्याय 18 ऑपरेशन गाज़ी पाठक को चौंका देगा।

पुस्तक के अंत में लेखक ने एक पृष्ठ भविष्य के खेल के बारे में लिखा है जो पाठक को बड़े ही ध्यान से पढ़ना चाहिए क्योंकि भारत को घाव देने का पाकिस्तानी और आईएसआई का खेल अभी भी सतत चल रहा है। भारत में अभी भी पाकिस्तान के पाकिस्तान के गुर्गे हर जगह हैं। पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे आये दिन सोशल मीडिया पर गूंजते रहते हैं।

यह पुस्तक पाठक को भगवा आतंकवाद के पीछे की पूरी साज़िश का पर्दाफ़ाश करती है और विशेष रूप से कर्नल पुरोहित के साथ जो कुछ भी अमानवीय घटित हुआ उस पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डालती है। लेखक का विश्वास है कि कर्नल पुरोहित को एक न एक दिन अदालतों द्वारा सभी आरोपों से मुक्त कर दिया जाएगा क्योंकि वह निर्दोष है। समीक्षा लिखते हुए मेरा भी यही मत है कि कर्नल पुरोहित आरोप मुक्त होंगे और पुस्तक में लेखक द्वारा लिखे स्वयं कर्नल पुरोहित के शब्दों में कहूं तो,”मैं सेना से प्यार करता हूँ और मैं अपने देश से प्यार करता हूँ। अंत में सत्य की ही जीत होगी। सत्यमेव जयते। जय हिन्द! ऐसा मेरा भी विश्वास है।

एक बात और लेखक ने पुस्तक के अंत में पाकिस्तान की नीव रखने में भूमिका निभाने वाले अलम्मा इक़बाल की पंक्तियाँ लिखी हैं। लेखक ने शायद इन पंक्तियों को देशभक्त होने के कारण भारत के परिप्रेक्ष्य में लिखा है। लेकिन यहाँ मेरी लेखक से असहमति है क्योंकि जितना मैंने इक़बाल को समझा है उसके अनुसार उसकी ये पंक्तियाँ इस्लाम को लेकर लिखी गई हैं, भारत अथवा हिन्दुस्थान को लेकर नहीं।

अंत में, यह पुस्तक हर देशभक्त नागरिक और विशेष रूप से हिन्दुओं को पढ़नी चाहिए। हिन्दू संगठनों को इस पुस्तक को बांटने अथवा लोगों तक पहुंचाने का अभियान चलाना चाहिए।

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