मुस्लिम कट्टरता, दंगे और देश विरोध क्या जुड़े नहीं हैं?

ये भी जानना ज़रूरी है की ये दंगे किन इलाक़ों में हुए। ये सभी इलाक़े मुस्लिम बहुल क्षेत्र हैं जिसकी पुष्टि 2011 की जनसंख्या रिपोर्ट से होती है जो ये बताती है की उत्तर पूर्वी दिल्ली के इन इलाक़ों में क़रीब 30 फ़ीसदी मुस्लिम आबादी है।

Written by: June 21, 2020 12:32 pm

पिछले कुछ दिनों से समाचार पत्रों में फरवरी 2020 के दिल्ली के दंगे फिर से केंद्र में आ गए है उसका कारण कुछ लोगों के इस दंगे में नाम आना साथ ही ये भी जांच में निकल कर आना की  दंगा कोई अनायास ही नहीं फैला बल्कि उसको फैलाया गया और जिसकी तैयारी कई महीनों से की गई, जिस दिन ये तय हुआ की अमेरिका के राष्ट्रपति भारत आ रहे हैं बस उसी दिन दंगों  की पटकथा लिख दी गई थी। वर्तमान में चीन का भारत की सीमाओं में अतिक्रमण का प्रयास और उस पर देश की वामपंथी दलों का मौन व्रत हमें कहीं ना कहीं सोचने पर मजबूर भी करता है क्यूंकि इन दंगों में पुलिस चार्जशीट के अनुसार वामपंथी संगठनों से जुड़े लोगों का नाम ही आ रहा है जिसमें पिंजरा तोड़ एवं आइसा जैसे संगठनों का नाम शामिल है। उत्तर-पूर्वी दिल्ली के जाफराबाद और मौजपुर इलाके में रक्तपात, तमाम संपत्ति विनाश, दंगे और हिंसक घटनायें देखने को मिले। जिसमें कई प्रदर्शनकारियों समेत कई पुलिसकर्मियों को अपनी ड्यूटी निभाते हुए जान गंवानी पड़ी इस दंगे में दिल्ली पुलिस के हेड कॉन्स्टेबल रतनलाल और आईबी कांस्टेबल अंकित शर्मा की हत्या की गई, विनोद खटिक जो दलित समाज से थे उनको भी मार दिया गया। वहीं कितने ही दलितों के घरों को जला दिया गया।

ये दंगे हो किस लिए रहे थे। तो मुद्दा था नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिकता पंजीकरण ये दोनों ही प्रावधान एक और वर्षों से पाकिस्तान, अफगनिस्तान, बांग्लादेश में बहुसंख्यक मुस्लिम वर्ग की प्रताड़ना से त्रस्त हिंदू व अन्य अल्पसंख्यक  आबादी को भारत में नागरिकता देने का, वहीं उन देशों में रह रहे हमारे हिंदू बन्धुओं व अन्य अल्पसंख्यक समाज में एक विश्वास पैदा करना की भारत आपके साथ है। वहीं दूसरा मुद्दा वर्षों से भारत की ज़मीन पर अवैध रूप से रह रहे लोगों को भारत की ज़मीन से बाहर करने का जिसमें मुस्लिम आबादी ही बहुसंख्यक है, मुस्लिम बंगलदेशी जो देश के विभिन्न भागों में अवैध रूप से रह रहे हैं जिससे देश की सुरक्षा भी प्रभावित हो रही है वहीं देश के संसाधनों का भी बहुतायत मात्रा में इनके द्वारा उपयोग भी किया जा रहा है। इन देश हित के मुद्दों पर भी सियासत होना जहां भारत में कुछ लोगों को देश विरोधी स्वयं ही घोषित कर देता है। दिल्ली के दंगों पर क्राइम ब्रांच के आरोप पत्र की मानें तो उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों की शुरुआत कदमपुरी, मौजपुर और चांद बाग में हुई थी। इसके बाद दंगाईयों की भीड़ उत्तर-पूर्वी जिले के विभिन्न इलाकों में और शिव विहार तिराहा पर पहुंची थी। दोपहर बाद बृजपुरी पुलिया की तरफ से समुदाय विशेष के लोगों की भीड़ आ गई और दंगा शुरू कर दिया, दंगाई भीड़ ने देर रात तक उत्पात मचाया।

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ये भी जानना ज़रूरी है की ये दंगे किन इलाक़ों में हुए। ये सभी इलाक़े मुस्लिम बहुल क्षेत्र हैं जिसकी पुष्टि 2011 की जनसंख्या रिपोर्ट से होती है जो ये बताती है की उत्तर पूर्वी दिल्ली के इन इलाक़ों में क़रीब 30 फ़ीसदी मुस्लिम आबादी है। हिंदू आबादी पर मुस्लिम आबादी के द्वारा किया जा रहा उत्पीड़न कोई नया नहीं है बल्कि जहां भी हिंदू अल्पसंख्यक में होता है वहां मुस्लिम समाज के द्वारा उन पर अत्याचार  होता ही है। कश्मीर में मुस्लिम आबादी के द्वारा वहां की हिंदू आबादी को कह दिया जाता है की आप कश्मीर से भाग जाए नहीं तो मार दिए जाएंगे । इसी प्रकार 2005 में यूपी के मऊ जिले में रामलीला कार्यक्रम में मुस्लिम पक्ष ने हमला कर दिया था, तब भी 14 लोगों की जन गई थी वहीं 2013 के मुजफ्फरनगर में हुए दंगे में “लव जिहाद” जिसमे हिंदू समुदाय की लड़कियों को प्यार के जाल में फंसाया जाता है, एक प्रमुख कारण था। जब हिन्दुओं ने आवाज उठाई तो उनकी हत्या की जिसके बाद दंगे में 62 से ज्यादा जान गई थी। इसके आलावा हरियाणा मेवात में 100 से अधिक गांव हिंदू विहीन हो गए हैं वहीं अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के जौनपुर में मुस्लिम आबादी के द्वारा दलित परिवारों के घर जला दिए जाते हैं। ये भी जानना ज़रूरी है की ये सभी वहां की घटनायें हैं जहां पर मुस्लिम बहुमत में रहते हैं। अत: यह भी सहज ही कहा जा सकता है की भारत में बढ़ते दंगों के लिए विशेषकर मुस्लिम कट्टरता ही जिम्मेदार है।

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यह असहनशीलता सिर्फ किसी कानून के होने की वजह से नहीं है बल्कि इसके पीछे ऐतिहासिक कारण भी है। हम देखें  जब से इस्लाम धर्म अस्तित्व में आया तभी से इस धर्म के नाम पर कितना हत्याएं हुई हैं। ये इस धर्म की बड़ी समस्या भी है ये रिलिजन एक पवित्र पुस्तक, एक प्रवर्तक, एक पूजा पद्धति के अनुसार चलता है जो इसको नहीं मानता उसको साथ लेकर चलना इन अब्रह्मिक रिलिजनों में लगभग असंभव सा ही है। यही कारण है की रिलिजन के नाम पर करोड़ों लोगों की हत्या हो चुकी है। ईरान हो या सऊदी अरब अथवा पाकिस्तान हो या बांग्लादेश, सच यह भी है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश या सऊदी अरब तक, ज़्यादातर मुस्लिम बहुल देशों ने अपने अल्पसंख्यकों के साथ सामाजिक स्तर पर बल्कि क़ानूनी तोर पर भी भेदभाव किया। उदहारण के तोर पर पर लगभग सभी मुस्लिम देशों में कोई भी गैर-मुस्लिम वहां का सर्वोच्च पद प्राप्त नहीं कर सकता। इसका प्रमुख कारण है इस्लाम और इस्लामिक राज्य पर कट्टरपंथी मौलवियों की पकड़ बहुत सारे लोग मानने लगे हैं कि इस्लामिक स्टेट, बोको हराम से लेकर तालिबान और लश्कर तक, दुनिया की हर हिंसक गतिविधि के लिए कट्टरपंथी मुस्लिम ज़िम्मेदार हैं।

यह विश्वव्यापी घटना भारत में भी देखने को मिलती है चाहे मध्यकाल में हुए मुस्लिम आक्रमण या जबरदस्ती हिन्दुओं को इस्लाम कबुल करवाना हो, इतिहास में औरगंजेब और अन्य मुस्लिम शासकों के द्वारा ज़बरन मुस्लिम बनाने के सैकड़ों प्रमाण हमें मिल जाते हैं। स्वतंत्रता आन्दोलन के समय “खिलाफत आन्दोलन” के दौरान “मोपला” के हिन्दुओं पर हुए अत्याचार जिसे वीर सावरकर ने अपनी रचनाओं में व्यक्त किया, यही कारण था की मुस्लिम कट्टरपंथी से हिन्दुओं को बचाने और संगठित करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई जिसके तीन प्रमुख उदेश्य थे पहला भारतीयों को अंग्रेजों से मुक्ति दिलाना, दूसरा हिन्दू समाज को समता के तत्व पर संगठित करना और कट्टरपंथी मुसलमानों से हिन्दू समाज की रक्षा करना, तीसरा अखंड भारत के सपने को पूरा करना। इसके बाद 1947 के  विभाजन के समय भी यही देखने को मिला जब लाखों हिन्दुओं की हत्या की गई।

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डा.अम्बेडकर  ने अपने विचार अपनी दो महत्वपूर्ण पुस्तकों “पाकिस्तान एंड द पार्टीशन आफ इंडिया एवं थॉट्स ओन पाकिस्तान में व्यक्त किये हैं। उनका स्पष्ट कहना था की इस्लाम विश्व को दो भागों में बांटता है, जिन्हें वे दारुल-इस्लाम तथा दारुल हरब मानते हैं। जिस देश में मुस्लिम शासक है वह दारुल इस्लाम की श्रेणी में आता है। लेकिन जिस किसी भी देश में जहां मुसलमान रहते हैं, परन्तु उनका राज्य नहीं है, वह दारुल-हरब होगा। इसके अलावा वे कहते हैं की इस्लाम एक  भाईचारा सीमित है इस्लाम से बाहर के समुदाय को वे अपना शत्रु मानते हैं। डा. अम्बेडकर के शब्दों में– “इस्लाम का भ्रातृत्व सिद्धांत मानव जाति का भ्रातृत्व नहीं है। यह मुसलमानों तक सीमित भाईचारा है। समुदाय के बाहर वालों के लिए उनके पास शत्रुता तिरस्कार के सिवाय कुछ भी नहीं है।” (“थाट्स ऑन पाकिस्तान, डा.अम्बेडकर, 1945) डा.अम्बेडकर का मानना था कि कांग्रेस के सांप्रदायिक तुष्टीकरण की नीति के कारण देश का विभाजन हुआ। भारत में भी कई जगह यही स्थिति देखने को मिलती है जहां पर मुस्लिम समुदाय बहुमत में है वहां वे गैर मुस्लिमों को निशाना बनाते हैं। लेकिन अब समय आ गया है की न सिर्फ मुस्लिम समाज के लोग खुद अपने धर्म  के अंदर सुधार लाये और इन कट्टर रूढ़िवादियों की जगह नए मूल्य जैसे सहनशीलता, स्वतंत्रता, शांति को जो उनकी पवित्र क़ुरान में है पर अमल करें। वहीं हिंदू समाज भी आपसी भेदभाव भूल कर संगठित रहें ।

लेखक डॉ प्रवेश कुमार, जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय नई दिल्ली में सहायक प्रोफेसर के तौर पर कार्यरत हैं और इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं…