newsroompost
  • youtube
  • facebook
  • twitter

Pegasus Row: सुप्रीम कोर्ट ने निजता उल्लंघन को गंभीरता से लिया, जासूसी की जांच करेगी एक्सपर्ट्स की कमेटी

कोर्ट ने कहा कि जितनी याचिकाएं दाखिल हुई हैं, उनमें चिंता जताई गई है। लोगों के मूलभूत अधिकारों पर कभी भी कोर्ट ने रोक नहीं लगाई। चीफ जस्टिस ने कहा कि याचिका देने वालों में कई इस निगरानी के पीड़ित हैं तो कुछ ने जनहित याचिका लगाई है।

नई दिल्ली। इजरायली स्पाईवेयर पेगासस से नेताओं, पत्रकारों, मंत्रियों समेत कई लोगों की निगरानी के आरोप मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आज फैसला सुना दिया। इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस एनवी रमन्ना, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस हिमा कोहली की बेंच ने की थी। कोर्ट ने इस मामले में आज फैसला सुनाते हुए निजता के उल्लंघन के मामले को गंभीरता से लिया और कथित जासूसी की जांच के लिए एक्सपर्ट्स की कमेटी बनाने की बात कही। कोर्ट ने कहा कि जितनी याचिकाएं दाखिल हुई हैं, उनमें चिंता जताई गई है। लोगों के मूलभूत अधिकारों पर कभी भी कोर्ट ने रोक नहीं लगाई। चीफ जस्टिस ने कहा कि याचिका देने वालों में कई इस निगरानी के पीड़ित हैं तो कुछ ने जनहित याचिका लगाई है। कोर्ट ने ये भी कहा कि समाज के सभी वर्गों की निजता को लेकर चिंता जायज है। उनकी निजता की रक्षा करनी जरूरी है। चीफ जस्टिस ने फैसला सुनाते हुए कहा कि कुछ प्रतिबंधों के साथ मौलिक अधिकार रहने चाहिए। उन्होंने कहा कि पहले हम अखबार की खबरों को लेकर दाखिल याचिकाओं पर गंभीर नहीं थे। लेकिन तमाम पीड़ितों ने भी याचिका दी है। कोर्ट ने कहा कि हमने इस मामले में केंद्र सरकार को सभी जानकारी देने के लिए काफी वक्त दिया, लेकिन सरकार ने पूरा हलफनामा दाखिल नहीं किया। केंद्र ने हमारे कंधे पर जिम्मेदारी डाल दी। जबकि, उसे अपना रुख साफ करना चाहिए था और कोर्ट को महज चुपचाप देखने के लिए नहीं कहना था। केंद्र सरकार ने इस मामले में गंभीरता नहीं दिखाई। हम सरकार को कमेटी बनाकर जांच करने के लिए नहीं कह सकते। हम खुद कमेटी बना रहे हैं। ये कमेटी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस आरवी रवींद्रन की निगरानी में काम करेगी। जिसमें आलोक जोशी और अन्य एक्सपर्ट होंगे। इस मामले में अगली सुनवाई 8 हफ्ते बाद होगी। तब कमेटी को अपनी रिपोर्ट देनी होगी। कमेटी में गांधीनगर स्थित नेशनल फॉरेंसिक साइंस यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और डीन डॉ. नवीन कुमार चौधरी, केरल के अमृता विश्व विद्यापीठम के डॉ. प्रभाकरण, आईआईटी बॉम्बे के डॉ. अश्विन अनिल गुमास्ते होंगे।

pegasusspywarecheck

इस मामले में बेंच ने 13 सितंबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था। अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा था कि वह ये जानना चाहती है कि क्या मोदी सरकार ने नागरिकों की कथित निगरानी के लिए अवैध तरीके से पेगासस स्पाईवेयर का इस्तेमाल किया है या नहीं। कोर्ट के इस सवाल पर केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला दिया था। सरकार ने इस मामले में विस्तृत हलफनामा दाखिल करने से इनकार कर दिया था। इसी साल संसद के मॉनसून सत्र शुरू होने से एक दिन पहले 18 जुलाई को भारत समेत दुनिया के कई मीडिया संस्थानों ने खबर छापी थी इजरायली कंपनी एनएसओ के पेगासस स्पाईवेयर से भारत में कथित तौर पर 300 से ज्यादा हस्तियों के फोन हैक किए गए थे। मीडिया संस्थानों का कहना था कि जिन लोगों के फोन टैप किए गए, उनमें कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी, केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव और प्रह्लाद सिंह पटेल, पूर्व निर्वाचन आयुक्त अशोक लवासा और चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर और कई पत्रकार भी हैं। पेगासस निगरानी मामले की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट में 12 अर्जियां दाखिल हुई थीं। ये अर्जियां वकील एमएल शर्मा, सीपीएम के सांसद जॉन ब्रिटास, पत्रकार एन. राम, आईआईएम के प्रोफेसर रहे जगदीप चोककर, नरेंद्र मिश्रा, पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता, रूपेश कुमार सिंह, एसएनएम आब्दी, पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने दाखिल की थीं।

इस मामले जब केंद्र ने अदालत के कहने पर विस्तृत हलफनामा देने से इनकार किया था, तो चीफ जस्टिस एनवी रमन्ना ने सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था कि आप बार-बार उसी बात पर वापस जा रहे हैं। हम जानना चाहते हैं कि सरकार अब तक क्या कर रही थी। हम राष्ट्रीय हित के मुद्दों पर नहीं जा रहे। हमारी चिंता लोगों के बारे में है। समिति की नियुक्ति कोई मुद्दा नहीं है। हलफनामे का उद्देश्य है कि हमें पता चले कि आप कर क्या रहे हैं। हमें सुरक्षा से जुड़ी कोई जानकारी नहीं चाहिए। वहीं, जस्टिस सूर्यकांत ने कहा था कि हमारे सामने याचिका देने वाले हैं। वे स्पाईवेयर के गैरकानूनी इस्तेमाल से अपने हक के उल्लंघन का आरोप लगा रहे हैं। हम विस्तृत हलफनामे से केवल सरकार का पक्ष जानना चाहते हैं।